आध्यात्मिकता से दूर होगा तनाव

आध्यात्मिकता से दूर होगा तनाव

तनाव से दूर रहने का सिर्फ एक ही उपाय है कि आप उसे जन्म देने वाले कारणों से दूरी बना कर रखें। आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलें और ज़िंदगी का भरपूर आनंद लें।

स्ट्रेस, टेंशन, तनाव कहने को तीन शब्द है, लेकिन इनका संबंध हमारे जीवन से सीधे तौर पर है। आज हर व्यक्ति किसी ना किसी तनाव में है। शायद आपको यह जानकर अजीब लगे, लेकिन जीवन में तनाव का होना भी ज़रूरी है। सुबह से लेकर शाम तक, तनाव हमें कई तरीकों से प्रभावित करता है। चाहे वह ऑफिस पहुंचने का तनाव हो या खाना खाने का तनाव। पूरे दिन हम इन तनावों से घिरे रहते हैं।

कई लोगों के दिन की शुरुआत कामों की एक बड़ी लिस्ट के साथ होती है। ऐसे लोग पूरे दिन के लिए अपनी कमर कस लेते हैं और निकल पड़ते हैं, अपनी लिस्ट को पूरा करने। इन सबके बीच वे रास्ते में ट्रैफिक और उनके बीच में बजने वाले हॉर्न के शोर को बर्दाश्त करते हैं। इसके बाद ऑफिस पहुंचते ही काम को पूरा करने की डेडलाइन का अलॉर्म कानों में बजने लगता है, जिससे तनाव अपने आप पैदा हो जाता है। इससे हमारा पूरा दिन टेंशन में ही बीत जाता है। शायद, लोग इसी तनाव को कम करने के लिए काम के बीच में सिगरेट के कश लगाते हैं, शाम को शराब या ड्रग्स लेते हैं। लेकिन उन्हें यह पता नहीं होता कि ये हानिकारक क्षणिक तरीके भी उनके शरीर में तनाव को जन्म दे रहे हैं।

तनाव एक ऐसी भावना है, जो सर्वव्यापी हैं! शायद ही कोई तनाव के दंश से बच पाता है। तो ऐसे में हमें क्या करना चाहिए? क्या हम तनाव को रोक सकते हैं? इस सवाल का जवाब मनीषी सद्गुरु जग्गी वासुदेव अपने ब्लॉग हाउ टू गेट राइड स्ट्रेस के ज़रिए देते हैं कि “मेरा मानना है कि हम उन चीजों पर ही पाबंदी लगाते हैं, जिनसे हमें प्रेम होता है, जैसे- हमारा परिवार, बिजनेस, बच्चे, हमारा धन, आदि। क्या लोग तनाव से भी प्रेम करते हैं? उस पर पाबंदी क्यों लगाएंगे। तनाव कुछ नहीं सिर्फ, हमारी आंतरिक स्थिति को नियंत्रित ना कर पाने की असफलता है।

अगर हम खुद को अंदर से मैनेज कर लेंगे, तो शायद तनाव कम हो जाए। लेकिन कथनी और करनी में जमीन और आसामन का फर्क है। हमेशा देखा गया है कि हम बाह्य परिस्थितयों के कारण भावनात्मक और विचारात्मक बोझ तले दब जाते हैं। इस बोझ से उबरने का एकमात्र तरीका है कि जितना हो सके तनाव बढ़ाने वाले कारणों से दूरी बनाए रखें। अब आपका अगला प्रश्न होगा कि आखिर ऐसा कैसे कर सकते हैं? उसका जवाब आपके अंदर निहित है, जिसे आप आध्यात्म के रूप में जानते हैं। ऐसी कई आध्यात्मिक साधनाएं हैं, जिनके जरिए आप तनाव को दूर कर सकते हैं। वे साधनाएं हमें खुद से जोड़ने में मदद करती हैं, जिससे हम खुद को सकारात्मक, शांत और संतुलित महसूस करते हैं, जिससे आपकी टेंशन अपने आप उड़न-छू हो जाती है।

सोलवेदा तनाव को दूर करने के इस तरह के कुछ आध्यात्मिक को बारे में बात कर रहा है, जिससे न सिर्फ आप अपने स्ट्रेस को कम कर पाएंगे, बल्कि अपने आपको समझ भी सकेंगे।

प्रकृति से करें शुरुआत (Prakriti se karen shuruat)

