यादगार सफर

शायद यही सही समय है जब मैं उससे अपने दिल का हाल कह सकता हूं। मैं रूपा की तरफ मुड़ा और कुछ कहने को हुआ ही था कि, मेरा फ़ोन बजने लगा। वो मेरी पत्नी का फोन था। पढ़िए कैसे मैं एक फोन रिंग से अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती करने से बच गया।

मैंने अब तक ग्रुप ट्रैवलिंग ही की थी। पर पहली बार सोलो ट्रैवलिंग का प्लान बनाया और अपनी गाड़ी में बैठकर, हिमाचल की वादियों की तरफ बढ़ गया।

मैप के सहारे अगली रात तक मैं हिमाचल में पहुंच चुका था। मुझे बहुत भूख भी लग रही थी, सो मैंने एक ढाबे पर गाड़ी रोकी और खाना खाया।

पहाड़ों में बहुत ठंड थी और लोग बता रहे थे कि आज रात बर्फबारी भी हो सकती है। मैंने ढाबे के मालिक से पूछा, “भाई साहब! यहां आस-पास कोई होटल या रिजॉर्ट मिल जाएगा?”

“नहीं जी!… यहां तो 3 किलो मीटर तक बस पहाड़ ही पहाड़ है। होटल आपको उसके बाद ही मिलेंगे।”

उस आदमी की बात सुनकर मैं परेशान हो गया। एक तो रात भी बहुत हो चुकी थी और दो दिन से गाड़ी चलाते हुए थक भी गया था। मुझे सोलो ट्रैवलिंग के ख्याल पर थोड़ा गुस्सा आया, क्योंकि उस अंजान शहर में मैं बिल्कुल अकेला था। मुझमें 3 किमी तक और गाड़ी चलाने की हिम्मत नहीं थी। थकान से चूर हो रहा था और बस तुरंत ही सो जाना चाहता था।

मुझे परेशान देखकर ढाबे के मालिक ने मुझसे कहा “वैसे मेरा घर पास में ही है। तुम चाहो तो वहां रात बिता सकते हो।”

उसकी बात सुनकर मुझे थोड़ी तसल्ली हुई और मैं राज़ी हो गया। फिर उसने मुझसे, कहां से आया हूं? क्या करता हूं? जैसे सवाल पूछे और फिर मेरी ही कार में बैठकर मुझे अपने घर ले गया। उसका घर ढाबे से ज़्यादा दूर नहीं था। उसने घर पहुंचते ही दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा एक बहुत ही सुन्दर लड़की ने खोला।

“ये मेरी बेटी है।” उस आदमी ने मुझसे कहा और उसकी लड़की ने मुझसे हाथ जोड़कर नमस्ते किया।

“बेटा आज ये यही रुकेंगे। इन्हें मेहमानों वाले कमरे में ले जाओ।” उसने अपनी बेटी से कहा और खुद अपने कमरे में सोने चला गया।

“आपको कुछ भी चाहिए हो तो रूपा से मांग लेना।” उसने कमरे में जाते-जाते कहा।

“रुपा!” उसका नाम अचानक से मेरे होंठों से निकल गया।

“जी?” लड़की ने जवाब दिया, तो मैं खुद में ही शर्मिंदा होकर मुस्कुरा दिया। उसने मुझे मुस्कुराते देखकर, नज़रें झुका लीं।

“पानी भर कर रख दिया है और कुछ चाहिए हो तो बता दीजिएगा।” उसने मुझे कमरे तक छोड़ा और जाने लगी।

“सुनिए…!” मैंने उसे जाने से रोकना चाहा, पर फिर उसे रोकने का कोई बहाना ना होने की वज़ह से फिर कहा “जी कुछ नहीं!”

वो चली गई और उसके साथ मेरा दिल और नींद भी चली गई। मैं सोने के इरादे से लेट गया पर लाख कोशिशों के बाद भी नींद नहीं आई तो उठ कर कमरे से जुड़ी हुई बालकनी में टहलने लगा। तभी मुझे बाहर रूपा दिखी। वो आंगन में जल रही लाइटें बुझाती घूम रही थी। उसने मेरी तरफ देखा और बालकनी के नज़दीक आकर बोली “आप सोए नहीं अभी?”

“नींद नहीं आ रही।” मैंने कहा।

“सो जाइए। बर्फ गिरने वाली है। ध्यान से दरवाज़ा और खिड़कियां लगा लेना।” उसने कुछ चिंता से कहा।

“तुम्हें ठंड नहीं लगती?” मैंने उसकी बात बिना सुने ही, उसे सिर्फ एक पतली-सी शौल ओढ़े देखकर पूछ लिया।

“हम बर्फ में रहते हैं ना। हमें आदत है।” उसने इतना ही कहा कि मुझे एक ज़ोरदार छींक आ गई। ये देखकर वो हंस दी।

मैंने कहा था “ना दरवाज़े खिड़कियां लगा कर सो जाइए। आप जैसे परदेशियों से ठंड नहीं झिलेगी।” ऐसा बोलकर वो थोड़ा और हंस दी और अंदर चली गई।

मैं कुछ देर तक उसकी हंसी के एहसास में डूबा खड़ा रहा फिर दरवाज़े और खिड़कियां बंद करके सो गया।

सुबह देर तक सोता रहा। जब उठा तो रूपा चाय लिए खड़ी थी। उसके बाबा ढाबे पर चले गए थे। मैं सोया हुआ तो उन्होंने मुझे जगाना ठीक नहीं समझा।

मैंने निकलने से पहले रूपा से कहा “अपने पिता को मुझे शरण देने के लिए शुक्रिया कह दे।” उसने हां में सिर हिला दिया।

तभी मुझे एहसास हुआ कि रूपा घर पर अकेली है और शायद यही सही समय है जब मैं उससे अपने दिल का हाल कह सकता हूं।

मैं रूपा की तरफ मुड़ा और कुछ कहने को हुआ ही था कि, मेरा फोन बजने लगा। वो मेरी पत्नी का फोन था। फोन पर उसकी और मेरी तस्वीर भी लगी थी। फोन की घंटी की आवाज़ से जैसे मैं नींद से जागा होऊं।

मैंने फोन उठाया और बिना रुपा की तरफ देखे उसके घर से निकल आया। मैं जानता था, रुपा मुझे देर तक जाते देखते रही थी। पर मुझे एहसास हो चुका था कि मैं एक बहुत बड़ी गलती करने से पहले ही संभल गया हूं। यह सफर मेरे लिए यादगार बन गया क्योंकि इस सफर ने मुझे बहुत गहरा सबक सिखाया था।

टिप्पणी

टिप्पणी

X

आनंदमय और स्वस्थ जीवन आपसे कुछ ही क्लिक्स दूर है

सकारात्मकता, सुखी जीवन और प्रेरणा के अपने दैनिक फीड के लिए सदस्यता लें।