मन का पात्र कभी भरता नहीं

मन का पात्र कभी भरता नहीं

मैं भिक्षा तभी लेता हूं, जब मुझे यह आश्र्वासन मिल जाए कि मेरा पूरा भिक्षापात्र भर दिया जाएगा। मैं अधूरा भिक्षापात्र लेकर नहीं जाऊंगा।

एक राजमहल के द्वार पर बहुत भीड़ थी। उस द्वार पर सुबह-सुबह एक भिक्षु आया था। उस भिक्षु ने राजा से कहा था, मुझे कुछ भिक्षा मिल सकेगी? राजा ने कहा था कोई कमी नहीं है, तुम जो चाहो मांग लो। उस भिखारी ने अजीब शर्त रखी। उसने कहा कि मैं भिक्षा तभी लेता हूं, जब मुझे यह आश्र्वासन मिल जाए कि मेरा पूरा भिक्षापात्र भर दिया जाएगा। मैं अधूरा भिक्षापात्र लेकर नहीं जाऊंगा। तो यदि यह वचन देते हो कि मेरा पूरा भिक्षापात्र भर देंगे, तो मैं भिक्षा लूं अन्यथा मैं किसी और द्वार पर चला जाऊं।

ऐसा शर्त वाला भिखारी कभी देखा नहीं गया था। यह शर्त कोई इतनी बड़ी भी न थी कि राजा के द्वार से उसे लौटना पड़े। राजा हंसा और उसने कहा कि तुमने मुझे क्या समझ रखा है, क्या मैं तुम्हारे इस छोटे से भिक्षा पात्र को न भर सकूंगा? शायद तुम सोचते हो कि मैं धन-धान्य में कुछ कम हूं और एक भिखारी का भिक्षा पात्र भी न भर सकूंगा?

उसने अपने वजीरों को कहा कि जाओ और अन्न के दानों से नहीं, बल्कि हीरे-मोतियों से इसके भिक्षापात्र को भर दो। उसने कहा कि शर्त मुझे स्वीकार है। राजा हंसा था यह कह कर। लेकिन भिखारी भी हंसा और उसने कहा कि एक बार फिर सोच लें, क्योंकि न मालूम कितने लोगों ने यह शर्त स्वीकार की है और वे इसे पूरा नहीं कर पाए।

राजा ने कहा कि कैसी पागलपन की बातें करते हो। वजीर से कहा कि समय मत खोओ, जाओ और उसके भिक्षापात्र को बहुमूल्य जेवरातों से भर दो। वजीर बहुत से हीरे-मोती लेकर आया। उस राजा के पास कोई कमी न थी हीरे-मोतियों की। अकूत उसके खजाने थे। उस भिखारी के भिक्षापात्र में डाले। लेकिन डालते ही भूल पता चल गई। भिक्षापात्र में डाले गए हीरे-मोती कहीं खो गए और पात्र खाली का खाली रहा। फिर और लाकर डाले गए फिर और लाकर डाले गए और वे जो अकूत खजाने थे, वे खाली होने लगे। सुबह की दोपहर आ गई, लेकिन भिक्षापात्र खाली का खाली रहा।

राजा घबड़ाया, कठिनाई खड़ी हो गई थी। वचन दिया था। लेकिन न मालूम कैसा था यह भिक्षापात्र? शाम हो गई। राजा भी अड़ा हुआ था कि भर देगा उसे। लेकिन राजा भी छोटा पड़ गया। भिक्षापात्र बहुत बड़ा था। वह नहीं भरा, नहीं भरा। शाम में आखिर राजा को उस भिक्षु के पैरों पर गिर जाना पड़ा और माफी मांग लेनी पड़ी। उसने कहा कि मुझे माफ कर दें, भूल हो गई।

लेकिन मैं यह पूछना चाहता हूं यह भिक्षापात्र क्या है? यह कोई जादू है? यह क्या है रहस्य? यह क्या है मिस्ट्री? छोटा सा पात्र है और भरता नहीं और मेरे खजाने खाली हो गए हैं?

उस भिक्षु ने कहा कि ना तो कोई जादू है और न कोई रहस्य। मैं एक मरघट से निकलता था, एक आदमी की खोपड़ी पड़ी मिल गई, उससे ही मैंने यह भिक्षापात्र बना लिया। मैं खुद ही हैरान हो गया यह भरता नहीं है। सच्ची बात यह है आदमी की खोपड़ी कभी भी भरी नहीं है।

उस राजमहल के द्वार पर यह जो घटना घटी थी। कोई रहस्य नहीं है इसमें, कोई मिस्ट्री नहीं है। हम सब जानते हैं कि हमारी खोपड़ी भरती नहीं है। मनुष्य का मन कुछ ऐसा बना है कि भरता नहीं है। मनुष्य को मन के भरने की जो दौड़ है, वही संसार है। इस सत्य को जान लेना कि मनुष्य का मन भरता नहीं, धर्म की शुरुआत है, धर्म का प्रारंभ है।

ओशो को आंतरिक परिवर्तन यानि इनर ट्रांसफॉर्मेशन के विज्ञान में उनके योगदान के लिए काफी माना जाता है। इनके अनुसार ध्यान के जरिए मौजूदा जीवन को स्वीकार किया जा सकता है।

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