जहां शब्द कम पड़ जाते हैं, वहां संगीत दिल जीत लेता है

संगीत केवल दुनिया को एक करने के बारे में नहीं हो सकता है। संगीतकारों के लिए, यह स्वयं से जुड़ने या परमात्मा से जुड़ने की बात भी हो सकती है। हिंदुस्तानी ख्याल और सूफी गायिका स्मिता बेलूर संगीत के बारे में ऐसा ही सोचतीं हैं।

कभी-कभी शब्द हमारी गहरी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने में विफल हो जाते हैं। कहते हैं, जहां शब्द फेल हो जाते हैं, वहां संगीत कामयाब रहता है। इसे आत्मा की भाषा भी कहा जाता है, जिसे हर कोई समझ सकता है। और क्यों ना कहें? संगीत सीमाओं, संस्कृतियों और समाजों से परे है। यह किसी जाति, धर्म या समुदाय को नहीं जानता। यह बस प्रेम जानता है और उसे ही सब जगह फैलाता है। इसलिए, संगीत में प्यार पाने की कोशिश में हम सब एकजुट हैं।

संगीत केवल दुनिया को एक करने के बारे में नहीं हो सकता है। संगीतकारों के लिए यह स्वयं से जुड़ने या परमात्मा से जुड़ने की बात भी हो सकती है। हिंदुस्तानी ख्याल और सूफी गायिका स्मिता बेलूर (Smita Bellur) तो संगीत के बारे में ऐसा ही सोचती हैं। जब स्मिता बेलूर को इस बारे में समझाने को कहा गया, तो उन्होंने 15वीं शताब्दी के सूफी कवि कबीर दास का एक दोहा सुनाया :

अकथ कहानी प्रेम की, कुछ कही न जाए

गूंगे केरी सरकारा, बैठे मुस्काए

अर्थात प्रेम की कहानी अकथनीय है, इसे शब्दों से बयां नहीं किया जा सकता है। कबीर कहते हैं जैसे गूंगा जब मिठाई को खाता है, तो वह सिर्फ मुस्कुराता है, क्योंकि वह उस मिठास को बयां ही नहीं कर सकता।

सोलवेदा के साथ एक साक्षात्कार में स्मिता बेलूर ने एक गायिका के रूप में अपनी यात्रा के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि कैसे आध्यात्मिकता ने उन्हें इंसान के रूप में विकसित होने में मदद की है और कैसे संगीत लोगों को प्यार से जोड़ता है।

आपका पहला पब्लिक परफॉर्मेंस 14 वर्ष की उम्र में हुआ था। तब से आपके भीतर का कलाकार कैसे विकसित हुआ है?

स्टेज पर जाकर परफॉर्म करना हमेशा ही मुझे प्रेरणा देता रहा है। जब लोग कला की सराहना करते हैं, तो एक कलाकार का और ज्यादा काम करने का मन करता है। मुझे लगता है कि मेरे अंदर शुरू से ही एक कलाकार बैठा था। मेरे पिता ने मेरा परिचय हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से कराया और यह बताया कि यह एक लंबी यात्रा है। उन्होंने कहा, ‘यदि आप इसे धैर्य और दृढ़ता से सीखते हैं, तो तभी आप अच्छे नतीजों की उम्मीद कर सकते हैं’। शास्त्रीय संगीत आमतौर पर उम्र के साथ बेहतर होता जाता है, क्योंकि समय के साथ कलाकार उसकी तकनीक, एस्थेटिक्स (सौंदर्यशास्त्र) में महारत हासिल करते हुए उसमें अपनी आत्मा को डाल देता है।

कलाकार को हमेशा कुछ चीज़/बात प्रेरित करती है। आपको अपनी प्रेरणा कहां से मिलती है?

