इश्क का रंग सफेद

इश्क का रंग सफेद

“मेरे पति नरेंद्र नहीं रहें। एक सड़क दुर्घटना में कुछ साल पहले ही वो चल बसे…।” बड़े दर्द भरे शब्दों में आरोही ने कहा तो रवि बोला, “ओह आई एम सॉरी! पर नरेंद्र तो वहीं थे न जिससे तुम प्यार करती थी? तुम दोनों की शादी हो गई थी?”

सफेद साड़ी, चेहरे की उजड़ी हुई रंगत और बिखरे बालों में आरोही को यूं सब्जियों से भरा थैला लाते देख रवि के होश उड़ गए।

उसने अपनी कार का शीशा नीचे करके दोबारा देखा कि कहीं उसकी आंखों को कोई धोखा तो नहीं हुआ, पर नहीं ये तो सच में आरोही ही थी। वही आरोही जिससे एक वक्त पर रवि अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करता था। पर रवि की किस्मत उस वक्त उसके साथ नहीं थी, क्योंकि तब आरोही किसी और से प्यार करती थी। इसलिए रवि को आरोही की खुशी के लिए उसे भूल जाना पड़ा था। उसे आज यूं अचानक देख कर जैसे रवि का वो सालों पुराना प्यार फिर उभर आया हो।

रवि अपनी कार से नीचे उतरा और आरोही की तरफ बढ़ा। उसने आरोही के पास जाकर उसके हाथ से एक ज़्यादा भारी वाला थैला ले लिया, रवि के ऐसा करने से आरोही असहज हो गई और रवि से अपना थैला वापस लेते हुए बोली, “माफ कीजिए पर मैंने आपको पहचाना नहीं। आप कौन हैं?” आरोही का ये सवाल जैसे रवि के सीने के पार हो गया। हाय! आरोही तो रवि का चेहरा भी भूल चुकी थी। 

“आरोही! मैं? मुझे नहीं पहचाना? मैं तुम्हारा रवि…मेरा मतलब तुम्हारा दोस्त रवि।” रवि ने अपना परिचय देते हुए कहा तो आरोही ने माफी मांगते हुए कहा, “ओह! हां सो सॉरी रवि। बहुत टाइम बाद मिले न तो पहचान नहीं पाई। वैसे तुम यहां..?”

“हां अपने किसी काम से यहां तुम्हारे शहर आना पड़ा। देखो यहां आते ही तुमसे मुलाकात हो गई। कैसी हो तुम आरोही और ये सफेद साड़ी?” रवि पूछते-पूछते खामोश हो गया।

“मेरे पति नरेंद्र नहीं रहें। एक सड़क दुर्घटना में कुछ साल पहले ही वो चल बसे…।” बड़े दर्द भरे शब्दों में आरोही ने कहा तो रवि बोला, “ओह आई एम सॉरी! पर नरेंद्र तो वहीं थे न जिससे तुम प्यार करती थी? तुम दोनों की शादी हो गई थी?” 

“हां और हम बहुत खुश थे पर फिर अचानक न जाने किसकी नज़र लग गई।” आरोही ने फिर उसी दर्द के साथ कहा तो रवि ने पूछा, “फिर तुमने कभी दोबारा घर बसाने के बारे में नहीं सोचा? तुम जानती हो मैंने अभी तक शादी नहीं की।” रवि ने ये दोनों अलग-अलग बातें एक साथ बोलीं तो आरोही ने अचानक ही उसकी तरफ देखा, जिससे रवि को अपने कहे पर अफसोस हुआ और वो तुरंत बोला, “आई एम सॉरी! मेरा वो मतलब नहीं था।” 

इस पर आरोही बोली, “हम्म..चलो मैं अब चलती हूं मेरा बेटा मेरा इंतज़ार कर रहा होगा।” ये सुनकर रवि ने चौंक कर कहा,“बेटा?” 

“हां! मेरा एक ढाई साल का बेटा है। मैं उसी के साथ रहती हूं। अच्छा चलो मैं चलती हूं।” 

इतना कहकर आरोही जाने लगी और रवि उसे जाते हुए देखता रहा। कुछ दूर पहुंच कर आरोही रुकी और पीछे मुड़कर बोली, “तुम चाहो तो मेरे घर चलकर एक कप चाय पी सकते हो?” आरोही के चाय के लिए पूछने पर रवि कुछ देर खड़ा कुछ सोचता रहा और फिर हल्का-सा मुस्कुरा कर आरोही से बोला, “ज़रूर!” जिससे आरोही के चेहरे पर भी हल्की-सी मुस्कान आ गई। फिर दोनों एक कप चाय के साथ अपनी कहानी को नया मोड़ देने आगे बढ़ गए।

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