तरह-तरह के संन्यासी

तरह-तरह के संन्यासी

मनुस्मृति में दो प्रकार के संन्यासियों का उल्लेख है। पहले प्रकार के संन्यासी शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात शिक्षण के मार्ग पर ही बनें रहते थे और गृहस्थ नहीं बनते थे। दूसरे प्रकार के संन्यासी विवाह कर संतानों को जन्म देने के पश्चात संन्यासी बनते थे।

भारत में कई प्रकार के संन्यासी हैं। वास्तव में यह संन्यासियों की भूमि है। हड़प्पाई मुहर देखकर हम कह सकते हैं कि 4000 वर्ष पहले सिंधु घाटी में संन्यासी रहा करते थे। वेदों में ऋषियों का उल्लेख है। ये ज्ञानी पुरुष मंत्र ‘देखते’ थे और विभिन्न अनुष्ठानों के माध्यम से देवताओं से संपर्क करते थे। साधारणतः ऋषि विवाहित होते थे। अगस्त्य ऋषि लोपामुद्रा से, वशिष्ठ ऋषि अरुंधती से और अत्रि ऋषि अनसूया से विवाहित थे। इसलिए हम ऋषियों को संन्यासी नहीं कह सकते हैं।

वेदों में अविवाहित और भ्रमणकारी संन्यासियों का स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है। लगभग 2500 वर्ष पहले के उत्तर-वैदिक साहित्य में संन्यासियों की धारणा पर विस्तार से बात की गई। वेदों में श्रमणों का उल्लेख है।

श्रमणों ने यज्ञ के अनुष्ठान और फलस्वरूप गृहस्थी के बंधन को नकारा था। वे ध्यान में बैठकर मानसिक रहस्यों पर चिंतन करते थे। श्रमणों में बौद्ध और जैन संन्यासियों का भी समावेश था। सदा भ्रमण करने वाले ये संन्यासी केवल वर्षा ऋतु में एक जगह शरण लेते थे। श्रावक नामक सामान्य लोग उनकी देखभाल करते थे और उनके प्रवचन भी सुनते थे। ये संन्यासी साधु कहलाते थे। चूँकि वे सीधा-सादा जीवन जीते थे और चूँकि वे बहुधा मौन रहते थे, इसलिए उन्हें मुनि कहा जाता था।

1500 वर्ष पहले के पुराणों में तपस्वियों का उल्लेख होने लगा। वे अपनी इंद्रियों और मनों को नियंत्रित कर सकते थे और तपस नामक भीतरी अग्नि का मंथन कर सकते थे। इन पुरुषों को साधरणतः ऐसी मुद्राओं में कल्पित किया जाता था, जिसे आज हम हठ योग से जोड़ते हैं। इस तपस्या के माध्यम से वे देवताओं से वरदान प्राप्त करते थे।

कहते हैं कि असुर भी शक्तिशाली बनने के लिए तपस्या करते थे। इंद्र को भय था कि ये तपस्वी शक्तिशाली बनकर स्वर्ग में उनकी जगह ले लेंगे। इंद्र के विपरीत तपस्वी सुखों को त्यागते थे। इसलिए इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सराएं और गंधर्व भेजें। उल्लेखनीय बात यह है कि तपस्वी भीतरी अग्नि का मंथन करते थे और अप्सराएं जल-कन्याएं थी। यह दोनों में प्रतिद्वंद्व का संकेतक है।

मनुस्मृति में दो प्रकार के संन्यासियों का उल्लेख है। पहले प्रकार के संन्यासी शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात शिक्षण के मार्ग पर ही बनें रहते थे और गृहस्थ नहीं बनते थे। दूसरे प्रकार के संन्यासी विवाह कर संतानों को जन्म देने के पश्चात संन्यासी बनते थे। इस प्रकार, भागवत पुराण में शुक का उल्लेख है, जिन्होंने महिलाओं की ओर देखने से भी इंकार किया और जीवनभर भोले रहें तथा कर्दम ऋषि का उल्लेख भी है, जो कपिला को जन्म देने के पश्चात संन्यासी बनें।

लगभग 10वीं सदी में भारत में नाथ जोगी उभर आए। तंत्र से जुड़ें इन संन्यासियों को सिद्ध भी कहा जाता था। वे सांसारिक जीवन त्याग देते थे। इस प्रत्याहार से उन्हें जादुई शक्तियां प्राप्त हुईं। वे उड़ सकते थे और अपना आकार तक बदल सकते थे। कोई अप्सरा उन्हें लुभा नहीं सकती थी।

हनुमान को भी अपनी अलौकिक शक्तियां ब्रह्मचर्य और संन्यास से प्राप्त हुईं। इसलिए, नाथ जोगी हनुमान से जुड़ें थे। अपनी जादुई शक्तियों के लिए प्रसिद्ध नाथ जोगियों के बिलकुल विपरीत साधुओं ने तटस्थता और समचित्तता को महत्त्व दिया। लोगों ने जोगियों को शेर और बाघों पर सवार कल्पित किया। कई मुसलमान सूफ़ी फ़कीर भी जोगियों के समान थे।

जोगियों की मृत्यु होने पर उन्हें आसीन ही दफ़नाया जाता था। उनके क़ब्र पवित्र स्थल बन गए और लोग अपने दैनिक जीवन की समस्याओं के हल के लिए वहां जाने लगें। जोगियों के कई कबीलों ने सैन्य संप्रदायों को प्रेरित किया। इन संप्रदायों के योद्धा-संन्यासियों ने मंदिरों की रक्षा की और धर्म युद्धों में भाग लिया।

भक्ति काल में संन्यासियों का एक और संप्रदाय उभरा। ये संन्यासी न गृहस्थ बनना चाहते थे, न जादुई शक्तियां चाहते थे और न ही वे विश्व को त्यागने वाले बुद्धिजीवी थे। वे परमात्मा में लीन होकर हर्षोन्मत्तता से नृत्य करते थे और गीत गाते थे। वे सांसारिक मोह के प्रति तटस्थ थे। उनकी उपस्थिति में बाघ भी बकरियों के साथ रहते थे।

19वीं सदी में सभी संन्यासी संप्रदाय ईसाई चर्च और ब्रह्मचर्य पर उसके विचारों से बहुत प्रभावित हुए। ईसाई पुरुष समाज सेवा करने हेतु ब्रह्मचारी बनकर दरिद्र जीवन जीने की शपथ लेते थे और मंडलों में कार्य करते थे। पहले के संन्यासियों के उद्देश्य बहुत अलग थे। वे समचित्तता और जादुई शक्तियां प्राप्त करने हेतु संन्यासी बनते थे।

इस प्रकार, पिछले 4000 वर्षों में भारत में कई प्रकार के संन्यासी उभरें। ये संन्यासी विभिन्न तरीकों से विश्व से पीछे हटें हैं और विभिन्न तरीक़ों से उसके साथ जुड़ें भी हैं।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।

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