काल-चक्र में प्रेम की दास्तान

काल-चक्र में प्रेम की दास्तान

प्रेम एक ऐसा दिव्य गुण है, जो इस सारे संसार-चक्र अथवा युग-चक्र की धुरी है। सतयुग और त्रेतायुग की मूलभूत विशेषता यह थी कि उस काल में प्रेम पवित्र एवं आध्यात्मिक रूप से व्यवहृत होता था।

इन दो युगों के बारे में लाकोक्तियों में यह कहा गया है कि ‘तब शेर और गाय एक घाट पर पानी पीते थे’ और ‘घी तथा दूध की नदियां बहती थी’। ये प्रेम ही के प्रताप की गाथा है क्योंकि प्रेम के बिना एक घर में दो मनुष्य भी इकट्ठे रह कर पानी पीने को तैयार नहीं होते और दूध की नदियों की बजाय वे रक्त की नदियां बहाने को उद्यत हो जाते हैं।

शुद्ध प्रेम है, तो संसार स्वर्ग है

उस प्रथम कल्पार्द्ध में राजा द्वारा प्रजा का शोषण न होना और प्रजा में भी आर्थिक संघर्ष का अव्याप्त होना भी इसी प्रेम के ही सुफल हैं। तब दिव्य प्रेम के कारण ही एकता थी और राज्य की अखंडता थी। प्रेम के प्रभाव से ही सभी लोग एक परिवार के सदस्यों की न्यायीं रहते थे। अतः उस काल में तराजू या गज-मीटर के द्वारा तोल-माप की खींचातानी की आवश्यकता नहीं थी, न ही वस्तुओें के मूल्य चुकाए जाते थे। जब हीरे-मोती ही भवनों की दीवारों में लगे रहते थे और उन्हें देखकर सभी खुश थे और किसी के मन में ईर्ष्या या स्तेय का भाव नहीं था, तब अन्य वस्तुओं की दलाली, परचून क्रय-विक्रय और टैक्स या ‘कर’ की क्या बात हो सकती थी? तब तो विस्तृत एवं व्यापक प्रेम के कारण उदारता ही का व्यवहार और व्यापार था, जिसमें देने की भावना अधिक और लेने की इच्छा कम थी। तब मुद्रा का प्रयोग कम और उपहार का प्रचलन अधिक था। तब न तो बनियों के जैसी व्यापार-पद्धति थी और न कॉमरेडों की तरह बंटवारे एवं वितरण की कश्मकश थी बल्कि नज़राने, भेंट, सौगात, उपहार आदि के रूप में वस्तुओं को देने-लेने की प्रथा अधिक थी। तब जो सर्व गुणों की तथा मर्यादाओं की विद्यमानता थी, उसका बीज भी पारस्परिक प्रेम ही में छिपा था क्योंकि जहां शुद्ध प्रेम है वहां संतुष्टता, मधुरता, सरलता और हर्षितमुखता आदि स्वतः ही होंगे। जब प्रेम होगा तो कोई कटु व्यवहार क्यों करेगा, असंतुष्ट कैसे होगा और निंदा क्यों करेगा? अतः प्रेम शुद्ध हो तो यही संसार स्वर्ग है और प्रकृति भी प्रेम के प्रभाव से पूर्णतः विकसित होकर वैसी ही भूमिका अदा करती है।

प्रेम की विकृति

द्वापरयुग और कलियुग में प्रेम विकृत होकर काम, लोभ, मोह, आसक्ति और स्वार्थ का रूप धारण कर लेता है। वह संकीर्ण हो जाता है और परिवार, वंश, देश और जाति आदि की सीमाओं में बंध जाता है। इस प्रकार प्रेम के बंटवारे से राज्य, संपत्ति और वफादारी का भी बंटवारा हो जाता है और यह झगड़ों की जड़ बन जाता है। तब विकृत प्रेम के विकट परिणाम से पीड़ित होकर किसी का प्रेम भक्ति में, किसी का पूजा में, किसी का माला-सिमरण में, किसी का प्रभु में और किसी का शास्त्र में सहारा ढूंढ़ता है। इस प्रकार, भक्ति मार्ग भी प्रेम ही की किसी-न-किसी प्रकार की भूमिका लिए हुए है। कोई पति रूप में प्रेम में प्रभु को पाना चाहता है, तो कोई स्वामी-सेवक के प्रेम-परिवेश में। तुलसीदास की तरह कोई पत्नी से प्रेम के प्रस्ताव के ठुकराए जाने पर राम से प्रेम करने लगता है, तो कोई सूरदास की तरह प्रेम की विकृति से पीड़ित होकर अपनी आंखों में सुआ-सलाई मार कर ‘बाल-गोपाल’ से प्रेम करने लगता है। कोई स्वयं को गिरधर के लिए मीरा की तरह ‘री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दर्द न जाने कोय’ के स्वरालाप में मस्त हो उठता है, तो कोई जायसी की तरह उसे प्रेमिका के रूप में पाए जाने पर काव्य रच डालता है।

