पूरी दुनिया एक रंगमंच

पूरी दुनिया एक रंगमंच

प्रदर्शन कला के क्षेत्र में लगभग 15 से अधिक वर्षों से परफॉमेंस आर्टिस्ट अरका मुखोपाध्याय काम कर रहे हैं। इस दौरान प्रदर्शन कला के मनोवैज्ञानिक पहलुओं ने उन्हें काफी आकर्षित किया है। इस फीचर के माध्यम से सोलवेदा ने कलाकार के कार्यों और उनकी सोच के खास दायरे को बाहर लाने का एक अनूठा प्रयास किया है।

अंग्रेजी के महान कवि और नाटककार विलियम शेक्सपियर ने कहा है, “पूरी दुनिया एक रंगमंच है और सभी महिलाएं और पुरुष महज इसके अलग-अलग किरदार हैं।” अंतरिक्ष की विशाल शून्यता के बीच स्थित पृथ्वीरूपी इस भव्य मंच पर हम जन्म से लेकर मृत्यु तक, हर दिन नए-नए किरदार निभाते नज़र आते हैं। मगर, गुजरते समय के साथ हम सभी का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आखिरकार आध्यात्मिक रूप से विकास होता है। ऐसे दर्शक, जिन्हें हम जानते तक नहीं, उनके लिए अपने हिस्से के किरदार को पूरी शिद्दत के साथ निभाते हैं और अपनी क्षमता के मुताबिक खुद को अभिव्यक्त भी करते हैं। इस तरह हमारी जिंदगी खुद-ब-खुद एक कला के स्वरूप में नज़र आती है। वो भी यह दुनिया के सबसे खूबसूरत ग्रह पर यह सब हो रहा है। यहीं कारण है कि हममें से कई लोग स्वाभाविक तौर पर कला के विभिन्न स्वरूपों से जुड़ सकते हैं-विशेषकर परफॉमेंस आर्ट से।

जिस प्रकार इस ब्रह्मांड से हमारे जीवन का निरतंर जुड़ाव है, उसी तरह ये कलाएं भी जुड़ी हुई हैं, भले ही यह छोटे स्तर पर ही क्यों न हो।  इसमें निरंतर बदलाव और लय समाहित है। यहां तक कि कुछ देर की स्थिरता में भी एक ठहराव लय से अधिक गतिशील होता है। एक कलाकार के भीतर मौजूद सोच और भावनाओं को सामने लाकर परफॉमेंस आर्ट किसी इंसान की सबसे पवित्र और एकदम अपरिष्कृत स्वरूप को अभिव्यक्त करता है। इसका न सिर्फ कलाकार पर, बल्कि दर्शकों पर भी काफी प्रभाव पड़ता है।

प्रदर्शन कला के क्षेत्र में लगभग 15 से अधिक वर्षों से परफॉमेंस आर्टिस्ट (Performance Artist) अरका मुखोपाध्याय काम कर रहे हैं। इस दौरान प्रदर्शन कला के मनोवैज्ञानिक पहलुओं ने उन्हें काफी आकर्षित किया है। कैसे शारीरिक हाव-भाव, आसन और मुद्रा हमारे भीतर की अंत: स्थिति को प्रभावित करती है और दोतरफा होता है। फिलहाल, अरका मुखोपाध्याय अपना खुद का एक संगठन चला रहे हैं, जिसका नाम ‘ज्योतिर्गमय’ है। यह संगठन पारंपरिक और समकालीन कला के विभिन्न स्वरूपों के जरिए बातचीत के माध्यम से ‘चेतना’ के विचार को बाहर लाता है। इस फीचर के माध्यम से सोलवेदा ने कलाकार के कार्यों और उनकी सोच के खास दायरे को बाहर लाने का एक अनूठा प्रयास किया है।

