ताजमहल, ताजमहल का इतिहास, ताज महल के बारे में जानकारी

ताजमहल: खुदा के मर्ज़ी की तामीर

ताजमहल आध्यात्मिक प्रेम की संपन्नता है। इस जीवन और आने वाले जीवन का एक मूर्त रूप।

“हीरा, मोती और माणिक की चमक इन्द्रधनुष की जादुई झिलमिलाहट की तरह गायब हो सकती है लेकिन नदी किनारे यह ताजमहल एक आंसू की तरह है जो हमेशा के लिए काल के कपोल पर थम गया है।” ये शब्द कवि रवींद्रनाथ टैगोर के हैं जो पाठ्यपुस्तकों में लिखे हैं,ये ताजमहल का इतिहास बताते हैं। ताजमहल का इतिहास एक प्रेम का प्रतीक बताता है। यह सम्राट शाहजहां द्वारा अपनी तीसरी प्रिय पत्नी मुमताज़ महल की याद में निर्मित उनकी कब्र है। लेकिन जिस पहलू के बारे में अक्सर बात नहीं की जाती है वह यह है कि यह इमारत आध्यात्मिक विरासत कला के भव्य कार्य का प्रतीक है। असल में यह अपार उत्साह की अभिव्यक्ति से उत्कृष्ट एक रोमांचक प्यार का एक अद्भुत प्रतीक है।

एक राज्य के लोगों की भक्ति

यमुना नदी किनारे बंजर भूमि को एक सुन्दर मूर्त स्मारक, जैसा कि वो आज दिखाई देता है, में बदलने की प्रक्रिया एक इंसान का काम नहीं था। इसका निर्माण 22,000 से अधिक शिल्पकारों, श्रमिकों, मूर्तिकारों, सुलेखकों और वास्तुकारों का एक चुनौतीपूर्ण परिश्रम था। उन्होंने अपने जीवन के 22 वर्ष अपने राजा को भक्ति की भेंट के रूप में दे दिए, जिन्हें वे ‘पृथ्वी पर भगवान की छाया’ मानते थे। इस समर्पण की गहराई को समझने में उन्हें एक दशक से अधिक का समय लग गया जिसकी इस चमत्कार को खड़ा करने में आवश्यकता थी। उनमें से कई को तो अथक परिश्रम में लगे रहने के लिए अपने परिवारों से दूर रहना पड़ा था।

दुनिया के विभिन्न कोनों से संगमरमर और कीमती पत्थरों को लाना एक थकाऊ मिशन था। इस स्मारक के निर्माण का एक बड़ा खर्च आगरा- ताज का शहर के स्थानीय लोगों से वसूले जाने वाले करों से आता था। राजा का खज़ाना धीरे-धीरे खाली होने के कारण इस बड़े स्मारक के खर्चों का भार पड़ोसी शहरों पर पड़ने लगा। स्थानीय लोगों ने खाद्य सामग्री की कमी को सहा, जो श्रमिकों के विशाल समूहों को खिलाने के लिए भेज दिया जाता था। आगरा में एक बनावटी अकाल होने के कारण आसपास के शहरों में खाद्यान्न की भारी कमी हुई। यह एक राज्य के लोगों का उनके राजा के लिए किया गया एक भक्तिपूर्ण बलिदान था।

ऐसी बेहतरीन संरचनाओं के निर्माण के पीछे दिए गए बलिदानों ने शहरों, देशों, धर्मों और संस्कृतियों को जोड़ने वाले धागों के रूप काम किया। राजा के मुगल दरबार की यात्रा के लिए आने वाले इतालवी और फ़ारसी व्यापारियों द्वारा लाए गए विचारों को हिंदू कलात्मक तकनीकों के साथ स्पष्ट रूप से बुना गया था। इटली का पिएत्रा ड्यूरा, फारसी चारबाग या मुगल-फारसी हैश बिहिश्त, सभी अवधारणाओं को इस 17वीं शताब्दी के इंडो-इस्लामिक स्मारक में समाहित किया गया। ताजमहल उस धार्मिक सहिष्णुता के शिखर का उदाहरण है जो मुगल साम्राज्य को उस समय प्राप्त हुआ था।

एक आध्यात्मिक सामंजस्य

बादशाह शाहजहां की यह इच्छा थी कि वह मकबरे के निर्माण के साथ ही एक बगीचा भी बनवाएं जो स्वर्गीय मुमताज़ महल के लिए एक घर का काम करे। स्मारक का हर पहलू, जैसे कि पत्थर और उसके रंग को कुरान में परिकल्पित ‘स्वर्ग’ की प्रतिकृति बनाने की योजना के नज़रिए से चुना गया था।

इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, मरने के बाद हर व्यक्ति का अपने कर्मों के आधार पर स्वर्ग या नर्क में पहुंचना तय है। कुरान में स्वर्ग को एक सफेद स्वर्गीय निकाय के रूप में चित्रित किया गया है, जिसमें फलों, दूध, शहद और पानी से भरे जल की नहरें हैं। ऐसा कहा जाता है कि इसके चारबाग स्वर्ग के इस बगीचे से मेल खाते हैं। श्वेत मकराना संगमरमर से बना मकबरा एक कक्ष है जहां रानी विश्राम करती हैं। यह हैश बिहिश्त से मिलता-जुलता है, जो ईश्वर के घर के पालने में किया गया 8 स्वर्गलोक का फारसी अनुवाद है। माना जाता है कि चारबाग और समाधि का मिलन उस आनंदमय क्षण को पारिभाषित करता है जब मृतक का स्वर्ग में वास होता है।

इस जीवन और अगले जीवन का एक अवतार, ताजमहल आध्यात्मिक प्रेम के सार को अपने भीतर समाए हुए है। ऐसा लगता है जैसे स्वर्ग में आत्मज्ञान के साथ अपनी रानी को आशीर्वाद देने के लिए, राजा ने यह सुंदर भेंट भगवान को अर्पण की हो।

X

आनंदमय और स्वस्थ जीवन आपसे कुछ ही क्लिक्स दूर है

सकारात्मकता, सुखी जीवन और प्रेरणा के अपने दैनिक फीड के लिए सदस्यता लें।