प्रकृति ने चींटी से लेकर इंसान तक को बनाया है, घास से लेकर बरगद जैसा विशालकाय पेड़ बनाया है। प्रकृति अद्भुत और अनमोल है। अपने तनाव को दूर करने के लिए सबसे पहले आपको प्रकृति से जुड़ना होगा। जब आप प्रकृति के द्वारा बनाई गई सभी संरचनाओं का सम्मान करते हैं तो, आप आध्यात्मिकता (Spirituality) के मार्ग पर चलना शुरू कर देते हैं। ओशो ने अपनी किताब एक्स्टसी: फॉरगॉटन लैंग्वेज में लिखा है कि, “मेरे लिए धर्म का अर्थ है: प्रकृति के साथ संतुलन बनाना।” ओशो आगे लिखते हैं कि, “जब आप प्रकृति में विश्वास करने लगते हैं, तब आप धीरे-धीरे प्रकृति की तरह ही शांत हो जाते हैं। आप खामोश रहते हुए भी खुशी और उत्साह महसूस करते हैं। आपका मन प्रकृति की तरह उत्सव से भरपूर हो जाता है। आप छोटी चीजों में भी खुशियां मनाने लगते हैं।”

मन-शरीर-आत्मा का संतुलन होने पर तनाव के लिए जगह ही नहीं बचती है। यह संतुलन बनाने में प्रकृति मदद कर सकती है। हमारी भारतीय संस्कृति में इसी कारण से अध्यात्म को सर्वोपरी स्थान दिया गया है। अध्यात्म को तो विज्ञान भी सहमति देता है। इस तथ्य को साबित करने के लिए स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक रिसर्च की गई, जिसमें पाया गया कि प्रकृति के बीच में रहने वाले लोगों में तनाव कम होता है। ऐसे लोग काफी शांत स्वभाव के होते हैं। एक और अध्ययन अमेरिका स्थित प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा किया गया, जिसमें पाया गया कि जो लोग प्रकृति से दूर रहते हैं, उनका मानसिक स्वास्थ्य अच्छा नहीं होता है। उनमें मानसिक समस्याएं ज्यादा पाई जाती हैं।

रचनात्मक पहलू पर काम करें (Rachnatmak pahlu par kam karen)

अपने अंदर के रचनात्मक पहलू पर काम करना भी अध्यात्म के रास्ते पर चलने जैसा है। अपनी रचनात्मकता के साथ आप अंतर्निहित कला को उजागर कर सकते हैं और तनाव को दूर कर सकते हैं। दुनिया में और इतिहास ऐसे कई लोग हैं, जिन्होंने आध्यातमिकता के मार्ग पर चलकर अपनी रचनात्मकता को विश्व प्रसिद्ध कर दिया है। जैसे; महान चित्रकार वान गाग, प्रख्यात लेखक लियो टॉल्स्टॉय और बौद्ध कवि वांग वेई। इन लोगों ने अपनी कला के ज़रिए आध्यात्मिकता को प्राप्त किया।

नृत्य, संगीत, लेखनी और चित्रकारी जैसी सृजनात्मक और रचनात्मक कलाएं आपके भीतर की भावनाओं को बाहर निकालने का प्रयास करती हैं। इस तरह से जब आप अपनी रचनात्मकता पर फोकस करते हैं, तब तनाव अपने आप ही कम हो जाता है। कर्नाटक संगीतज्ञ मंगला कार्तिक बताते हैं कि, “जब मैं कॉलेज में पढ़ता था, तब परीक्षा के समय मैं ज्यादा गाने गाते था, क्योंकि संगीत मेरे परीक्षा के तनाव को कम करता था। आज भी, संगीत मुझे तनाव मुक्त रखता है। मेरा मानना है कि ये मेरी रचनात्मकता ही है, जो मुझे खुद से जुड़ने में मदद करती है।”

आध्यात्मिकता की करें प्रैक्टिस (Adhyatmikta kya kare practice)

कभी आपने गौर किया है कि जब आप तनाव में होते हैं, तो आपकी सांसें तेज़ हो जाती हैं और दिल जोर से धड़कने लगता है। लेकिन, इन शारीरिक मुद्राओं को हम नियंत्रित कर सकते हैं। तनाव में भी आप अपनी सांसों और शरीर पर नियंत्रण रख सकते हैं। इसका सबसे आसान तरीका है श्वास तकनीक, जिसे आप ब्रीदिंग टेक्निक के तौर पर भी जानते हैं। जब आप अपनी श्वास पर ध्यान देंगे तब आप अपने तनाव को कम होता पाएंगे।

