परोपकारी

क्यों होती है दूसरों के प्रति प्यार और परोपकार की ज़रूरत?

यह देखना बेहद सुखद है कि लोग दूसरों की ज़िंदगी में खुशियां भरने के लिए अपनी हद पार कर सहायता करते हैं। ऐसे लोगों की वजह से ही लोगों में छुपी मानवता का दर्शन हो पाता है।

चार वर्ष पहले की बात है, मैं विदेश में शिक्षा हासिल करने के लिए काफी कोशिश कर रही थी। काफी मशक्कत के बाद जब मैंने इसके लिए पैसों की व्यवस्था कर ली, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मैं इतनी ज्यादा खुश थी कि मुझे डर लगने लगा था कि कहीं कोई मुझसे मेरी यह खुशी ना छीन ले। इसी दौरान, मेरी मां ने मुझे बताया कि हमारे घर में काम करने वाली आया अपनी बच्ची की पढ़ाई के लिए पैसा जुटाने के लिए काफी मशक्कत कर रही है। ऐसे में मैंने अपनी आया की बच्ची की पढ़ाई का खर्चा उठाने का निर्णय लिया। मेरे इस फैसले ने ऐसा कमाल किया कि अब मेरे मन से वह डर जाता रहा कि कहीं कोई मेरी खुशी मुझसे ना छीन ले। परोपकारी (Selfless) बनने की वजह से ही मुझे खुशी थी कि मैं अपनी आया की बच्ची की खुशियों में ताउम्र उसकी साथी बन गई थी।

हम अक्सर यह मान लेते हैं कि इंसान खुदगर्ज़ हैं और हमेशा खुद के बारे में ही सोचते रहते हैं। काफी हद तक यह बात सच भी हो सकती है, क्योंकि मैंने उसी वक्त दूसरे के बारे में कुछ करने का सोचा, जब मेरे अपने पास पर्याप्त संसाधन उपलब्ध थे। मनोविज्ञानी एबिगेल मार्श ने भी परोपकार की भावना को समझाने की कोशिश की। ‘टेड टॉक’ में ‘कुछ लोग दूसरों के मुकाबले ज्यादा परोपकारी क्यों होते हैं’ विषय पर विचार रखते हुए उन्होंने इस बात की थाह लेने की कोशिश की थी कि आखिर परोपकार व दूसरों की सहायता करने की प्रेरणा कुछ लोगों में दूसरों की अपेक्षा ज्यादा क्यों होती है। एबिगेल के अनुसार, ‘जैसे-जैसे समाज साधन संपन्न होता जाता है, वैसे-वैसे ही वह अपना ध्यान बाहरी दुनिया पर केंद्रित करने लगता है। इसमें से ही अनजान लोगों के प्रति अपनत्व की भावना पनपने लगती है। इसमें फिर चाहे धर्म को लेकर दान देने की प्रवृत्ति हो या सहायता करने की। यहां तक कि अंगदान जैसे किडनी दान करना जैसे कदम भी इसी भावना के कारण उठाए जाते हैं।

यह बात मासलों पिरामिड हाईरेरकी की अवधारणा से अलग नहीं है। हम सदैव अपनी मूल शारीरिक, भावनात्मक एवं बौद्धिक ज़रूरतों को पाने के लिए प्रयास करने के बाद ही आध्यात्मिक प्यास बुझाने की दिशा में अग्रसर होते हैं। अध्यात्म की प्यास बुझाने का सबसे सरल तरीका दूसरों की सहायता करना व परोपकार करना ही तो होता है, ताकि वह व्यक्ति अपनी ज़िंदगी में कुछ और खुशी के पल जोड़ सके। यही बात मेरे लिए भी सही थी। जब मेरा विदेश में शिक्षा लेने का सपना सच होने लगा, तो मुझे महसूस हुआ कि अब दूसरों को खुशी देने का मेरा नंबर आ गया है। ऐसे में मैंने एक लड़की के भविष्य को संवारने में अपना योगदान दिया, जो संभवत: बड़ी होने के बाद खुद अपने सपने को सच करने के बाद मेरी तरह ही दूसरे की ज़िंदगी में खुशियां भरने में कामयाब होगी।

ऐसा नहीं है कि सभी लोगों के पास समाज को देने के लिए अथाह संपत्ति होनी चाहिए। अब आप ‘द बुक थीफ’ पुस्तक के मुख्य किरदार का ही उदाहरण ले लीजिए। जर्मन परिवार की यह गरीब लड़की लिसेल, अल्प संसाधनों के साथ युद्ध से बदहाल नाजी शासनकाल में रहती थी। अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संघर्षरत यह लड़की हमेशा दूसरों का भला सोचती थी। एक बार उसने सड़क पर एक यहूदी गुलाम को इस बात की परवाह किए बगैर एक ब्रेड पकड़ा दिया था कि ऐसा करने के लिए नाजी सैनिक उस पर कोड़े भी बरसा सकते हैं। ऐसा नहीं है कि हम सभी लिसेल जैसे उदार मन हो सकते हैं, लेकिन हममें से कुछ लोग हमेशा ही परोपकार करते रहते हैं। अधिकतर लोग अपना समय, पैसा या मूल्यवान वस्तु दान करते हैं ताकि किसी और की ज़िंदगी के आंगन में खुशियां खिलखिला सकें। इसमें मूक प्राणी सुरक्षा, बच्चियों की शिक्षा, कैंसर अनुसंधान या फिर ऑटिस्टिक बच्चों की देखभाल करने वाली संस्था को दान देने की बात भी शामिल हो सकती है। लोगों को अपने-अपने स्तर से परोपकार करना ही चाहिए