हालांकि, बताने के लिए मेरे पास बहुत कुछ नहीं है। फिर भी मेरी यात्रा बेहद ही मौलिक रही है। जिंदगी के हर मोड़ पर मैंने अर्थ और सच्चाई की खोज की है और मेरे दिल ने जिस चीज को करने की गवाही दी है, मैंने वही किया है। मैंने थिएटर में कोई प्रोफेशनल ट्रेनिंग नहीं ली है। मगर, कलारिपयट्टू में मैंने करीब 10 सालों से भी अधिक समय तक बिताया है। मुझे एकमात्र औपचारिक प्रशिक्षण वहीं से मिला है। मैंने कूडियाट्टम के कलाकारों, बाउल और कव्वालों को बेहद करीब से देखा है और मैंने नृत्य और रंगमंच के समकालीन जानकारों से भी काफी कुछ सीखा है। मैं एक छात्र की तरह हूं, जो हमेशा कुछ न कुछ सीखने की चाह रखता है। हालांकि, मैं बहुत अच्छा छात्र भी नहीं हूं। फिर भी मैं देखता हूं, मैं हैरान होता हूं और नाटक करता हूं और कभी-कभी इसमें प्रयोग भी करता हूं। मैं यह कभी नहीं सोचता कि आपकी बेवकूफी को देखकर सामने वाला आपके बारे में क्या सोच रहा होगा। और इस तरह मैं हमेशा काम करता रहा हूं और उसका जवाब तलाशता रहता हूं।

फिलहाल, अभी आप ज्योतिर्गमय नामक एक छोटीसी संस्था चलाते हैं। इसका ख्याल कैसे आया?

इसका वास्तविक नाम ज्योतिर्गमय नाट्य कलारी है, जिसका अर्थ ज्योतिर्गमय रंगमंच प्रयोगशाला है। साल 2016 में मेरे पिता जी का निधन हो गया, उस वक्त मैं केरल में था। इस सदमे से खुद को बाहर निकालने के लिए और अंधेरे से प्रकाश की ओर बढ़ने के लिए मैं काफी प्रयास कर रहा था और इस तरह ज्योतिर्गमय नाट्य कलारी बनाने का ख्याल मेरे मन में आया। बेशक, उस समय तक मैं करीब 13 साल से इस क्षेत्र में था, लेकिन, मैं एक नए सिरे से शुरुआत करना चाहता था। मैंने कई लोगों को फोन घुमाया और कुछ कलाकार इससे जुड़ भी गए और इस तरह हमारा कारवां चल पड़ा। फिलहाल, अभी हम लोग रवींद्रनाथ टैगोर का मशहूर नाटक ‘डाकघर’ पर आधारित ‘इन सर्च ऑफ अमल’ नामक एक अनूठे परफॉमेंस एंड एजुकेशनल प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। हम लोगों के पास अब कुडियाट्टम और यक्षगान जैसे पारंपरिक स्वरूपों, समकालीन नृत्य, माइम, थिएटर आदि से कलाकारों का एक शानदार समूह है। इसके साथ ही हम लोग एक ऐसे चरित्र को गढ़ रहे हैं, जिसका नाम अमल है। वह युवा पात्र एक गंभीर बीमारी से पीड़ित है। उसका शरीर भले ही मरने के कागार पर पहुंच गया है, लेकिन उसका मन स्वच्छंद है। वह कहता है कि दुनिया में जो कुछ भी देखने लायक है, वह उसे देखना चाहता है। वह अपनी कल्पनाओं में ब्रह्मांड के सबसे आखिरी छोर तक यात्रा करता है। अपनी इस खास पहल के जरिए हम लोग अपने दायरे बाहर निकलने, दुनिया को समझने, अपने आस्तित्व को लेकर असीम कौतुहल भरी नज़रों से सवाल करते हैं कि आखिर इसके क्या मायने हैं। यह महज प्रदर्शन कला नहीं है, वर्ना एक शैक्षिक प्रक्रिया भी है, जिसके जरिए हम लोग पहले से ही शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाली ऐसी एनजीओ के साथ काम कर रहे हैं, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों और लोगों की भलाई के लिए काम करती हैं। इसके अलावा हम लोग ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों और तस्करी के दौरान रेस्क्यू किए गए लोगों के लिए भी काम करना चाहते हैं।

