धरती पर उतरती गंगा मां

गंगा दशहरा: गंगा के धरती पर अवतरित होने की कहानी

गंगा दशहरा के दिन मां गंगा की पूजा और अर्चना की जाती है। इस दौरान गंगा में स्नान करने का हिंदू धर्म में काफी खास महत्व है। कहते हैं कि इस दिन मां गंगा की विधिवत रूप से पूजा करने से मनचाहा फल मिलता है।

मां गंगा, जो हम सब के लिए बहुत ही पवित्र है, जो मोक्ष दायिनी ही नहीं निर्मल भी है। हिंदू धार्मिक शास्त्रों के अनुसार मां गंगा हम भारतीयों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोती हैं।मान्यता है कि इसकी सिर्फ कुछ बूंदों को मुंह में डालने मात्र से हमें मोक्ष मिल जाती है। इन्हीं गंगा मां के धरती पर अवतरण दिवस को गंगा दशहरा के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है।

गंगा दशहरा के दिन मां गंगा की पूजा और अर्चना की जाती है। इस दौरान गंगा स्नान (Ganga Snan)करने का हिंदू धर्म में काफी खास महत्व है। कहते हैं कि इस दिन मां गंगा की विधिवत रूप से पूजा करने से मनचाहा फल मिलता है। तो चलिए सोलवेदा हिंदी के इस आर्टिकल में हम आपको गंगा दशहरा की कहानी तो बताएंगे ही। साथ ही हम आपको गंगा के धरती पर अवतरित होने की कहानी भी बताएंगे।

गंगा दशहरा कब है? (Ganga Dussehra kab hai?)

पंचाग के अनुसार गंगा दशहराहर साल ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस साल गंगा दशहरा 16 जून 2024 को मनाया जाएगा। इस दिन स्नान के लिए ब्रह्म मुहूर्त बेहद ही शुभ है। हालांकि, गंगा दशहरा के शुभ अवसर पर सुबह 7 बजकर 8 मिनट से सुबह 10.37 बजे तक शुभ मुहूर्त रहने वाला है।

गंगा दशहरा की पौराणिक कहानी (Ganga Dussehra ki pauranik kahani)

हिंदू धर्म के पौराणिक कहानी के अनुसार प्राचीन काल में अयोध्या में राजा भागीरथ रहते थे। उन्हें भगवान श्रीराम का पूर्वज माना जाता है। एक बार उन्हें अपने पूर्वजों के तर्पणयानी जल दान करने के लिए गंगाजल की ज़रूरत हुई। वो ऐसा समय था जब गंगा सिर्फ स्वर्ग में बहती थी, तब मां गंगाको धरती पर लाने के लिए उन्होंने कई सालों तक तपस्या की, लेकिन उन्हे सफलता नहीं मिली। इसके बाद वो दुखी होकर तपस्या करने हिमालय में चले गए। वहां उन्होंने कठोर तपस्या की। इसको देख मां गंगा प्रसन्न हुई और राजा भागीरथ के सामने प्रकट हुईं। फिर राजा भागीरथ ने उनसे पृथ्वी पर आने का आग्रह किया।

मां गंगा ने भागीरथ का आग्रह स्वीकार कर लिया, लेकिन मां गंगा का वेग बहुत तेज़ था, वो पृथ्वी पर आती, तो तबाही आ जाती। उनकी परेशानी का हल सिर्फ और सिर्फ भगवान शिव के पास था। इसके बाद भागीरथ भगवान शिव की तपस्या करने लगे। इस दौरान भागीरथ ने पैर के अंगूठे पर खड़े होकर एक साल तक तपस्या की, तो भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने भागीरथ के आग्रह को स्वीकार कर लिया। इसके बाद भगवान ब्रह्मा ने अपने कमंडल से मां गंगा की धारा को प्रवाहित किया और भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में बांध लिया।

इस तरह से मां गंगा 32 दिनों तक भगवान शिव की जटाओं में बहती रहीं। फिर ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान शिव ने अपनी एक जटा खोली और मां गंगा धरती पर अवतरित हुईं। इधर, राजा भागीरथ ने मां गंगा के धरती पर आने के लिए हिमालय में रास्ता बनाया। इस प्रकार जब मां गंगा पहाड़ से मैदान में पहुंची, तो जाकर राजा भागीरथ ने गंगा के पवित्र जलसे अपने पूर्वजों का तर्पण कर उन्हें मुक्ति दिलाई।

मां गंगा के जन्म और राजा शांतनु से विवाह की पौराणिक कथा (Maa Ganga ke janm aur Raja Shantanu se vivah ki pauranik katha)

वामन पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने जब वामन के रूप में अवतार लिया, तो उन्होंने एक पैर आसमान की ओर उठाया, तो आसमान में छेद हो गया और उससे गंगा का जन्म हुआ। इसी जल से भगवान ब्रह्मा ने वामन भगवान का पैर धोया और उसे कमंडल में रख लिया। वहीं, एक बार ब्रह्म देव की सेवा में देवताओं के साथ-साथ राजा महाभिष भी मौजूद थे। वहां पर गंगा और राजा महाभिष एक दूसरे को देखने लगे। भगवान ब्रह्मा ने दोनों को देख लिया और गुस्सा हो गए। उन्होंन महाभिष और गंगा को पृथ्वी लोक में जन्म लेने का श्राप दिया। कहते हैं कि उसी श्राप की वजह से गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। फिर राजा महाभिष राजा प्रतीप के घर शांतनु के रूप में जन्में और गंगा पृथ्वी पर स्त्री के रूप में आईं। इसके बाद गंगा की शादी शांतनु से हुई और उनकें 8वें पुत्र के रूप में भीष्म का जन्म हुआ।

जब गंगा ने अपने सात पुत्रों को मार दिया (Jab Ganga ne apne saat putron ko maar diya)

पौराणिक कथा के अनुसार राजा शांतनु के आठ पुत्र हुए थे। इनमें से पहले सात पुत्रों को गंगा ने नदी में बहा दिया। भीष्म उनके आठवें पुत्र थे, जो ज़िंदा रह गए थे। इनको वशिष्ठ ऋषि ने मनुष्य के रूप में जन्म लेने का श्राप दिया था। भीष्म को जब गंगा नदी में प्रवाहित कर रही थीं, तो शांतनु ने उन्हें रोक लिया था। इसलिए वे पृथ्वी पर रहे।

भगवान शिव को पति के रूप में पाना चाहती थीं गंगा (Bhagwan Shiv ko pati ke roop mein pana chahti thi Ganga)

कहा जाता है कि जन्म के बाद गंगा को भगवान ब्रह्मा ने हिमालय को सौंप दिया था। हिमालय की पुत्री माता पार्वती हैं। इसलिए गंगा और पार्वती दोनों बहन हुईं। शिव पुराण के अनुसार गंगा भगवान शिव को पति को रूप में पाना चाहती थीं, जिससे माता पार्वती खुश नहीं थी। गंगा ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न की, तो उन्होंने गंगा को अपने समीप रहने का वरदान दिया। इसलिए पृथ्वी पर अवतरण से पूर्व भगवान शिव गंगा को अपनी जटाओं में बांध लेते हैं।

इस आर्टिकल में हमने गंगा दशहरा के बारे में बताया। यह पढ़कर आपको कैसा हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं। इसी तरह की और भी कहानी पढ़ने के लिए जुड़ें रहें सोलवेदा हिंदी से।

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