गुणों की गहराई

गुणों की गहराई

हरेक अध्यात्मवादी मनुष्य यह चाहता है कि उसके जीवन में दिव्य गुणों की धारणा हो और दिव्यता का पूर्ण उत्कर्ष हो। परंतु हम देखते हैं कि इस पुरुषार्थ में बहुत कम ही लोगों को यथेष्ट सफलता मिलती है। इसका कारण क्या है?

ध्यान देने पर आप देखेंगे कि बहुत बार प्रत्यक्ष रूप में तो ऐसा लगता है कि अमुक मनुष्य किसी दिव्य गुण को धारण किए हुए है। परंतु वास्तव में उसकी धारणा दिव्यता रूपी बुनियाद पर नहीं होती, बल्कि किसी लौकिक अथवा मायाजनित संस्कार पर होती है। दूसरे शब्दों में, गुण के साथ-साथ उसे कुछ घुन भी लगा होता है। वह घुन उसके गुण को पनपने नहीं देता, बल्कि उसके गुण रूपी वृक्ष पर पराश्रयी बेल की तरह लिपटा रहता है तथा उसका शोषण करता रहता है। अतः हमें चाहिए कि हम अपने मन को टटोलें कि हमारे दिव्य गुण को कोई घुन तो साथ में नहीं लगा हुआ। जब हमारा वह दिव्य गुण अपने शुद्ध स्वरूप में होगा तभी सही अर्थ में हममें दिव्यता का उत्कर्ष होगा। हम यहां कुछेक उदाहरणों द्वारा इस भाव को व्यक्त करेंगे;

स्पष्टवादिता

लोगों के संपर्क में आने से, आप जानते ही होंगे कि कुछ लोग कहते हैं, हम तो सरल स्वभाव के हैं। जो बात जैसी होती है, हम तो उसे सच्चाई से साफ-साफ कह देते हैं। हम झूठ क्यों बोले, हमें किसी का डर थोड़े ही है? हम तो अंदर-बाहर से एक हैं। अब निस्संदेह स्पष्टवादिता, सच्चाई और मानसिक सफाई तो दिव्य गुण हैं परंतु हम देखते हैं कि कहीं-कहीं स्पष्ट वक्तृत्व रूपी गुण के मूल में कई बार गंभीरता का अभाव, धैर्य की कमी, दूसरे को गलत सिद्ध कर उसकी मान-हानि करने का विचार, अपनी ही बात को सत्य सिद्ध करने का अहम भाव और इस प्रकार के अन्य कई त्याज्य-भाव समाए होते हैं। ये सब घुन उस गुण को शुद्ध रूप में विकसित नहीं होने देते। अतः जहां उस व्यक्ति के जीवन में बेधड़क होकर बात करने का गुण पनपता है वहां उद्दंडता, अभद्रता, कटुता, विवादप्रियता आदि घुन अथवा अवगुण भी पनपते हैं क्योंकि कई पुरुषार्थी इस बात से लापरवाह होते हैं कि उनकी इस स्पष्टवादिता का आधार दिव्यता पर नहीं है। हमें चाहिए कि हम देखें कि हमारी स्पष्टवादिता में कटुता, उद्दंडता या दूसरे को मान-हानि पहुंचाने का भाव तो नहीं है।

सादगी

आपने देखा होगा, कई लोग कहते हैं कि हम औपचारिकता अथवा तकल्लुफ में विश्वास नहीं करते। वे मन में सोचते हैं कि हम तो मिलनसार हैं, स्नेही हैं और दिखावे तथा कृत्रिमता से दूर हैं। वे किसी के आने पर न ठीक तरह से अभिनंदन करते हैं, न उसके जाने पर शिष्टता को व्यवहारित करते हैं। इस प्रकार उनके मन में जो दूसरों के प्रति आदर-भाव की कमी है अथवा शिष्टता का जो अभाव है, उसको न समझते हुए वे कहते हैं कि हम तो सबसे घुलमिल जाते हैं, हममें आत्मीयता तथा बंधुत्व है। अतः अनौपचारिकता के साथ-साथ उनमें मर्यादा की कमी, शालीनता का अभाव, अपेक्षित सत्कार करने के प्रति कर्त्तव्यविमुखता करने के संस्कार भी घुन की तरह रूहानियत को खोखला करते चले जाते हैं। अतः हमें सदा अपने ऊपर ध्यान देना चाहिए कि सादगी और आत्मीयता के साथ-साथ दूसरों को आदर-सत्कार देने का गुण भी होना चाहिए वरना उस रूखी सादगी और थोथी आत्मीयता से हम कई लोगों को बेगाना बना लेंगे और दिव्यता की बजाय हम रुक्षता तथा गंवारूपन की सीमा में प्रविष्ठ हो जाएंगे।

दूसरों का सत्कार और आतिथ्य

ऐसे भी लोग हैं जो दूसरों का आदर-सत्कार करते हैं और उनसे मधुर वचन भी बोलते हैं परंतु वास्तव में उनके व्यवहार के मूल में उस व्यक्ति से अपना काम निकालने का ही भाव समाया होता है। इसलिए उनका यह दिव्य गुण तो स्थिर हो नहीं पाता, साथ में स्वार्थ और चाटुकारिता के घुन भी उनकी दिव्यता को खाने लगते हैं।

