हर राह ईश्वर तक नहीं पहुंचती

हर राह ईश्वर तक नहीं पहुंचती

हम सभी अक्सर यह दावा करते हैं कि हम जिस भी धर्म, मत, पंथ या राह पर चल रहे हैं, वह हमें ईश्वर के पास पहुंचा देगी। हम ईश्वर के पास पहुंचना चाहते हैं क्योंकि हम सभी ईश्वर से बहुत प्रेम करते हैं।

दुनिया में कई तरह के प्रेम होते हैं। कइयों का प्रेम मातृभूमि से होता है। इस प्यार में वे अपना जीवन देश पर कुर्बान कर देते हैं। कुछ का प्रेम व्यक्तिगत संबंधों से होता है, जैसे मां का अपने बच्चे से। वह बच्चों पर बलिहार जाती हैं। दुनिया में आशिक और माशूक के प्रेम के भी कई उदाहरण हैं, परंतु एक ऐसा प्रेम, जो सनातन है, एक जन्म का नहीं परंतु जन्मों-जन्मों का है, वह है ईश्वर से प्रेम। दुनिया में मुश्किल ही कोई ऐसा होगा जो यह स्वीकार करे कि उसे ईश्वर से प्रेम नहीं है। यहां तक कि एक नास्तिक के भी दिल में झांके तो पाएंगे कि ईश्वर के प्रति मन के किसी कोने में प्रेम, आस्था, भावना और विश्वास अवश्य भरा हुआ है। उस परमात्मा को पाने के लिए, उस तक पहुंचने के लिए, उसकी एक झलक पाने के लिए न जाने कितने साधू, संन्यासी, संत, महात्माओं ने भूखे-प्यासे रहकर, टांग पर टांग चढ़ाकर कठोर साधनाएं की। उस परमात्मा के प्यार में न जाने कितने प्रभु परवानों ने काशी कलवट खाई। कितने ही कवियों ने ईश्वर के प्रेम में दोहे, गीत, कविताएं, गज़ल, शायरी आदि लिखे तथा गाए हैं। भक्तजन उनकी महिमा में आरती, भजन, श्लोक आदि गाते, माला जपते और उनका ईश्वर तक पहुंचने का प्रयास आज भी जारी है।

हम सभी चाहे किसी भी धर्म के हों, ईश्वर से बहुत प्रेम करते हैं। इसीलिए मेहनत करके, पैसा खर्च करके मंदिर, मस्ज़िद, गिरिजाघर, गुरुद्वारा बनाते हैं। इतना सब करने के पीछे हमारा लक्ष्य यही होता है कि इनके माध्यम से जीते जी ईश्वर को पाएं, नहीं तो शरीर छोड़ने के बाद परमात्मा के पास अवश्य पहुंच जाएं।

ईश्वर तक पहुंचने से पहले यह जानना सर्वाधिक आवश्यक है कि ईश्वर कौन है, कहां रहते हैं (निवास स्थान) तथा ईश्वर तक पहुंचने वाला कौन अर्थात अपना भी सत्य परिचय। अपना व ईश्वर का सत्य परिचय जाने बगैर ईश्वर तक पहुंचना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है, चाहे राह कोई भी हो। आज तक जितने भी लोगों ने ईश्वर तक पहुंचने की राहें बताई हैं, वे सभी एक-दूसरे के विरुद्ध हैं। साधू-संन्यासियों का मानना है कि जप-तप-दान-पुण्य करने से ईश्वर तक पहुंच सकते हैं। कर्म सिद्धांत वालों का मानना है कि कर्म ही पूजा है, नेक कर्म करने पर ईश्वर तक पहुंच सकते हैं। भक्ति भावना में डूबे भक्तों का मानना है, ईश्वर सर्वव्यापी हैं, जिधर देखूं तू ही तू नज़र आते हो। सत्यवादी सिद्धांत वालों का मानना है, ईश्वर सत्य है, सत्य की नाव पर चलने से पार हो जाएंगे। प्रकृति, प्रेमी प्रकृति को ही ईश्वर मानते हैं। अनेकानेक मत होने के कारण लोग मूंझ गए हैं और यही मानना शुरू कर दिया है कि किसी भी राह पर चलकर ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है, हर राह उन तक पहुंचती है।

अंग्रेजी में एक कथन है All roads lead to Rome अर्थात ‘सब रास्ते रोम जाते हैं।’ इस कथन का भावार्थ है, मंजिल एक, राह अनेक। इस कथन को लोगों ने ईश्वर तक पहुंचने का कथन भी मान लिया है। उदाहरण के तौर पर अगर एक व्यक्ति को दिल्ली जाना होता है, तो वह किसी भी माध्यम से, चाहे बस से, रेलगाड़ी से वा हवाई जहाज से जा सकता है, क्योंकि उसे दिल्ली के बारे में पूरी जानकारी है, जैसे दिशा, रूट, गाइड इत्यादि। इसी दृष्टांत को अगर ईश्वर तक पहुंचने से जोड़ें, तो सवाल उठता है कि क्या हम ईश्वर को इतना स्पष्ट रीति से जानते हैं जितना कि दिल्ली के बारे में जानते हैं? नहीं ना। ईश्वर तक पहुंचने का नक्शा अभी तक कोई भी त्रुटिरहित बना ही नहीं पाया, इससे परमात्मा तक पहुंचना तो दूर और ही दूरियां बढ़ गई हैं। अगर, उन तक पहुंचना संभव होता तो आज जनसंख्या में इतनी वृद्धि ही नहीं होती। इससे तो यही लग रहा है कि उनके पास कोई आज तक पहुंचा ही नहीं, सभी जन्म-मरण का चक्र यहीं लगा रहे हैं।

श्रीमदभगवद् गीता में भगवान का वायदा है –

यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं।।

अर्थात जब-जब सृष्टि पर धर्म की ग्लानि होती है, अधर्म की वृद्धि होती है तब मैं अवतरित होता हूं। परमात्मा अपना परिचय स्वयं इस धरती पर आकर देते हैं, इसलिए उनको स्वयंभू तथा खुदा (खुद + आ) भी कहते हैं। वे सत्य धर्म की स्थापना करते हैं। अगर, मनुष्यों द्वारा बताई गई राहों पर चलकर ईश्वर के पास पहुंचना संभव होता, तो फिर ईश्वर को इस धरा पर आने की क्या आवश्यकता है। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि कोई भी देवी-देवता, गुरु, धर्मस्थापक या मनुष्य, ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता बता नहीं सकता। अब तक जितनी भी राहें बताई गई, वे राहें ईश्वर तक नहीं पहुंचती। इसी कारण दिन-प्रतिदिन अधर्म-पापाचार, भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है।

ईश्वर की राह पर चलने वाला कौन? शरीर या आत्मा? ईश्वर की राह पर चलने वाली है अजर, अमर, अविनाशी चैतन्य आत्मा। आत्मा ही सत्य की राह पर चलती है। आत्मा का मूल स्वभाव प्रेम, आनंद, शक्ति, सुख, शांति, पवित्रता और ज्ञान है जबकि शरीर के भान से काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार की उत्पत्ति होती है।

अपने आपको आत्मा (सत्य) निश्चय कर और परमात्मा से अपना नाता जोड़ना, इसको राजयोग कहा जाता है और यही ईश्वर तक पहुंचने की सत्य राह है। यह तो सभी मानते हैं कि सत्य की ही जीत होती है। आपका एक कदम यदि सत्य की इस राह पर चले, तो सारे विश्व का कल्याण हो सकता है और आपके खाते में पदम गुणा पुण्य जमा हो सकता है।

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