फकीर की कहानी

एक फकीर की कहानी

यह एक फकीर की कहानी है, कहा जाता है कि अपने जीवनकाल में बाबा ने हिंदू भक्तों के लिए रामायण और भगवद्गीता और मुसलमानों के लिए कुरान की सिफारिश की थी। उन्होंने अपने जीवनकाल में हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों को अपनाया।

फकीर की कहानी को जानने के लिए अभी सुबह की प्रथम बेला का आगमन हुआ ही था कि जब मैं भारत में महाराष्ट्र के एक शांत कस्बे शिरडी में पहुंची। जब मैं थकी हुई और आधी नींद में थी तब शहर दैनिक कार्यों की गहमा-गहमी के साथ जाग रहा था। ज्यों ही मैं बस से उतरी मैंने देखा कि साईं बाबा मंदिर के बाहर सुबह की काकड़ आरती (एक ऐसा अनुष्ठान जिसमें दीप जलाए जाते हैं, प्रसाद बांटा जाता है और भजन गाए जाते हैं) के लिए श्रद्धालुओं का तांता लग रहा है। भक्तों के उत्साह और ऊर्जा को देखते हुए मेरी भी बस की रातभर की यात्रा के दौरान आई सारी थकावट जाती रही।

फकीर की कहानी को करीब से जानने के लिए मैंने होटल में रजिस्ट्रेशन कराया, नित्य कर्म करने के बाद दर्शन के लिए आकर टेड़ी-मेढ़ी पंक्ति में लग गई। चूंकि मेरे पास समय का अभाव न था मैंने साथी भक्तों के साथ बातचीत शुरू कर दी। मुझे पता चला कि साईं बाबा के प्रति हिन्दू और मुस्लिम दोनों गहरी श्रद्धा रखते हैं। वास्तव में यह सुनिश्चित नहीं है कि बाबा हिन्दू थे या मुस्लिम। आज तक उनका वंश एक रहस्य ही बना हुआ है।

फकीर की कहानी की बात करें तो लोक कथाओं के अनुसार बाबा शिरडी तब आए थे जब वे मात्र 16 वर्ष के थे। ग्रामीणों को एक युवा को योगी की भांति जीवन जीते, योग करते नीम के पेड़ के नीचे ध्यान लगाते देख अचंभा हुआ। बाबा गरीबी में रहे उन्होंने एक कूड़ा डालने के स्थान को बगीचे में बदला, भिक्षा मांगी और एक जीर्ण-शीर्ण कफनी (सूफियों की पारंपरिक पोषाक) को पहना। अधिकांश हिन्दू ग्रामीणों ने उन्हें एक मूर्ख फकीर (भिखारी) समझकर उनकी अनदेखी की थी।

फकीर की कहानी पर गौर करें तो परिवर्तन आना तब शुरू हुआ जब स्थानीय ने उनकी रहस्यमयी चमत्कारी चिकित्सा शक्तियों को पहचाना। इससे वह मूर्ख फकीर से हकीम बन गए। समय के साथ उनकी चमत्कारी और आध्यात्मिक शक्तियों के चलते अनुयायियों का एक वर्ग उनका भक्त बन गया, जिन्होंने उनके नाम और ख्याति को दूर-दूर तक फैलाया। प्रसिद्धि के साथ अनेक संत भी उनके साथ जुड़े। सूफी संत मेहर बाबा ने उन्हें कुतुब-ए-इरशाद (ब्रह्मांड का मालिक) की उपाधि से नवाज़ा। यवला के हिन्दू संत आनंदनाथ ने उन्हें आध्यात्मिक हीराबताया। संत श्री बीड़कर महाराज ने उन्हें जगतगुरु की उपाधि से सम्मानित किया। ऐसा कहा जाता है कि बाबा के अंतिम दिनों में ईसाई पारसी लोग भी उनका अनुसरण करने लगे थे।

