सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के जीवन और उनकी रचनाओं की एक झलक

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के जीवन और उनकी रचनाओं की एक झलक

अज्ञेय ने 1943 में सात कवियों के विचार और कविताओं को लेकर ‘तार सप्तक’ का संपादन किया। उन्होंने आधुनिक हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया, जिसे प्रयोगशील कविता की कहा गया।

हिंदी के महान कवि, लेखक और एक क्रांतिकारी के रूप में हमेशा चर्चा में रहे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी का जन्म 7 मार्च, 1911 को कसया में हुआ। उनका बचपन लखनऊ की गलियों में भागते हुए बीता और पढ़ाई- लिखाई की शुरुआत और अंत जम्मू-कश्मीर में हुई। उन्होंने यहीं पर घर में संस्कृत, रामायण, फारसी और अमेरिकी पादरी से अंग्रेजी की शिक्षा ली। शास्त्री जी को स्कूल शिक्षा में विश्वास नहीं था। इसलिए बचपन में व्याकरण के पण्डित से मेल नहीं हुआ। वे अपनी एकलौती बहन के लाडले थे और बीच के दो भाइयों से इनकी बिल्कुल भी नहीं बनती थी। मगर, अपने सबसे छोटे भाई के लिए सच्चिदानन्द का स्नेह बचपन से ही था।

वे 1919 में पिता के साथ नालन्दा आए, और इसके बाद पच्चीस साल की उम्र तक यही अपने पिता के ही साथ रहे। फिर उनके पिता जी ने उन्हें हिन्दी सिखाना शुरू किया, जो सहज और संस्कारी भाषा के पक्ष में थे। नालन्दा से शास्त्री जी पटना आए और यहां आकर ही अंग्रेजी से विद्रोह का बीज उनके के मन में अंकुरित हुआ। शास्त्रीजी के पुराने दोस्त रायबहादुर हीरालाल ही उनकी हिन्दी भाषा की लिखाई की जांच करते थे। उनके एक और दोस्त राखालदास थे, जिनसे दोस्ती होने से उन्होंने बंग्ला सीखी और उन्हीं के साथ अज्ञेय जी ने इण्डियन प्रेस से छपी बाल रामायण, बाल महाभारत, बालभोज, इन्दिरा (बकिमचन्द्र) जैसी पुस्तकें पढ़ीं।

अज्ञेय ने स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह के साथ मिलकर क्रांति की, जिसके चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा, पर अंत में उन्होंने अपना सारा जीवन लेखनी के नाम कर दिया। अज्ञेय ने 1943 में सात कवियों के विचार और कविताओं को लेकर ‘तार सप्तक’ का संपादन किया। उन्होंने आधुनिक हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया, जिसे प्रयोगशील कविता की कहा गया। इसके बाद समय-समय पर उन्होंने दूसरा सप्तक, तीसरा सप्तक और चौथा सप्तक का संपादन भी किया। उन्होंने कई मशहूर उपन्यास लिखे, और कविता जगत में अपना दबदबा कायम रखा। आगे देखते हैं उनकी कुछ मशहूर रचनाओं की एक झलक, जिसने सभी के दिलों में अज्ञेय के साहित्य को ज़िंदा रखा है।

शेखर उपन्यास का उद्देश्य क्या है? (Shekar upanyas ka uddeshye kya hai?)

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय का लिखा एक उपन्यास ‘शेखर’ है। इसकी भूमिका में अज्ञेय कहते हैं कि ये जेल के जीवन में केवल एक रात में महसूस की गयी बड़ी गहरी वेदना है। इस उपन्यास का पात्र शेखर जन्म से ही विद्रोही है। वो एक ऐसा आदमी है जिसे परिवार, समाज, व्यवस्था, मर्यादा, किसी का डर नहीं है। उसे स्वतंत्र रहना पसंद है, और व्यक्ति की स्वतंत्रता को उसके विकास के लिए बेहद ज़रूरी मानता है।

अज्ञेय ने मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से ‘शेखर’ के ज़रिए एक व्यक्ति के विकास की कहानी बुनी है जो अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ देश की समस्याओं पर विचार करता है, अपनी शिक्षा-दीक्षा, लेखन, और आज़ादी की लड़ाई के चलते कई लोगों के संपर्क में आता है, लेकिन उसके जीवन में सबसे गहरा और खास असर ‘शशि’ का पड़ता है, जो रिश्ते में उसकी बहन लगती है। लेकिन दोनों के रिश्ते भाई-बहन के संबंधों के बने-बनाए सामाजिक ढांचे से काफी आगे निकलकर मानवीय संबंधों को एक नई परिभाषा देते हैं।

‘शेखर’ पूरी तरह से मन में आए विचारों को सामने खोल कर रखती हुई सी लगती है और उसमें कुछ भी बनावटी नहीं लगता। शायद इसीलिए ‘शेखर’ आज भी उपन्यास प्रेमियों के दिलों पर छाई रहती है। अज्ञेय ने कई दिल छू लेने वाली कविताएं भी लिखीं हैं।

अज्ञेय की कविता (Agyeya ki kavita)

