सुनने की कला

सुनने की कला

एक बिंदु आता है जब तुम आनंद से इतने भर जाते हो कि तुम पूरी दुनिया के साथ बांटने लगते हो और फिर भी तुम्हारा आनंद उतना ही बना रहता है।

तुम्हारे मन पर सतत चारों तरफ से तरह-तरह के विचारों का आक्रमण होता है। स्वयं का बचाव करने के लिए हर मन ने बर्फ की एक सूक्ष्म दीवार सी खड़ी कर ली है ताकि ये विचार वापिस लौट जाएं, तुम्हारे मन में प्रवेश न करें। मूलत: यह अच्छा है लेकिन धीरे-धीरे ये बर्फ इतने अधिक बड़े हो गए हैं कि अब ये कुछ भी अंदर नहीं आने देते। अगर तुम चाहोगे भी तो भी तुम्हारा उन पर कोई नियंत्रण नहीं चलता। और उन्हें रोकने का वही तरीका है जिस तरह तुम अपने स्वयं के विचारों को रोकते हो।

सिर्फ अपने विचारों के साक्षी बनो। और जैसे-जैसे तुम्हारे विचार विलीन होने शुरू होंगे, इन विचारों को रोकने के लिए बर्फ की जरूरत नहीं पड़ेगी। वे बर्फ गिरने लगेंगे। ये सारे सूक्ष्म तत्व हैं, तुम उन्हें देख न पाओगे लेकिन तुम्हें उनके परिणाम महसूस होंगे।

जो आदमी ध्यान से परिचित है वही सुनने की कला जानता है। और इससे उल्टा भी सच है: जो आदमी सुनने की कला जानता है वह ध्यान करना जानता है क्योंकि दोनों एक ही बातें हैं।

पहला चरण : किसी वृक्ष के पास बैठो या अपने बिस्तर पर बैठो, कहीं भी। और सड़क पर चलनेवाली यातायात की आवाज सुनना शुरू करो लेकिन समग्रता से, तन्मयता से, कोई निर्णय लिए बिना कि यह अच्छा है कि बुरा है।

तुम्हारे विचार कम हो जाएंगे और उसके साथ तुम्हारे बर्फ भी गिर जाएंगे। और अचानक एक द्वार खुलता है जो तुम्हें मौन और शांति में ले जाता है।

सदियों से हर किसी के लिए यह एकमात्र उपाय रहा है, स्वयं की वास्तविकता के और अस्तित्व के रहस्य के करीब आने का और जैसे-जैसे तुम करीब आने लगोगे तुम्हें अधिक शीतलता महसूस होगी, तुम अधिक प्रसन्न अनुभव करोगे, कृतकृत्य, संतुष्ट, आनंदित अनुभव करोगे। एक बिंदु आता है जब तुम आनंद से इतने भर जाते हो कि तुम पूरी दुनिया के साथ बांटने लगते हो और फिर भी तुम्हारा आनंद उतना ही बना रहता है। तुम बांटते चले जाते हो लेकिन उसे चुकाने का कोई उपाय नहीं है।

यहां तुम सिर्फ विधि सीख सकते हो; फिर तुम जब सुविधा हो, तुम्हें उस विधि का उपयोग करना है जहां कहीं भी, जब भी संभव हो। और तुम्हारे पास इतना ज्यादा समय होता है ––बस के लिए खड़े होते हुए, रेलगाड़ी में बैठे हुए, बिस्तर पर लेटे हुए।

ओशो: दि ओशो उपनिषद # 16

ओशो को आंतरिक परिवर्तन यानि इनर ट्रांसफॉर्मेशन के विज्ञान में उनके योगदान के लिए काफी माना जाता है। इनके अनुसार ध्यान के जरिए मौजूदा जीवन को स्वीकार किया जा सकता है।

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