प्रेम ही परिवर्तन का मूल तथा प्रगतिकारक

फिर, संगमयुग में परमपिता परमात्मा आकर आत्माओं को ‘प्यारे बच्चे’, ‘सिकीलधे बच्चे’, ‘नूरे चश्म’ आदि प्रेम-सूचक शब्दों से संबोधित करते हैं और आत्माएं भी उन्हें ‘परमप्रिय’ कहकर उनसे सर्व संबंधों का प्रेम जोड़ती हैं। आत्माएं ईश्वरीय ज्ञान इसीलिए प्राप्त करती हैं, ताकि उन्हें पता चले कि प्रेम देह या प्रकृति के पदार्थों से न करके परमपुरुष परमात्मा से करना है, जिसका अमुक परिचय है। फिर इसी प्रेम से प्लावित होकर अपने प्रियतम की स्मृति में मन को लीन कर देना ही योग है। प्रेम के बिना योग (चाहे उसमें प्रणायाम या आसन न हो) तो हठक्रिया ही है। अपने प्रियतम प्रभु के प्रेम में सब-कुछ न्योछावर करना ही त्याग है, उसके प्रेम में अनन्य-भाव ही ब्रह्मचर्य है, उस प्रेमी को प्रसन्न करने के लिए चांद और तारे भी तोड़ कर लाने को तैयार होना ही उसकी आज्ञाओें का सहर्ष पालना करना है। इसी प्रकार, ईश्वर-प्रेम दिव्य गुणों के विकास की भी सही चाबी है। फिर, जिससे प्रेम हो उसके अनुसार सेवा तो की ही जाती है। प्रभु-प्रेम के कारण ही संगमयुग के जीवन में समूचा मनोपरिवर्तन होता है, जिसमें शिव बाबा के लिए जितना प्रेम है, उतना ही वह लग्न में मग्न है, उतना ही वह वफादार और फरमानबरदार भी है। प्रभु-प्रेम वाले को ही नशा रहता है और वही नष्टोमोहः भी होता है, जिसका प्रकृति से प्रेम है, वह भोगी है और जिसका प्रभु से प्रेम है, वही योगी है।

सारे पुरुषार्थ का पारखी है प्रेम

इस प्रकार, सारे पुरुषार्थ का पारखी प्रेम ही है। प्रभु-प्रेम करने वाली आत्मा पर से ही माया का जंक उतरता है और जो ईश्वर रूपी शमा पर परवानों की तरह फिदा होता है वही प्रभु का प्रेम-पात्र होता है। प्रभु के प्रेम की भी 7 भूमिकाएं हैं, जिनका स्थान-अभाव के कारण हम वर्णन नहीं कर रहे हैं परंतु यह निश्चित है कि जिसका शिव बाबा से प्रेम है, उसे तो उसकी याद सदा आएगी ही। प्रेम के बिना तो निरंतर योगी बनना असंभव ही है। जिसे परमपिता से प्रेम है, वह उन पर तन-मन-धन से कुर्बान भी जाएगा क्योंकि प्रेमी तो अपने प्रेम-पात्र के लिए सबकुछ लुटा देता है। उसे न लोक-लाज रहती है, न वह सितम सहन करने से घबराता है। प्रेम ही मनुष्य को निद्राजीत बनाता है और प्रेम ही मैं और मेरे के भाव को मिटाता है। अतः प्रेम के बिना योग का रसास्वादन करने की इच्छा करना, रेत में से घी प्राप्त करने की व्यर्थ कामना करना है।

संक्षेप में कहें तो 5 युगों की कहानी पर विचार करने से यही मालूम होता है कि वास्तव में यह सारा विश्व-नाटक ही एक लंबी प्रेम-कहानी है। जो प्रभु से प्यार करता है, वह देवता बनता है, स्वर्ग का सुख पाता है और जो प्रभु-प्यार की अवहेलना कर प्रकृति के पाश को प्रेम मानता है, वह असुर बन नरकगामी होता है। इस रहस्य को जानना ही सच्चे प्रेम का पथिक बनना है।

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