काबिलियत

परिवार और प्रजा के बीच अनोखा चुनाव

बूढ़ी हो चुकी रानी को अपनी प्रजा की चिंता सता रही थी, वो चाहती थी कि किसी काबिल को राजा बनाए, जो उनके नाम को सदियों तक अमर रखे, प्रजा की सेवा करे। पूरी कहानी जानने के लिए पढ़ें ये खास लेख।

ये कहानी सालों पुरानी है। दक्षिण भारत के राजनगर साम्राज्य की रानी थी, रुकमणि। इनकी उम्र 100 साल थी। साम्राज्य और लोगों की रक्षा के लिए रानी रुकमणि के पति महाराज गौतम ने युद्ध के मैदान में अपने प्राण त्याग दिए थे। तब से वो ही राज्य की देखभाल कर रहीं थीं। वहीं, बूढ़ी हो चुकी रानी को मन ही मन ये चिंता सता रही थी आखिर किसे राजा चुनूं? ये फैसला भी उन्हें जल्द लेना था, अपनी मौत से पहले।

रानी का एक बेटा भी था, राघवेंद्र। जो उनसे बेइंतहा प्यार करता था। लेकिन, रानी रुकमणि को राजा चुनने के लिए परिवार और प्रजा के बीच अनोखा चुनाव करना था।

कुछ दिनों के बाद रानी ने काफी कुछ सोच-समझकर बेटे से कहा,

रानी: बेटे, राघवेंद्र…

सोच रही हूं, बड़ा समारोह कर तुम्हारी ताजपोशी करा हूं?

राघवेंद्र: (चेहरे पर मुस्कान लिए) हां, मां… क्यों नहीं। अब तो तुम काफी बूढ़ी हो गई हो। दुश्मनों ने हमारे राज्य पर हमला कर दिया, तो उनसे निपटने में दिक्कत होगी।

रानी: इसीलिए तो… मैं तुम्हें, एक साल का वक्त देती हूं।

तुम अपनी पिता की तरह साबित करके दिखाओ और ये सारा राज-पाट तुम्हारा।

राघवेंद्र: चिंतित होकर… पर मां… तुम मुझे यूं ही क्यों नहीं राजा बना देती, आखिर उसका हकदार तो मैं ही हूं।

रानी: (तेज़ आवाज़ में) … पहले साबित करो।

रानी इस बात से भली-भांति वाकिफ थी कि उनका बेटा राघवेंद्र जनता के बारे में नहीं, बल्कि अपने बारे में सोचता है। वो सारा यश, वैभव, धन सब अय्याशी में गंवा देगा। सबसे ज़रूरी, प्रजा की सेवा भी नहीं करेगा। ये राज़ की बात अपने सेनापति से भी बता दिया और आदेश दिया, तुम 24 घंटे मेरी रक्षा करोगे। सिर झुका, सेनपति बोला… जो हुकूम रानी मां।

कुछ दिनों बाद, जिसका डर था वही हुआ। सत्ता की लालच में राघवेंद्र ने साम्राज्य पाने के इरादे से नींद में सोई अपनी ही मां पर हमला किया। अंधेरे में मां के कक्ष में जाकर, रजाई में सोई रानी मां पर हमला किया। इसके कुछ देर बाद। पीछे से सेनापति और रानी मां आए… और बेटे की करतूत देख रानी मां ने आदेश दिया। इसे कारागार में डाल दो। देखते ही देखते राघवेंद्र को जेल हो गई।

कुछ दिनों के बाद उन्होंने सेनापति को राजपाट सौंप, जनता को शांति और सुकून भेंट किया।

इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि हमेशा काबिल व्यक्ति को ही जिम्मेदारी का पद देना चाहिए, किसी लालची को नहीं। वहीं, राघवेंद्र से यही सीख मिलती है कि जब भी बात काबिलियत साबित करने की आए, तो धोखे से नहीं बल्कि खुद के दम पर कोशिश करनी चाहिए।

कहानियों से प्रेरणा लेने के लिए सोलवेदा पर पढ़ते रहें लघु कथाएं।

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