बचपन में ही एकतारा लिए मीराबाई की छवि मेरे मन में बस गई थी। बाद में महान शास्त्रीय गायिका (Shastriya gayika)  किशोरी अमोनकर मुझे पसंद आने लगीं। मेरे मन में एक गायिका की छवि धीरे-धीरे जम रही थी। मीराबाई से किशोरी तक और उसके बाद मेरी अपनी छवि मेरी कल्पना में चलती रही। मुझे नहीं पता कि यह एक अच्छी बात थी या नहीं। फिर भी मैं अनजाने में यह कर रही थी। हालांकि, यह सिर्फ विज्युलाइजेशन ही नहीं था। प्यार मुझे प्रेरित करता है। राग मुझे प्रेरित करते हैं। प्रकृति, सुंदरता और उस्तादों का संगीत मुझे प्रेरित करते हैं।

आप एक प्रशिक्षित हिंदुस्तानी ख्याल गायिका हैं। संगीत की इस शैली ने आपकी आध्यात्मिक यात्रा में किस प्रकार योगदान दिया है?

एक हिंदुस्तानी ख्याल गायक (Khyal gayak) के रूप में हम स्वर, राग सीखते हैं और फिर उसके बाद राग का विस्तार, स्वर-दर-स्वर, राग व्याकरण के अनुसार हर एक को सीखते हैं। इसके बाद राग की सुंदरता परत दर परत उजागर होती है। आकार आलाप, तीव्र तान के माध्यम से, हम राग को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखने लगते हैं, जिसका अपना व्यक्तित्व होता है। एब्स्ट्रैक्ट से फॉर्म (अमूर्त से मूर्त) में यह बदलाव (जिसकी मानव मन कल्पना कर सकता है) एक आध्यात्मिक यात्रा होती है, जो हमें निराकार अनंत अर्थात ईश्वर की ओर ले जाती है।

सूफीज्म (सूफीवाद) अर्थात परमात्मा और अन्य जीवों के प्रति प्रेम। इस फिलोसॉफी ने आपको एक व्यक्ति के रूप में कैसे आकार दिया है?

मेरे लिए सूफीवाद उस परमात्मा है जिसे कोई अपने प्रिय की तरह प्यार करता है, के साथ पूरी तरह एक हो जाने का अनुभव है। साधक को सृष्टि की हर चीज़ में दिव्य प्रकाश दिखाई देने लगता है। अपने साथी जीवों के साथ शांति से रहना उसकी प्रकृति बन जाती है। कोई भी सेवा या कार्य आमतौर पर किसी इरादे से संचालित होता है। एक सूफी का इरादा सिर्फ अपने प्रिय के विचारों में खो जाना है, उसे खुश करना है। सिर्फ उसके प्यार के लिए ना कि किसी इनाम या सजा के इरादे से। मुझे नहीं पता कि इसने मुझे कैसे आकार दिया है। लेकिन आज अपनी खोज के जिस स्तर पर मैं हूं, वहां से और ऊंचा पहुंचने में मुझे और अधिक खुशी होगी।

सूफी संगीत सुनना आनंददायी अनुभव होता है। आपको एक संगीतकार के रूप में दूसरों को ऐसा अनुभव देते हुए कैसा लगता है?

अगर कोई अपने श्रोता को एक आनंददायी अनुभव कि अनुभूति करवा सकता है, तो वह उसके लिए बड़ी उपलब्धि होती है। यदि मेरा संगीत मेरे प्रेम के ऑब्जेक्ट (उद्देश्य) को छूता है, जिसके लिए ये स्वर और शब्द बने हैं, तो मैं अपने आप को भाग्यशाली मानती हूं। मैंने देखा है कि कुछ श्रोता मेरे प्यार की अभिव्यक्ति से अपने आपको जोड़ पाते हैं, लेकिन मैं वास्तव में यह नहीं बता सकती कि मैं सफल हो गई हूं। यह तो सिर्फ श्रोता ही बता सकता है।

आपकीकब तक मेरे मौलाप्रस्तुति दिल को छू लेने वाली है. क्या आप इस कव्वाली को प्रस्तुत करने का अपना अनुभव साझा कर सकती हैं?

