हिंदू धर्म की जड़ें

हिंदू धर्म की जड़ें

आज, हिंदू धर्म में पेड़-पौधों, प्राणियों, पहाड़ों, नदियों, पत्थरों और मंदिरों में प्रतिष्ठापित देवताओं की मूर्तियों की पूजा प्रमुख है। यह पूजा कहां से शुरू हुई? हड़प्पाई काल से या उससे भी पहले की जनजातियों की प्रथाओं से?

आम तौर पर हिंदू धर्म को इतिहास के दृष्टिकोण से सिखाया जाता है। उसके अनुसार 4000 वर्ष पहले हड़प्पाई काल था, फिर लगातार 3000 वर्ष पहले वैदिक काल, 2000 वर्ष पहले पौराणिक काल और 1000 वर्ष पहले भक्ति काल आए। 200 वर्ष पहले के औपनिवेशी काल में सुधारवादी आंदोलन हुआ। लेकिन ये सभी काल भारतभर में एक समान नहीं घटित हुए। ऐसा नहीं कि जैसे द्रौपदी यज्ञ वेदी से पूर्णतः गठित होकर प्रकट हुईं थी वैसे इस विशाल उपमहाद्वीप में हिंदू धर्म भी रातोंरात पूर्णतः विकसित होकर प्रकट हुआ। ध्यान रखें कि जबकि इतिहासकार मानते हैं कि वैदिक काल 3000 वर्ष पहले था, अनुयायी मानते हैं कि वेद सनातन हैं।

परंपरागत मान्यता यह है कि हिंदू धर्म का स्रोत 3000 वर्ष पहले रचे गए ऋग्वेद में है। लेकिन ऋग्वेद के देवताओं (इंद्र, अग्नि और सोम) को आधुनिक काल में कदाचित ही पूजा जाता है। आज, हिंदू धर्म में पेड़-पौधों, प्राणियों, पहाड़ों, नदियों, पत्थरों और मंदिरों में प्रतिष्ठापित देवताओं की मूर्तियों की पूजा प्रमुख है। यह पूजा कहां से शुरू हुई? हड़प्पाई काल से या उससे भी पहले की जनजातियों की प्रथाओं से?

हिंदू धर्मीय वृंद या तुलसी के पौधे को लक्ष्मी के रूप में और वट वृक्ष को पितरों, नीम के पेड़ को देवी, तथा बिल्व या बेल के पत्ते को शिव के लिए पूज्य मानकर उन्हें पूजते हैं। दुर्गा पूजा, गणेश पूजा और गौरी पूजा के लिए भी कुछ विशिष्ट जड़ी बूटियों और झाड़ियों को इकठ्ठा किया जाता है। बुद्ध का जन्म और उनका निर्वाण क्रमशः साल और पीपल के पेड़ों के नीचे हुआ। प्रत्येक जैन तीर्थंकर अपने-अपने विशिष्ट पेड़ से जुड़ें हैं। कर्म का सिद्धांत भी बहुधा बीज और फल के बीज संबंध से समझाया जाता है।

इससे स्पष्ट है कि मुख्यधारा का हिंदू धर्म वेदों के अलावा जनजातीय और हड़प्पाई प्रथाओं से प्रभावित था। हड़प्पाई सभ्यता के मुहरों पर देवियां पेड़ों से उभरती हुईं दिखाईं गईं हैं। ऐसे मुहर भी हैं जिनपर पेड़ों को चढ़ाव देते हुए दिखाया गया है। मध्य भारत के जनजातीय समुदाय साल के पेड़ की पूजा करते हैं। इसे ‘सरना धर्म’ कहते हैं। अब उनकी मांग है कि इसे एक पृथक धर्म के रूप में पहचाना जाना चाहिए।