अब आप आईटी प्रोफेशनल निष्कला चंद्रशेखर का ही उदाहरण ले लीजिए। ये भी अलग तरीके से परोपकार करतीं हैं। वह समय निकालकर ऑटिस्टिक बच्चों को शिक्षा और उन्हें प्रशिक्षण देती हैं, ताकि ऐसे बच्चों की ज़िंदगी बेहतर बन सके। जब आप उनसे पूछते हैं कि आखिर ऐसा वह क्यों करती हैं, तो जवाब मिलता है कि उन्होंने अपने मित्र के पड़ोसी के ऑटिस्टिक बच्चे को होने वाली परेशानी को देखने के बाद ऐसे बच्चों की सहायता का फैसला लिया था। उस बच्चे को देखने के बाद ही मुझे पता चला कि ऐसे बच्चों के प्रति समाज को अलग दृष्टिकोण अपनाना होगा। उन्हें एकदम अलग तरह की सहायता की ज़रूरत है। निष्कला के लिए केवल एक बच्चे की वेदना देखना ही काफी था। इस वेदना ने ही उसे अपनी ज़िंदगी में परोपकार की राह पर चलना सिखा दिया। उस बच्चे ने निष्कला को भीतर तक झकझोर दिया था और इस बात ने उसके जीवन के मायने बदल दिए। निष्कला की तरह हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से परोपकार कर सकता है।

कुछ लोगों के लिए परोपकारी बनने का कारण व्यक्तिगत भी होता हैI परोपकारे के महत्व की बात करें तो शंकर सुब्रमण्यम को ही ले लें, वो एक सॉफ्ट स्किल ट्रेनर हैं। उनकी मां मल्टी स्केलेरॉसिस सोसायटी ऑफ इंडिया (एमएसएसआई) की स्वयंसेवक थीं। उन्हें कैंसर हो गया था। जब शंकर ने देखा कि अब उनकी मां एमएसएसआई के लिए अपना वक्त नहीं दे पाएंगी, तो उन्होंने स्वयं इस काम में हाथ बंटाने का निर्णय लिया। अब शंकर थैंक गॉड इट्स सैटरडे (टीजीआईएस) नामक फोटोग्राफरों का एक समूह चलाते हैं, जो अपने चुनिंदा फोटोस के संग्रह की वर्ष में एक बार नीलामी करते हैंI इससे मिलने वाली राशि एमएसएसआई को दी जाती है। दूसरों के लिए ज़िंदगी जीने वालों को देखने से दिल बाग-बाग हो जाता है। परोपकार करने का बस दिल चाहिए, फिर उसे कैसे करना है वो आप खुद ब खुद ही जान जाते हैं।

के मीरा जो मैसूर में नेत्रहीनों के स्कूल की प्रधानाचार्या के रूप में काम करती हैं, उन्होंने अपने जीवन में परोपकारी से जुड़े ऐसे अनेक उदाहरण देखे हैं। उनका मानना है कि हम अपने बच्चों को भोजन किस तेल में बनाकर खिला रहे हैं इसे लेकर वह काफी सचेत रहती हैं। इसके बावजूद हमारे लाभार्थियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। किसी केटरिंग वाले को ऑर्डर देने की बजाय वह अपना भोजन स्वयं बनाना पसंद करती हैं।

मुझे ऐसा लगता है कि हम उदार मन लोगों से घिरे हुए हैंI हमारे ही बीच में कुछ ऐसे लोग हैं, जो कैटरिंग का ऑर्डर देकर भी अपने हिस्से का काम कर सकते हैं, लेकिन वे सैकड़ों नेत्रहीन बच्चों के लिए स्वयं स्वच्छ भोजन पकाने में विश्वास रखती हैं। हमारे बीच ही कुछ ऐसे छायाचित्रकार हैं जो अपने चुनिंदा छायाचित्रों की नीलामी कर काफी पैसा कमा सकते हैं, लेकिन वे लोग इसका उपयोग भयावह बीमारियों के प्रति जनजागरण करने वाली संस्थाओं को सहायता मुहैया करावने के लिए उनकी नीलामी को ज्यादा तरजीह देते हैं। कुछ ऐसे पेशेवर भी हैं, जिनके पास सांस लेने तक की फुर्सत नहीं है, लेकिन वे समय निकालकर ऑटिस्टिक बच्चों की जिंदगी सुकूनभरी बनाने में सहयोग करते हैं।

परोपकार (Paropkar) के महत्व को समझ शायद हम सभी इस समस्याओं से भरी दुनिया को बेहतर बनाना चाहते हैं। संभवत: हम शुक्रगुजार हैं उन चीज़ों के लिए जो हमारे पास हैं और वही चीज़ ऐसे लोगों को मुहैया करवाना चाहते हैं, जिनके पास इन चीज़ों का अभाव है। शायद ऐसे लोगों के चेहरे पर खुशी देखकर ही हम खुश होते हैं। संभवत: दूसरों को पीड़ा में देखकर हम बैचैन हो जाते हैं।

कारण चाहे कोई भी हो, लेकिन मुझे इस बात का संतोष है कि हम दुनिया को फिर से एक ऐसी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो मानवीय संवेदनाओं से भरी हो।

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