परफॉर्मिंग आर्ट्स के साथ तन और मन को चैतन्य और सहक्रिया के साथ जोड़ने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

दरअसल, परफॉर्मिंग आर्ट्स का जुड़ाव प्रकृति से ही है। वैसे ही जैसे हमारे तन-मन, भावनाओं और आत्मा के साथ है। दूसरे शब्दों में यूं कहें तो वर्तमान समय में खुद-ब-खुद विद्यमान है। यही वजह है कि इसके लिए मुझे किसी खास प्रेरणा की ज़रुरत महसूस नहीं हुई। परफॉर्मिंग आर्ट्स के साथ काम करके मैंने यह जाना है कि जीवन में सामंजस्य कैसे बिठाना है। जो मैं कहना चाह रहा हूं वो यह है कि जब हम मंच पर मौजूद होते हैं, तो हमें अपने पूरे शरीर के साथ उपस्थित होने की ज़रुरत होती है। तो ऐसा कुछ नहीं है, जिसे हमें अलग से कनेक्ट करने की आवश्यकता है।

परफॉर्मिंग आर्ट्स के साथ काम करना एकरूपता का पता लगाने जैसा है। मैं जो कहने की कोशिश कर रहा हूं, वह यह है कि जब हम मंच पर होते हैं, तो हमें अपने पूरे शरीर के साथ उपस्थित होने की आवश्यकता होती है। इसके लिए ऐसा कुछ नहीं है, जिसे हमें अलग से जुड़ाव होने की ज़रुरत महसूस कराए।

मिसाल के तौर पर “इम्बाडीड परफॉर्मेंस तकनीक” किसी आर्टिस्ट को अपनी रचनात्मक प्रस्तुति के दौरान सशरीर मौजूद रहना सिखाती है। उस वक्त न दिमाग में कोई चीज होती और न ही लिखित रूप में कुछ होता है। मंच पर सिर्फ और सिर्फ जीवंत व स्पंदित शरीर होता है, जो अपनी सारी सुंदरता और खामियों के साथ शुरुआत के लिए तैयार रहता है। इस प्रकार हमारी इंद्रियां काफी सक्रिय और सतर्क हैं, फिर भी हम गहरे मौन में डूबे हुए हैं।

सहृदय के बारे में आपका क्या विचार है, जो किसी आर्टिस्ट को जागरूकता की सर्वोच्च स्थिति में ले जाता है, इसके बारे में हमें बताएं?

सहृदय (अर्थात् दिल से’) एक कलाकार से संबंधित है, जिसकी एक चमक व आकर्षण है। अपने साथी रचनाकारों और पूरी कायनात के साथ वह अपनी आंतरिक जागरूकता के साथ मौजूद रहता है। यह एक आर्टिस्ट ही है, जो अतिसंवेदनशील होने, आध्यात्मिक रूप से शून्य होने और बिना किसी दिखावे के बड़े ही कोमलता के साथ मिलने-जुलने का साहस रखता है। इसलिए प्रदर्शन कला में मैंने जो अपना दृष्टिकोण विकसित किया है, उसी के लिहाज से यह नाम मैंने चुना है। यह भारत की अलग-अलग प्रदर्शन कलाओं जैसे मार्शल आर्ट, गीत और परंपरा से जुड़े कलाकारों की 10 साल की सामूहिक शोध पर आधारित है। इसके साथ ही यह हमारे और आवाज की मूल संभावनाओं से भी जुड़ा हुआ है।