गंभीरता

देखिए, एक व्यक्ति आजकल कम बोलता है। हम जब उसे कहते हैं कि ‘आजकल तो आप प्रायः शांत रहते हैं’ तो वह कहता है, ‘हमें मुंह-फट बनना अच्छा नहीं लगता, हम तो अपनी मस्ती में मस्त रहते हैं। जहां जितनी आवश्यकता होती है, वहां उतना ही बोलते हैं। हम इधर-उधर हरेक जगह बात करना पसंद नहीं करते। अधिक बोलने का फायदा ही क्या है? गंभीर रहना ही अच्छा है।’ वह सोचता है कि अब मैं अंतर्मुखी बनता जा रहा हूं और दिव्य गुणों की धारण के पुरुषार्थ में लगा हूं। अब, निस्संदेह, गंभीरता तो एक बहुत अच्छा गुण है परंतु किसी-किसी मनुष्य का कम बोलना ‘अंतर्मुखता’ और ‘गंभीरता’ के कारण नहीं होता, बल्कि इस कारण होता है कि वह कई लोगों से रूठा हुआ होता है। रुष्टता के कारण उसके मन में घृणा की लहर होती है, इसलिए उस मूड में वह किसी से भी बात नहीं करना चाहता। दूसरे शब्दों में उसका मौन अथवा अल्प-वक्तृत्व गंभीरता रूपी दिव्यता पर आधारित नहीं होता, बल्कि रूठना रूपी संस्कार पर होता है। तो यह बात निर्विवाद है कि हम गंभीरता तथा अल्प वक्तृत्व का गुण धारण करें परंतु साथ में यह देख लें कि उसे रुष्टता का घुन तो नहीं लगा।

संतुष्टता

इसी प्रकार, कोई व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति या परिस्थिति में कहता है कि ‘मैं तो संतुष्ट हूं।’ जब कोई उससे पूछता है कि ‘आप कैसे हैं’, तो वह कहता है, ‘मैं ठीक हूं।’ परंतु, गंभीरता से विचार करने पर मालूम होता है कि उसकी इस संतुष्टता की बुनियाद में आलस्य, पराक्रम की कमी अथवा कृत्रिम संतुष्टता होती है। अपने मन में तो वह व्यक्ति जानता है कि जैसा पुरुषार्थ वह कर रहा है, उससे वह सूर्यवंश का स्वराज्य पद प्राप्त नहीं कर सकता तो भी यह सोचकर कि चंद्रवंश का स्वराज्य पद भी कोई कम तो नहीं है, वह स्वयं को दम-दिलासे से संतुष्ट कर लेता है। ऐसी संतुष्टता न उसे कल्याण की पराकाष्ठा पर ले जाती है, न ही दूसरों को दिव्यता की ओर प्रेरित करती है। संतुष्टता के साथ हमें पराक्रमी, उद्यमी, तीव्र पुरुषार्थी और परोपकारी भी होना चाहिए। यदि हमारी संतुष्टता इनसे रहित होगी तो उसे ‘पुरुषार्थहीनता और स्वार्थ’ का घुन लगा होगा और वह संतुष्टता हमारी उन्नति तथा बहुमुखी विकास में बाधा होगी। वह दिव्य गुणों के उत्कर्ष की ओर ले जाने वाली नहीं होगी।

दूसरों का सुधार करने का संकल्प

कुछ लोग कहते हैं कि ‘अमुक व्यक्ति की अवस्था अथवा उसकी कृति ठीक नहीं है परंतु वह अपने को बहुत कुछ समझता है। अब हम उसे सीधे रास्ते पर लाएंगे अथवा हम अमुक महान व्यक्ति से बात करके इसे ठीक करा देंगे।’ अब देखने में तो ऐसा लगता है कि इनकी भावना सुधार करने की ही है, परंतु कोई-कोई व्यक्ति जो विधि अपनाते हैं उससे मालूम होता है कि उसके मूल में कुछ और भाव भी मिश्रित होता है। परिणाम यह होता है कि वे दूसरों को तो ठीक करना चाहते हैं, परंतु चलते-चलते स्वयं दूसरों की निंदा के धंझे में फंस जाते हैं। दूसरों का सुधार करने की कामना करते हुए ऐसे लोगों का अपना सुधार पीछे रह जाता है। इसका कारण यह है कि उनकी इस भावना के मूल में दूसरों के कल्याण की भावना नहीं होती, बल्कि अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने अथवा दूसरे को तुच्छ सिद्ध करने की सूक्ष्म इच्छा होती है। अतः हमें यह देखना चाहिए कि किसी के सुधार के लिए जब हम किन्हीं बड़ों को उसका समाचार देते हैं, तो उस समय हमारे मन में उसके कल्याण की ही भावना होती है या उसकी ग्लानि करने का भी भाव भरा है। हमें गुण को धारण करना चाहिए और घुन को निकाल देना चाहिए।