उधार
सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी
और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी।
मैनें धूप से कहा: मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार
चिड़िया से कहा: थोड़ी मिठास उधार दोगी?
मैनें घास की पत्ती से पूछा: तनिक हरियाली दोगी—
तिनके की नोक-भर?
शंखपुष्पी से पूछा: उजास दोगी—
किरण की ओक-भर?
मैंने हवा से मांगा: थोड़ा खुलापन—बस एक प्रश्वास,
लहर से: एक रोम की सिहरन-भर उल्लास।
मैने आकाश से मांगी
आंख की झपकी-भर असीमता—उधार।
सब से उधार मांगा, सब ने दिया।
यों मैं जिया और जीता हूं
क्योंकि यही सब तो है जीवन—
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला,
गन्धवाही मुक्त खुलापन,
लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह,
और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का:
ये सब उधार पाये हुए द्रव्य।
रात के अकेले अन्धकार में
सामने से जागा जिस में
एक अनदेखे अरूप ने पुकार कर
मुझ से पूछा था: “क्यों जी,
तुम्हारे इस जीवन के
इतने विविध अनुभव हैं
इतने तुम धनी हो,
तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे—उधार—जिसे मैं
सौ-गुने सूद के साथ लौटाऊंगा—
और वह भी सौ-सौ बार गिन के—
जब-जब मैं आऊंगा?”
मैने कहा: प्यार? उधार?
स्वर अचकचाया था, क्योंकि मेरे
अनुभव से परे था ऐसा व्यवहार ।
उस अनदेखे अरूप ने कहा: “हां,
क्योंकि ये ही सब चीज़ें तो प्यार हैं—
यह अकेलापन, यह अकुलाहट,
यह असमंजस, अचकचाहट,
आर्त अनुभव,
यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय
विरह व्यथा,
यह अन्धकार में जाग कर सहसा पहचानना
कि जो मेरा है वही ममेतर है
यह सब तुम्हारे पास है
तो थोड़ा मुझे दे दो—उधार—इस एक बार—
मुझे जो चरम आवश्यकता है।
उस ने यह कहा,
पर रात के घुप अंधेरे में
मैं सहमा हुआ चुप रहा; अभी तक मौन हूँ:
अनदेखे अरूप को
उधार देते मैं डरता हूँ:
क्या जाने
यह याचक कौन है?

प्रातः संकल्प
ओ आस्था के अरुण!
हांक ला
उस ज्वलन्त के घोड़े।
खूंट डालने दे
तीखी आलोक-कशा के तले तिलमिलाते पैरों को
नभ का कच्चा आंगन!
बढ़ आ, जयी!
सम्भाल चक्रमण्डल यह अपना।
मैं कहीं दूर:
मैं बंधा नहीं हूँ
झुकूं, डरूं,
दूर्वा की पत्ती-सा
नतमस्तक करूं प्रतीक्षा
झंझा सिर पर से निकल जाए!
मैं अनवरुद्ध, अप्रतिहत, शुचस्नात हूँ:
तेरे आवाहन से पहले ही
मैं अपने आप को लुटा चुका हूँ:
अपना नहीं रहा मैं
और नहीं रहने की यह बोधभूमि
तेरी सत्ता से, सार्वभौम! है परे,
सर्वदा परे रहेगी।
“एक मैं नहीं हूं”—
अस्ति दूसरी इस से बड़ी नहीं है कोई।
इस मर्यादातीत
अधर के अन्तरीप पर खड़ा हुआ मैं
आवाहन करता हूं:
आओ, भाई!
राजा जिस के होगे, होगे:
मैं तो नित्य उसी का हूं जिस को
स्वेच्छा से दिया जा चुका!

जीवन
चाबुक खाए
भागा जाता
सागर-तीरे
मुंह लटकाए
मानो धरे लकीर
जमे खारे झागों की—
रिरियाता कुत्ता यह
पूंछ लड़खड़ाती टांगों के बीच दबाए।
कटा हुआ
जाने-पहचाने सब कुछ से
इस सूखी तपती रेती के विस्तार से,
और अजाने-अनपहचाने सब से
दुर्गम, निर्मम, अन्तहीन
उस ठण्डे पारावार से!

उलाहना
नहीं, नहीं, नहीं!
मैंने तुम्हें आंखों की ओट किया
पर क्या भुलाने को?
मैंने अपने दर्द को सहलाया
पर क्या उसे सुलाने को?
मेरा हर मर्माहत उलाहना
साक्षी हुआ कि मैंने अंत तक तुम्हें पुकारा!
ओ मेरे प्यार! मैंने तुम्हें बार-बार, बार-बार असीसा
तो यों नहीं कि मैंने बिछोह को कभी भी स्वीकारा।
नहीं, नहीं नहीं!

ओ एक ही कली की
ओ एक ही कली की
मेरे साथ प्रारब्ध-सी लिपटी हुई
दूसरी, चम्पई पंखुड़ी!
हमारे खिलते-न-खिलते सुगन्ध तो
हमारे बीच में से होती
उड़ जायेगी!

आपको अज्ञेय के बारे में जानकार और उनकी कविताएं पढ़कर कैसा लगा हमें कमेंट में ज़रूर बताएं। ऐसे ही और आर्टिकल पढ़ने के लिए आप सोलवेदा से जुड़े रहें।

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