इसके काम का आधार बेहद ही साधारण है। जैसे हम प्रतिदिन सांस लेते हैं, यह कुछ इसी तरह का है। मगर, इसे आंतरिक और बाहरी दुनिया के बीच एक सेतु के रूप में देखा जाता है। यह लयबद्धता व जीवंत शरीर का एक आधार है। एक ऐसा शरीर जो अपनी रचनात्मक क्षमता को लेकर सजग है। यह काम के मूलवस्तु को विभिन्न विधाओं (कलारिपयट्टू, बाउल प्रैक्सिस, कूटियाट्टम, बुटोह और अन्य) से आकर्षित करता है, लेकिन इसका सबसे अधिक फोकस मानव शरीर पर रहता है। यह एक तरह से हमारे शरीर और कल्पनाशक्ति को चुनौती देता है। हमारे फोकस, ध्यान, स्पष्टता और तैयारी को दुरुस्त करता है। हमारे शरीर और अभिव्यक्ति की भाषा को समृद्ध करता है जो आंतरिक जीवन से जुड़ा होता है।

कला हमें एक अंतर्लीन यात्रा पर ले जाती है। इस से किसी कला के स्वरूप का अभ्यास करना खुद में आध्यात्मिक अभ्यास जैसा है। आध्यात्मिकता आध्यात्मिक होने पर आपकी क्या राय है?

दरअसल, पहले मैं खुद को काफी आध्यात्मिक समझता था, मगर हाल ही में मैंने अपनी यह सोच बदल ली है। यदि हम अध्यात्म की बात करते हैं, तो इसका मतलब उपस्थिति, जुड़ाव और जागरूकता से है। तब यह कुछ संभ्रात या चंद लोगों के लिए उपलब्ध नहीं है। यह हमारी स्वाभाविक अवस्था है। इसलिए आध्यात्मिकता जैसी कोई चीज ही नहीं है। महज इसका अभाव मात्र है।

क्या आप मानते हैं कि परफॉर्मिंग आर्ट्स हमारी भलाई के मामले में और इजाफा कर सकती है

बिल्कुल, परफॉर्मिंग आर्ट्स ऐसा कर सकती है। इसका उद्देश्य सभी को एक आर्टिस्ट बनाने के लिए मात्र ट्रेनिंग देना नही है। इसके अलावा भी यह अपने आप में बहुत कुछ है। यह अपने हुनर को दिखाने, आंतरिक शांति की तलाश करने, स्थिरता पाने और एक व्यवस्थित ढंग से रहने की जगह है। इसलिए यह कुछ हद तक संपूर्णता का अहसास कराने में मदद करता है। यह हमें खुद को अपने आप से जोड़ने में मदद करता है। यह हमारी जिंदगी और उत्साह के भाव को मजबूती प्रदान करता है। परफॉर्मिंग आर्ट्स हमारे अस्तित्व के सभी पहलुओं-शरीर, मन, भावनाओं व रचनात्मकता पर काम करती है। ये सभी हमें शारीरिक रूप से चुस्त-दुरुस्त रहने, मानसिक रूप से फोकस व बैलेंस रखने और हमारी क्रिएटिविटी और इमोशन को जोड़े रखने में सहायता करते हैं।

  • अरका मुखोपाध्याय

    अरका मुखोपाध्याय पेशे से एक थिएटर आर्टिस्ट, डायरेक्टर और प्रोसेस फैसिलिटेटर हैं। इन्होंने अलग-अलग समकालीन पश्चिमी रंगमंच तकनीकों के साथ भारतीय प्रदर्शन कला जैसे योग और कलारीपयट्टू के जरिए लोगों के भीतर मौजूद कला को बाहर लाने का प्रयास करते रहते हैं। अरका शेक्सपियर पर आधारित सोलो परफॉर्मेंस के मामले में पारंगत हैं। वे दुनिया भर में अपनी कला का बखूबी प्रदर्शन कर चुके हैं। इसके लिए उन्हें अपनी शैली के लिए कई पुरस्कार और सम्मान से नवाजा जा चुका है।
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