त्याग की भावना

दूसरों की खुशी के खातिर त्याग की भावना

मधुरिमा जानती थी कि पैसे बचाने में कितना धीरज और मेहनत लगता है। लेकिन वह अपने सिर पर छत और ज़िंदा रहने के लिए भोजन की व्यवस्था के बगैर ऐसा करने की सोच भी नहीं सकती थी।

जैसे ही मधुरिमा बस से उतरी और अपने फ्लैट की ओर बढ़ी तो उसके दिमाग में हजारों प्लान और आइडिया दौड़ने लगे। 26 वर्षीय मधुरिमा ने थाईलैंड की ड्रीम ट्रिप को सच बनाने के लिए दो वर्षों में कड़ी मेहनत कर काफी पैसे इकट्ठे किए थे। उसने छोटी-छोटी छुट्टियों की कुर्बानी दी थी। मित्रों के खरीदारी पर जाने का न्यौता ठुकराया था। उसके त्याग की भावना को देखें तो वह अपने काम पर भी रोजाना बस से जाकर बचत कर रही थी। फिर उसे उसकी पाबंदियों का फल मिल गया था। वह अगले महीने की फ्लाइट बुक करने के लिए पर्याप्त पैसे जमा कर चुकी थी। आज वह इतनी खुश थी कि राह चलते लोगों को देखकर भी मुस्कुराने से खुद को नहीं रोक पा रही थी।

जैसे ही वह कोने से मुड़ी, उसकी नज़र उस बूढ़े, बेघर आदमी पर पड़ी जो, हमेशा मस्ज़िद के पास बैठा रहता था। उसे नहीं पता था कि कैसे उसका एक पैर उसने गंवा दिया था। वह कपड़े भी फटे-पुराने पहनता था। उसके सामने फैले सफेद कपड़े पर कुछ लोग सिक्के डाल देते थे। वह कभी किसी से पैसा नहीं मांगता था। इधर, मधुरिमा जिसका बजट हमेशा तंग रहता था उसके पास उसे देने के लिए कुछ नहीं बचता था।

अक्सर शांत दिखने वाला बुजुर्ग उस दिन विचलित लग रहा था। बुजुर्ग ने जब उसकी तरफ देखा, तो उसे इशारे से अपने पास बुलाया। हैरान और असहज होती मधुरिमा उसकी ओर चली गई।

वह लगभग रोते हुए अंदाज़ में बोला, ‘तुम एक अच्छी लड़की लगती हो, बेटा। क्या तुम मेहरबानी करके मेरी मदद कर सकती हो?’

मधुरिमा ने आशंका भरे अंदाज़ में पूछा, ‘आपको किस चीज़ की ज़रूरत है?’। बुजुर्ग बोला, ‘कल किसी ने मेरा बैग चुरा लिया। मेरे पास जो कुछ भी था वह सब उसमें था। यहां तक कि उस बैग में वो सारे पैसे भी थे, जो मैंने अपनी बेटी की कॉलेज की फीस के लिए बचाए थे’। यह बताते हुए वह फूट-फूट कर रोने लगा।

मधुरिमा पलकें झपकाते हुए सुनती रही। उसे उस रोते हुए आदमी के लिए बुरा लग रहा था, लेकिन वह जानती नहीं थी कि वह उसकी कहानी पर भरोसा करे अथवा नहीं। उसने पूछा, ‘कितना.. आपको कितना पैसा चाहिए?’

उसने अपनी आंखें पोंछते हुए उसकी ओर देखकर कहा, ‘15 हजार रुपए’। मैं वर्षों से बचत कर रहा था। मैं चाहता था कि मेरी बेटी कॉलेज जाए। मैं चाहता था कि वह एक अच्छी ज़िंदगी जिए। लेकिन अब… अब सब कुछ खत्म हो गया.. सब चला गया’। वह फिर से फूट-फूटकर रोने लगा।

मधुरिमा जानती थी कि पैसे बचाने में कितना धीरज और मेहनत लगता है। लेकिन वह अपने सिर पर छत और ज़िंदा रहने के लिए भोजन की व्यवस्था के बगैर ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती थी। मधुरिमा ने उस व्यक्ति से इस बारे में सोचने के लिए कुछ समय माँगा। उसके मन में भी त्याग की भावना आ रही थी। वह रातभर इस बारे में सोचती रही। लेकिन वह पहले से ही जानती थी कि उसे क्या करना था।

थाईलैंड कहीं भागा नहीं जा रहा था और जो पैसे उसने बचाए थे, उसकी भरपाई करने में उसे केवल कुछ और महीनों का वक्त ही तो और लगेगा। लेकिन उसका त्याग एक नहीं बल्कि दो ज़िंदगियों को बेहतर बनाएगा।

त्याग की भावना को बयां कर पाना काफी मुश्किल होता है, अगली सुबह उसने उस बुजुर्ग को पैसे देते हुए कहा, ‘ईद मुबारक’।

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