छोटी चीजें

छोटी-छोटी चीज़ें भी मायने रखती हैं

पहले समर के पास खुद के लिए पर्याप्त समय था, लेकिन जल्द ही भाई के जाने के बाद उसकी कमी खलने लगी। इससे उसकी निजी ज़िंदगी भी काफी प्रभावित होने लगी।

‘आखिरकार हो गया!’ नियुक्ति पत्र पढ़ने के बाद करण जोर से चिल्लाया। वह खुशी के मारे पागल-सा हो गया। एक लंबे संघर्ष के बाद उसे नौकरी मिल ही गई। इस संघर्ष ने उसके विश्वास को भी पूरी तरह तोड़ दिया था। हालांकि, यह नौकरी दूसरी शहर में मिली थी। फिर भी करण ने इसे एक बेहतर अवसर के रूप में लिया। अब उसकी ज़िंदगी लगभग पटरी पर आ गई थी।

उसका छोटा भाई समर भी काफी खुश था। भला हो भी क्यों न, आखिरकार उसका कट्टर दुश्मन जो यहां से जा रहा था। अब वह अपने बड़े भाई के कमरे पर कब्जा जमा सकता था, जिसे वह हमेशा से चाहता था।

जिस दिन करण अपनी नौकरी पर जा रहा था, समर को लगा कि अंतिम दिन उसके भैया कमरे पर कब्जा जमाने की बात को लेकर कुछ न कुछ ज़रूर मज़ाक उड़ाएंगे। लेकिन समर यह देखकर हैरान था कि वह तो सिर्फ मुस्कुरा रहे थे। ‘अब यह कमरा तुम्हारा है। कमरे और अपनी खुद की भी अच्छी तरह देखभाल करना,’ उसने अपना बैग उठाते हुए चलने से पहले कहा।

ये सब क्या था? समर यह सोचकर हैरान रह गया। यह तो करण की रहने की जगह थी। सबसे छोटे भाई को तो छोड़ दो, वह शायद ही किसी को अपने कमरे में जाने देता था। समर ने कभी इस तरह नहीं सोचा था कि उसका भाई बिना कुछ कहे चला जाएगा। लेकिन उसने कुछ ऐसा ही किया। इसलिए यह काफी मायने भी रखता है।

पहले तो समर के पास खुद के लिए पर्याप्त समय था, लेकिन जल्द ही करण के जाने के बाद उसकी कमी खलने लगी। कमरे में रखे सोफे, दीवार, खिड़कियां और सब कुछ करण की याद दिलाती थीं।

समय तेज़ी से गुजरता गया और करण के छुट्टियों में घर आने का दिन आ गया। जब वह पहुंचा, तो वह अपने भाई को खोजने के लिए सीधे अपने पुराने कमरे में गया, लेकिन समर वहां नहीं था। उसका कमरा वैसे ही था, जैसे वह छोड़कर गया था।

अपने छोटे भाई को अपने ही कमरे में बैठा पाकर उसने तपाक से उसे गले से लगा लिया और कहा, ‘मैंने भी तुम्हें बहुत याद किया!’

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