शारीरिक मुद्राओं को भारत ने योग का नाम दिया है, जिसमें ब्रीदिंग एक्सरसाइज को प्राणायाम कहा जाता है। जब आप रोजाना प्राणायाम करेंगे तो आप अपने शरीर के प्रति ज्यादा जागरूक रहेंगे। इस आसन से आपके पूरे शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। ध्यान लगाना भी योग का एक भाग है, जिससे हम आध्यात्मिकता के साथ सामंजस्य स्थापित कर पाते हैं। ध्यान करने से हमारा मस्तिष्क शांत रहता है और तनाव कम होता है।

एक वीडियो साइंस ऑफ योगा है, जिसमें न्यूरोसाइंटिस्ट और योग एक्सपर्ट डॉ. मिठू स्टोरोनी योग के बारे में बताते हैं। वे कहते हैं कि योग एक तरह की एक्सरसाइज है, जिससे ना सिर्फ शरीर की मांसपेशियों की कसरत होती है, बल्कि मस्तिष्क की भी एक्सरसाइज होती है। मेडिटेशन करने से मस्तिष्क के तर्क-वितर्क की क्षमता में भी इजाफा होता है, जिससे आपका मस्तिष्क रचनात्मकता की ओर बढ़ता है और तनाव कम होता है। डॉ. स्टोरोनी आगे कहते हैं कि परिवर्तन ही संसार का नियम है। इसलिए परिवर्तन के तहत ही हमारे शरीर और मस्तिष्क में नए विचारों का गठन होता है, जिसके द्वारा हमारे क्रिया-कलापों में भी बदलाव देखने को मिलता है।

प्रार्थना से दूर करें नकारात्मकता (Prarthana se dur kare nakaratmakta)

दुनिया में कई धर्म हैं, जो किसी ना किसी तरह से आपस में हमें जोड़े हुए हैं। अलग-अलग धर्मों में प्रार्थना करने के लिए अलग-अलग तरीके हैं। कोई मंत्र तो कोई गुरबानी, तो कोई अज़ान करता है। पूजा आप एकांत में भी करते हैं और ग्रुप में भी, जिससे दैवीय शक्ति पर हमारा विश्वास पुख्ता होता है। हाउसवाइफ वनजा राधाकृष्णन ऐसा ही एक उदाहरण हैं। वनजा रोज सुबह उठकर श्लोकों का पाठ करती हैं। यह क्रिया वह पूजा के दौरान करती हैं, जिससे वह अपने जीवन के कठिन समय में भी आशावादी महसूस करती हैं। वनजा बताती हैं कि “जब भी मैं प्रार्थना के लिए मंदिर जाती हूं, तब मैं अपनी सभी समस्याओं को ईश्वर के सामने बताती हूं, जिससे न सिर्फ मेरा मन हल्का होता है, बल्कि मैं खुद को आशावादी महसूस करती हूं।”

इसलिए, अगर आप नास्तिक भी हैं, तो भी आपको प्रार्थना करनी चाहिए। ईश्वर की उपासना न करें, लेकिन आत्म-शांति के लिए ध्यान या प्रार्थना ज़रूर करें, जिसके परिणामस्वरूप आप तनाव मुक्त महसूस करेंगे। हांगकांग यूनिवर्सिटी ने एक स्टडी की वहीं पता लगाया कि जो लोग प्रार्थना करते हैं, उन्हें अपने दुखों से लड़ने की शक्ति मिलती है। जब डॉक्टर्स ने उनके ईईजी रिकॉर्ड निकाले तो पाया कि उनके मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि हुई है। एक अध्ययन में तो यह भी देखा गया है कि जब लास्ट स्टेज का कैंसर मरीज ईश्वर या किसी बड़ी शक्ति में विश्वास करता है, तब उसके इलाज में पॉजिटिव रिजल्ट आते हैं। इसलिए आप धार्मिक हो या न हो, जाप या प्रार्थना करने से नकारात्मक भावनाएं दूर होती हैं और जीवन में सकारात्मकता आती है।

X

आनंदमय और स्वस्थ जीवन आपसे कुछ ही क्लिक्स दूर है

सकारात्मकता, सुखी जीवन और प्रेरणा के अपने दैनिक फीड के लिए सदस्यता लें।