वैदिक देवता अश्वों और बैलों द्वारा खींचें गए रथों पर सवार होते थे। लेकिन पुराणों में इंद्र के वाहन ऐरावत, अर्थात एक गज, विष्णु के वाहन गरुड़, शिव के वाहन नंदी बैल और काली के वाहन को एक सिंह दिखाया गया। जैन धर्म में महावीर के प्रतीक सिंह, पार्श्व-नाथ के नाग, ऋषभ-नाथ के वृषभ और मुनिसुव्रत के कूर्म हैं। सिंधु घाटी के मुहरों पर भी वृषभ, गज, गेंडा, बकरी, हिरण और बाघ (न कि अश्व और सिंह) जैसे प्राणी मिलें हैं। इस बात की संभावना कम है कि उनका कोई धार्मिक या पूजनीय उद्देश्य था। लेकिन जनजातीय संस्कृतियों में प्राणी पूजनीय हैं और देवताओं तथा भूतों के साथ जोड़ें जाते हैं। तुलु नाडु का भूत कोला नृत्य इसका एक उदहारण है। पौराणिक कथाएं इन जनजातीय मान्यताओं से स्पष्टतया प्रेरित हैं।

ऋग्वेद में भोर (उषस्), नदि (सिंधु), वर्षा (पर्जन्य) और वन (अरण्यानि) के लिए स्तोत्र पाए जाते हैं। लेकिन यूं लगता है कि वे केवल कविताएं हैं न कि कोई आख्यान। भाषा (वाक्), जो देवों को कवियों से संपर्क करने में विवश करती है, की क्षमता की अधिक स्तुति पाई जाती है। यहां गंगा का सूंस पर सवार होने का कोई उल्लेख नहीं है। तमिल नाडु के पलानी पहाड़, गुजरात के गिरनार पर्वत या मध्य भारत की विंध्य पर्वत श्रृंखला, जहां देवता और ऋषि एक साथ बैठकर परमात्मा से संलाप करते हैं, के सम्मान में भी कोई स्तोत्र नहीं हैं। स्पष्टतया स्थल पूजनीय होने की धारणा बाद में उभरी।

भारतभर के गांवों और नगरों में, यहां तक कि मंदिरों के भीतर भी, ऐसी चट्टानें मिलती हैं जिनकी लोग साधारणतः उपेक्षा करते हैं। लेकिन किसी निर्धारित दिन और समय, संपूर्ण गांव वहां एकत्रित होता है। लोग चट्टानों पर हल्दी और कुमकुम लगाकर फूल अर्पण करते हैं। उन्हें धूप देकर बलि चढ़ाई जाती है। यह मान्यता है कि कई मंदिरों में चट्टान वास्तव में स्वयंभू देवता होती हैं।

हम पाते हैं कि धातु के मुखौटों के पीछे वास्तव में प्राचीन और अखंड चट्टानें पूजी जा रहीं हैं। विष्णु के साथ जुड़ा प्रसिद्ध ‘शालिग्राम’ पत्थर मोलस्क का जीवावशेष है जो नेपाल की गण्डकी नदी के तल पर पाया जाता है। शिवलिंग बहुधा नर्मदा नदी के तल से लिया गया पत्थर होता है जिसे चमकाकर धातु के पात्र पर रखा जाता है। कई मंदिरों में मात्र एक चट्टान या बाहर निकल रही चट्टान मात्रिकाओं और एकाधिक देवताओं से जुड़ जाती हैं। दक्षिण भारत के मंदिरों में, मुख्य मंदिर की चारों ओर छोटी चट्टानें होती हैं जो प्राचीन देवताओं और क्षेत्रपालों की प्रतीक होती हैं। बौद्ध धर्म और जैन धर्म में उन्हें ऋषियों की रक्षा करने वाले यक्ष और यक्षी माना जाता है।

संभवतः नायकों की ‘वीर’ पत्थर और शक्तिशाली महिलाओं की ‘सती’ पत्थरों के रूप में पूजा योद्धा समुदायों में शुरू हुई। जो लोग प्रारंभिक किसानों और चरवाहों की गायों और उनके खेतों की रक्षा करते थे उन्हें पानी, फूल और दीयों से पूजा जाने लगा। समय के साथ उन्हें पूजने के स्थल क्षेत्रीय मंदिर और देवता बन गए, जो शिव और विष्णु के साथ जुड़ गए और उनके माध्यम से वैदिक धारणाएं संचारित की गईं।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।

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