सहयोग

ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं, ‘बताइए, हम आपको क्या सहयोग दे सकते हैं? हमारा आपसे स्नेह है, इसलिए हमें यह विचार आता है कि हम भी आपका कुछ कार्य निपटा दें।’ अब सहयोग की भावना तो बहुत ऊंची भावना है परंतु किसी-किसी के मूल में नाम और यश की कामना होती है अथवा समाज के सामने दानवीर, कर्मवीर अथवा एक कार्य-कुशल व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करने की अथवा लोगों द्वारा अपने बारे में कुछ प्रशंसात्मक वाक्य सुन कर गुदगदी अनुभव करने की इच्छा होती है। वह स्वयं भी अपने इस गुप्त भाव से अनभिज्ञ होता है और व्यक्त रूप में वह सहयोग का प्रस्ताव करता है। हमें चाहिए कि हम सभी के अच्छे कार्यों में सहयोगी बनने का यत्न तो करें परंतु आशा-तृष्णा या ‘मैं-मेरे’ के भाव से ऊपर उठकर सहयोग दें।

समयांतर में रूपांतर

कई बार तो ऐसा भी होता है कि प्रारंभ में मनुष्य में कोई दिव्य गुण शुद्ध रूप लिए हुए होता है, परंतु शनैः शनैः उसमें मलिनता आती जाती है। उदाहरण के तौर पर एक व्यक्ति दूसरे को सहयोग देने का जब प्रस्ताव पेश करता है, तो उसके मन में निश्छल रूप से सहयोग की भावना होती है। उस समय वह सतोगुणी स्थिति में होता है और उसमें परस्पर स्नेह, भ्रतृत्व, सेवा-भाव इत्यादि का उद्रेक होता है, परंतु बाद में वह सोचता है, ‘मैं भी तो काम करता हूं, तब मेरा भी तो नाम होना चाहिए कि यह अच्छा काम मुझ द्वारा हुआ है।’ इस प्रकार के विचार से उसके मन में सहयोग का स्थान ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिद्वंद्व इत्यादि भाव ले लेते हैं। अतः हमें सदा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हम शुद्ध रूप से ही दिव्य गुण धारण करें। जैसे हम घुन वाले गेहूं को निकाल कर अच्छे गेहूं के आटे का भोजन सेवन करते हैं, तो स्वस्थ रहते हैं, वैसे ही हमें चाहिए कि हम जिन दिव्य गुणों को धारण करें उन्हें भी घुन न लगे हों। दिव्य गुण हीरों के समान हैं परंतु उनमें दाग नहीं होना चाहिए। यदि दिव्य गुणों रूपी सोने में अवगुणों का मुल्लमा मिला रहेगा, तो हम आत्मा ‘सच्चे सोने के समान’ नहीं बन सकेंगे। तब भला हम सतयुगी, पूर्णतः पवित्र, शुद्ध गुणों वाली सृष्टि में जाने के अधिकारी कैसे बनेंगे?

त्याग, तपस्या और सेवभाव

इस प्रकार विचार करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दिव्य गुणों की सही रूप से धारणा के लिए उनके मूल में 4 भाव होने ज़रूरी हैं। पहला, त्याग, दूसरा तपस्या, तीसरा सेवा और चौथा विश्वकल्याण की भावना। मनुष्य को यह सोचना चाहिए कि जिस दिव्य गुण की धारणा मैं स्वयं में मान रहा हूं क्या उसके पीछे किसी न किसी प्रकार का त्याग समाया हुआ है? क्या उससे मेरी तपश्चर्या में वृद्धि हो रही है या उससे मैं योगी की बजाय व्यवहारी और लौकिक बनता जा रहा हूं? क्या उसके पीछे सेवा-भाव समाया हुआ है या कोई महत्त्वाकांक्षा, बड़प्पन की इच्छा या कुछ सुविधा, साधन अथवा सामग्री प्राप्त करने का सूक्ष्म प्रलोभन है और क्या मैं उसे विश्वकल्याण की योजना के अनुकूल दूसरों के भी कल्याण की भावना से कर रहा हूं या उसमें कोई व्यक्तिगत लाभ सामने रख चल रहा हूं। इन चारों बातों पर ध्यान देने से ही मनुष्य में दिव्यता का उत्कर्ष होता है। हमने प्रजापिता ब्रह्मा, मातेश्वरी सरस्वती तथा अन्य अनेक ब्रह्माकुमारी बहनों में दिव्य गुणों की जो धारणा देखी है उसका आधार दिव्यता ही है। उनका जीवन त्याग, तपस्या, सेवा और विश्वकल्याण की भावना पर टिका है। इसीलिए वे अनेकानेक मनुष्यात्माओं के लिए आदर्श हैं और प्रेरणा के स्त्रोत हैं। उनके व्यवहार में शुद्ध सरलता, नम्रता, संतुष्टता, गंभीरता इत्यादि का समावेश है। हमें अपने जीवन को ऐसा ही बनाना चाहिए।

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