शिरडी में अलग-अलग धर्मों के हज़ारों उत्साही तीर्थयात्रियों को देखकर मेरी धड़कन तेज़ हो गई। घंटों इंतजार के बाद मैं अंत में पवित्र गर्भ गृह में प्रवेश कर गई। सफेद संगमरमर से बनी बाबा की आदमकद प्रतिमा ने मेरे भीतर श्रद्धा और विस्मय का बीज बो दिया। रेशम के वस्त्र में लिपटे बाबा पर एक स्वर्ण मुकुट की एक अनूठी आभा अपनी अलग ही छटा बिखेर रही थी। मानो मेरी भावनाओं के आवेग के जवाब में बाबा की आंखों में एक उमंग का आभास हो रहा था और उनके होठों पर एक मधुर मुस्कान थी।

फकीर की कहानी को जानने के लिए दर्शन के बाद मैं द्वारकामाई मस्जिद गई। मुझे यह जानकर अचरज हुआ कि अब जीर्णोद्धार हुई मस्जिद वैसी नहीं है जैसी वो हुआ करती थी। बाबा एक बहुत ही छोटे से मिट्टी के घर में रहते थे जहां फर्श पर घुटने की गहराई तक के गड्ढे थे और जिसकी आधी छत गिरी हुई थी। उन्होंने इस जीर्ण-शीर्ण घर का नाम द्वारकामाई रखा। नालीदार लोहे की छत पत्थर की दीवारों के साथ द्वारकामाई सादगी का प्रतीक थी। संयोगवश द्वारका भगवान कृष्ण का निवास स्थान है।

मस्जिद में धूनी को पकी हुई ईंट के साथ खड़ा किया था। रोचक तथ्य यह है कि सूफी और हिन्दू दोनों परंपराओं में धूनी को बनाए रखना एक महत्वपूर्ण प्रथा है। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि बाबा ने जो आग वर्षों पूर्व जलाई थी वह कभी बुझी ही नहीं। मान्यता है कि बाबा इसकी राख (उड़ी) को बांटा करते थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार इसने उनके भक्तों को बीमारियों से बचाया था। रवाना होने से पूर्व मैंने धूनी के सामने ध्यान लगाए हुए बाबा की मन में तस्वीर उतारी और एक चुटकी भर राख ली।

ऐसा कहा जाता है कि अपने भौतिक शरीर में बाबा ने हिन्दू भक्तों के लिए रामायण और भगवद् गीता तथा मुस्लमानों के लिए कुरान की सिफारिश की है। वह सूफी गानों को सुना करते थे और हर्षोन्माद के साथ इन पर नृत्य करते थे। इसके साथ-साथ वह अद्वैत वेदांत में भी समान रूप से पारंगत थे। बाबा ने अपने संपूर्ण जीवनकाल में हिन्दू और मुस्लिम दोनों को गले से लगाया। उन्होंने अपने जीवनकाल में धर्म की सीमाओं को उसकी पराकाष्ठा तक पहुंचाया।

यदि जन्म और जीवन बाबा को किसी धर्म तक सीमित नहीं कर सके तो मृत्यु ऐसा कैसे कर सकती थी? विजयदशमी के हिन्दू पावन पर्व पर बाबा ने महासमाधि ली। यह रमज़ान का पवित्र महीना भी था। ‘‘9वें महीने की 9वीं तारीख को अल्लाह उस दीपक को बुझा रहे हैं जो उन्होंने जलाई थी’’ बाबा ने इसकी भविष्यवाणी पहले से ही कर दी थी।

फकीर की कहानी को जान घर वापसी के लिए बस पकड़ने के साथ ही बाबा की रहस्यपूर्ण मुस्कान और चमकती आंखे मुझे देखती रहीं। मैंने यह महसूस किया कि एक उत्साही भक्त के लिए बाबा का धर्म कोई मायने नहीं रखता। मेरे व्यक्तित्व के एक हिस्से ने उन्हें मेरे आध्यात्मिक गुरु के रूप में पहले ही स्वीकार कर लिया था, जिन्होंने मानव निर्मित धर्म के बंधन को तोड़ा।

सबका मालिक एक (ईश्वर एक है) शब्द की प्रतिध्वनि मेरे मन में गूंज रही थी।

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