ज़िन्दगी से मिलना

ऐ ज़िंदगी, चल एक दिन मिलते हैं…

अभिषेक अब तक कुंवारा था और एकाकी जीवन जी रहा था। वह उसी शहर और अपनी पुरानी जॉब में फंस कर रह गया था। वह काफी दिनों से ये सब कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ना चाहता था, जिससे वह अपनी चाहत को पूरा कर सके। कहानी लेखन- उसकी दिली तमन्ना थी।

अभिषेक की उम्र करीब 39 वर्ष थी और वह अपनी जिंदगी में हमेशा-से काफी पीछे था। अरे! भाई जरा ठहरो, अपने काम में वह कभी लेट नहीं होता था। वास्तव में, रोजाना अपने ऑफिस पहुंचने वालों में वह सबसे आगे रहता था। इतना ही नहीं, अभिषेक योगा क्लास में भी दूसरे लोगों से पहले पहुंच जाता था। लेकिन, ज़िंदगी में वह पिछड़ गया था। विशेष रूप से, ज़िंदगी में जब किसी मुकाम को हासिल करने की बारी आती, तो वह हमेशा पिछड़ जाता था और फिर उसका पीछा करने का काफी प्रयास करता था।

अभिषेक 25 वर्ष की उम्र से ही पैसे कमाने लगा, जबकि अधिकतर लोग बाद में ये काम करते हैं। जब वह 33 साल की दहलीज पर पहुंचा, तो उसका ब्रेकअप हो गया। वहीं, उसके दूसरे दोस्त अच्छी-खासी वैवाहिक जीवन जी रहे थे या बाल-बच्चेदार हो गए थे। कुछ लोग, तो दूसरी बार शादी के बंधन में बंध रहे थे, जबकि कुछ लोग अपने अगले वेकेशन के लिए डेस्टिनेशन पर जाने की प्लानिंग कर रहे थे। ब्रेकअप के छह साल बाद भी अभिषेक अब तक कुंवारा था और एकाकी में रह रहा था। वह उसी शहर और अपनी पुरानी जॉब में फंस कर रह गया था। वह काफी दिनों से ये सब कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ना चाहता था, जिससे वह अपनी चाहत को पूरा कर सके। कहानी लेखन- उसकी दिली तमन्ना थी।

अभिषेक को किस्से-कहानियां लिखना काफी पसंद था। वह अपनी कल्पनाशक्ति के प्रति काफी शुक्रगुजार था, जिसके माध्यम से वह कुछ भी कर सकता था। वह अपनी जिंदगी में ऐसे किस्से व कहानियां लिखना चाहता था, जिसे पढ़कर लोग मोटिवेट हों और उनके भीतर उम्मीद की चिंगारी हमेशा जलती रहे। हालांकि, सोचने और करने में अंतर है। उसका यह लक्ष्य काफी असंभव सा था। फिर भी अभिषेक को अपनी कल्पनाशक्ति पर पूरा यकीन था। लेकिन, एक लेखक कैसे अपने अस्थायी विचारों को दिलकश शब्दों में पिरो देता है, इस तरह के हुनर की कमी अभी भी अभिषेक के भीतर मौजूद थी। अभिषेक अक्सर सोचता रहता था कि लेखन में महारत रखने वाले लेखकों से वह कैसे मुकाबला कर पाएगा।

दो हफ्ते के बाद अभिषके का 40वां जन्मदिन आने वाला था। इससे पहले उसने खुद के लिए कुछ-न-कुछ लिखने का निर्णय लिया। ज़िंदगी में हताश-परेशान और प्रेरणा की तलाश करने वाला इंसान भला खुद से ज्यादा कौन हो सकता है। इसके बाद अभिषेक ने अपनी कहानी लिखना शुरू किया। उसकी कहानी का पात्र उसकी तरह ही हमउम्र था और उसकी तरह वह भी ज़िंदगी में काफी पिछड़ा हुआ था। एक पन्ने के बाद दूसरे पन्ने पर लगातार उसने पात्र की कमजोरियों, विफलताओं, आत्म-संदेह, खुद पर दया भाव और मजबूत पक्षों को बखूबी चित्रण किया। इस खूबियों ने उस कहानी को काफी अनोखा बना दिया। उसकी लेखन शैली को देखकर यह अनुमान लगा पाना काफी मुश्किल था कि यह स्टोरी अभिषेक लिख रहा था कि वेंटिंग। अभिषेक की कहानी का मुख्य पात्र भी उसकी तरह ही था, जो ज़िंदगी में तमाम परेशानियों के बावजूद खुशी की तलाश कर लेता है। वह अपने इस विश्वास पर कायम है कि ज़िंदगी को नए ढंग से शुरू करने में कभी देर नहीं होती है।

अभिषेक को अपनी कहानी पूरी करने में करीब दो सप्ताह लग गए। लेकिन, जल्द ही उसने एक के बाद एक किस्से-कहानियां लिखकर ढेर लगा दी। पिछले दो महीने में उसने आठ छोटी कहानियों का संग्रह तैयार कर लिया। सभी कहानी एक ही पात्र के जीवन से जुड़े हुए थे। उन कहानियों में से एक कहानी फिल्म निर्माता को काफी पसंद आयी, जिसे उन्होंने फीचर फिल्म बनाने के लिए खरीद लिया। वर्ष बीतते-बीतते अभिषेक ने कहानी लेखन का यह सिलसिला अनवरत जारी रखा। अभिषक बिना किसी रोक-टोक के और जिंदगी को जीते हुए अपनी लाइफ में एक के बाद एक नए प्रतिमान गढ़ रहा था।

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