यह एक हमेशा पसंद की जाने वाली कव्वाली है। लोग हर मह़फिल में इसकी फरमाइश भेजते हैं, क्योंकि यह एक दिल छू लेने वाला कलाम है। कवि शाज तमकनत ने किसी की दशा को बहुत अच्छी तरह से व्यक्त किया है। यह शायरी मुझे झकझोर देती है, इसका कम्पोजिशन मुझे झकझोर देता है। ऐसा लगता है जैसे कवि ने मेरी विनती को रचयिता के सामने रखते हुए मेरे शब्दों को पंख दे दिए हैं।

एक हर्फ ए तमन्ना हूं बड़ी देर से चुप हूं

कब तक मेरे मौला

ऐ दिल के मकीन देख ये दिल टूट न जाए

कासा मेरे हाथों से कहीं छूट न जाए

मैं आस का बंधा हूं बड़ी देर से चुप हूं

कब तक मेरे मौला..

अर्थात

मैं तो बस इच्छा का पात्र हूं, मैं इतने लंबे समय से चुप हूँ,

लेकिन यह कब तक चलेगा, मेरे प्रभु?

हे दिल के वासी, कृपया इस बात का ध्यान रखना कि मेरा बेचारा दिल न टूटे,

कृपया इस बात का ध्यान रखें कि मेरे हाथ में रखा भीख का कटोरा फिसले नहीं

मैं तो बस एक आशावान सेवक हूं, जो इतने लंबे समय से चुप है,

लेकिन कब तक मैं ऐसे ही चलता रहूं, मेरे प्रभु?

संगीत उसे व्यक्त करता है, जो शांत नहीं रह सकता। जिस समाज में असहिष्णुता व्याप्त है, वहां संगीत लोगों को कैसे जोड़ता है?

आज जो असहिष्णुता हम देखते हैं, वह मुख्य रूप से ऐसे लोगों के समूह द्वारा है, जो केवल घृणा करना पसंद करते हैं। मैं यह देखकर हैरान होती हूं कि कोई इतनी नकारात्मकता के साथ जीवन जीने के बारे में कैसे सोच सकता है। वह नकारात्मकता जो उनके रोम छिद्रों को अवरुद्ध कर देती है। वह रोम जहां प्रेरणा, विचारों और रचनात्मकता की ऑक्सीजन, ताजी हवा की सांस की तरह ही आपके अंदर होनी चाहिए।

अभी भी आशा है, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग यह नहीं जानते हैं कि हमारे पवित्र ग्रंथ इतने सारे क्षेत्रों में एक-दूसरे के करीब हैं। मैंने व्यक्तिगत रूप से कुरान, गीता, उपनिषद और बाइबिल में बहुत समानता देखी है।

भारत के सूफियों और संतों ने अपने गीतों में एक ही विचार रखा है। एक कलाम है:

अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम,

सब को सन्मति दे भगवान

तुम्हारा नाम अल्लाह है, तुम्हारा ही नाम ईश्वर है,

सभी को इसी ज्ञान का आशीर्वाद दें, हे भगवान

आप अपने संगीत के माध्यम से लोगों को क्या संदेश देना चाहती हैं?

प्रेम। स्वरों से, रागों से और पारंपरिक संगीत (Paramparik Sangeet) से प्रेम करें। यह मानव जाति, प्रकृति और उन सभी के लिए जो हमारे बाहर होने के साथ-साथ हमारे अंदर (शांति) भी है। स्वयं से प्रेम करें, परमात्मा के प्रति समर्पण से प्रेम करें।

  • स्मिता बेलूर भारत की पहली महिला हिंदुस्तानी गायिका हैं, जिन्हें पारंपरिक कव्वालों सूफी/इस्लामी रहस्यवादी गायकों के वंश में स्वीकार किया गया है। उन्होंने वहां से व्यापक मार्गदर्शन प्राप्त किया है। उन्होंने अपनी बेटी की परवरिश, उसके संगीत प्रदर्शन और उसकी संगीत की शिक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है।