मनुष्य का तोहफा

एक इंसान का सबसे बड़ा तोहफा

"मैं नहीं चाहता कि कभी एक पिता बनूं", अपनी असहमति जताते हुए मनीष ने कहा। मैं अपनी सारी ज़िंदगी वैसे ही जीना चाहता हूं, जैसे अभी चल रही है और मेरे पास आने वाले समय में कुछ करने के लिए बहुत सारी प्लानिंग है। जैसे-पूरी दुनिया की यात्रा करना।

मनीष स्टॉकहोम के एक होटल के कमरे में बैठा था, जहां वह छुट्टी मनाने गया था। उसकी सूची में शामिल वो जगह जहां उसे अपनी छुट्टियां बिताने की लंबे समय से ख्वाहिश थी। आखिरकार उसने इस ख्वाहिश को भी पूरी कर ली। लेकिन, आज उसका मन कहीं और खोया हुआ था। दरअसल, आज उसके बुजुर्ग पिताजी का जन्मदिन था, जिनका कुछ साल पहले ही निधन हो गया था।

मनीष को वो दिन अभी भी काफी अच्छी तरह याद थी, जब वे दोनों एक दिन दोपहर में मछली पकड़ने गए थे। चारा डालने के बाद जब वे दोनों लोग बड़े ही शांत मन से मछली के फंसने का इंतजार कर रहे थे, तभी मनीष ने बहुत ही सामान्य ढंग से अपने पिता से पूछा कि पिताजी.. अब तक की पूरी ज़िंदगी में आपको सबसे खास उपलब्धि क्या रही है?

“ये तो बहुत ही साधारण-सी बात है। मेरी ज़िंदगी की सबसे खास उपलब्धि तुम हो,” उन्होंने जवाब दिया था। “एक पिता बनना किसी भी इंसान के लिए ज़िंदगी का सबसे बेहतरीन तोहफा होता है।”

इस पर मनीष ने अपनी असहमति जताते हुए कहा था ” लेकिन, मैं नहीं चाहता कि कभी भी एक पिता बनूं।” मैं अपनी ज़िंदगी वैसे ही जीना चाहता हूं, जैसे अभी चल रही है और मेरे पास आने वाले समय में कुछ करने के लिए बहुत सारी प्लानिंग है। जैसे-पूरी दुनिया की यात्रा करना।

उसकी बातें सुनकर मनीष के पिता थोड़ा मुस्कुराए, पर उन्होंने इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोला। उनके मन-मस्तिष्क में फिलहाल वहीं बात घूम रही थी, जब वे भी मनीष की तरह ही कभी ऐसा ही सोचते थे। “एक दिन तुम भी दुनिया की रीत समझ जाओगे”, उन्होंने मनीष से कहा और मछली मारने में अपना पूरा ध्यान लगाने लगे।

अपने पिता की कही बात आज भी मनीष के दिलो-दिमाग में यादगार के रूप में मौजूद थी। उसने मोबाइल में मौजूद अपने पिता जी के पुराने फोटो को देखा। फिशिंग के दौरान उसने  यह तस्वीर खींची थी। मनीष अपनी सोच में डूब गया, उसके पिता जी ने किसी इंसान की ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन तोहफे के बारे में आखिर क्या कहा था।

मनीष उन जगहों के बारे में सोच रहा था, जहां कभी वह घूमने गया था, जहां जमकर खूब पार्टियां की थीं और अपने पैसे की बदौलत वो विलासमय जीवन जी चुका था। लेकिन, उसे अब यह बात समझ में आ गई थी कि आखिर उसकी ज़िंदगी के मायने क्या हैं? “पिता जी आप बिल्कुल सही कहते थे”, मनीष ने मन ही मन कहा। इतना कहते ही उसका गला भर आया।

अचानक से मनीष की चेतना उस समय भंग हो गई, जब सुमित ने उसे पुकारा, “डैड आप अब चलिए।” आपने मुझसे वादा किया था मछली पकड़ने आप मुझे भी अपने साथ ले जाएंगे।

इसके बाद मनीष ने अपनी फिशिंग रॉड और कार की चाबी उठाई और दोनों पार्किंग की तरफ चल पड़े। चलते-चलते उसने मुस्कुराते हुए अपने बेटे सुमित ने पूछा-“तुम्हें पता है किसी इंसान की ज़िंदगी का सबसे बेहतरीन तोहफा क्या होता है?”

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