क्या लोमड़ी दिव्य होती है?

प्राचीन चीन में, यह मान्यता थी कि जैसे सामान्य लाल लोमड़ी वयस्क होती जाती थी, वैसे वह अलौकिक शक्तियां अर्जित करते जाती थीं। उसका रंग बदल जाता था और उसकी एक पूंछ कई पूंछों में बदल जाती थी।

लोमड़ियां विश्वभर पाईं जाती हैं और इसलिए सभी संस्कृतियों में उनका उल्लेख है। हालाँकि साधारण मान्यतता यह है कि वे धूर्त होती हैं, उन्हें रचनात्मकता, उत्साह और बुद्धि के साथ भी जोड़ा गया है। भारतीय आख्यान शास्त्र में लोमड़ियों का इतना उल्लेख नहीं है। लेकिन पूर्वी एशियाई आख्यान शास्त्र में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। आइए, आज इसपर बात करते हैं।

प्राचीन चीन में, यह मान्यता थी कि जैसे सामान्य लाल लोमड़ी वयस्क होती जाती थी, वैसे वह अलौकिक शक्तियां अर्जित करते जाती थीं। उसका रंग बदल जाता था और उसकी एक पूंछ कई पूंछों में बदल जाती थी। इस प्रकार, समय के साथ वयस्क लाल लोमड़ी शुभ्र बन जाती थी और उसकी नौ तक पूंछें हो सकती थी। और अंततः, नौ पूंछों वाली शुभ्र लोमड़ी दिव्य बन जाती थी।

लेकिन जैसे सामान्य लाल लोमड़ी दिव्य, शुभ्र, नौ पूंछों वाली लोमड़ी में बदल जाती थी, वैसे वह एक रहस्यमय नर या मादा जीव बन जाती थी। इस हितैषी या द्वेषै जीव में रूप बदलने की क्षमता आ जाती थी। ऐसी लोमड़ियों के साथ कई लोककथाएं जुड़ गईं जिनमें वे नटखट, प्रलोभनकारी, धूर्त और यहां तक की हिंसक भी होती थी। यह कहानियां जापान और कोरिया तक फैलीं।

प्रारंभिक चीनी कहानियों के अनुसार नौ पूंछों वाली, शुभ्र लोमड़ी एक हितैषी जीव थी। उन कहानियों में इन लोमड़ियों को पश्चिम की देवी के साथ जोड़ा गया। लेकिन चीनी आख्यान शास्त्र में बाद की कहानियों में यह लोमड़ी आत्माएं एक रहस्यमय, द्वेषी शक्ति के साथ जुड़ गईं। जादुई नर लोमड़ी युवतियों को चुराईं हुईं भेंट वस्तुओं से प्रलोभित करती थी। इस प्रकार, उनके कारण यह युवतियां अनैतिक बनती जाती थी। जादुई मादा लोमड़ियों के कारण सम्राट अपनी सुध खोकर बिना सोचे समझे निर्णय लेने लगते थे। इससे उनके साम्राज्य में विद्रोह होकर उसका पतन होता था।

जापान में लोमड़ी आत्माएं बहुधा हितैषी बनी रहीं। उन्हें धान और सौभाग्य की देवी, इनारी, के आत्मा देवताओं के साथ जोड़ा गया। लोग उन्हें सुनसान जगहों में पाते थे। ऐसी कहानियां भी मिली हैं जहां उन्होंने लोगों को धोखा दिया – एक बार एक परिवार ने एक संगीतकार को रोका और उसे उनका मनोरंजन करने में विवश किया। बदले में उन्होंने उसे भोजन और मदिरा दी। लेकिन अगली सुबह संगीतकार को पता चला कि उसके साथ धोखा हुआ था। वह एक शमशान में था और उसे दिया गया सारा खाना वास्तव में कूड़ा था जिसे लोमड़ियों ने इकट्ठा किया था।

ऐसी कहानियां भी मिली हैं जहां स्त्री रूपी लोमड़ियां पुरुषों से प्रेम करके उनसे विवाह करती थीं। वे अपने पतियों की अच्छी सेवा करती थीं। लेकिन समय के साथ गांव के श्वान उन्हें पहचानकर उनपर भौंकने लगते थे। इसलिए वे अपना असली लोमड़ी रूप लेने को विवश होकर भाग जाती थीं। लेकिन चूँकि उन्होंने अपने पतियों की इतनी अच्छी सेवा की होती थी इसलिए उनके पति उनके लिए तरसते थे।

कुछ कहानियों के अनुसार लोमड़ियों की आत्माएं मोतियों में फंसी होती थीं। यह मोती उनके मुंह या उनकी पूंछों में स्थित होते थे। यदि किसी को यह मोती मिल जाता था तो मोती के बदले में लोमड़ी उसे कुछ भी देने के लिए तैयार हो जाती थी।

ऐसी कहानियां भी हैं, जिनमें लोमड़ी विभिन्न प्राणियों में बदल जाती थी। दरिद्र परिवार इन प्राणियों को बेचकर पैसे कमाते थे। फिर वह प्राणी लोमड़ी में बदलकर उन परिवारों के पास लौटते थे। यह बारम्बार होने से वे परिवार धनी बन जाते थे। ऐसे परिवार ‘लोमड़ी परिवार’ कहलाते थे। जापान के गांवों में लोग ऐसे परिवारों से डरते थे। यह मान्यता थी कि अचानक से धनी बने इन परिवारों का धन संभवतः छल से आया था।

कुछ लोमड़ियां अपना रूप बदलकर पेड़ भी बन सकती थीं। कुछ कहानियों में शिकारियों को वनों में ऐसी जगहों पर अचानक पेड़ मिलते थे, जहां उससे पहले पेड़ नहीं होते थे। तब वे शिकारी समझ जाते थे कि यह पेड़ वास्तव में लोमड़ियों की आत्माएं थीं। वे पेड़ों पर बाणों से वार करते थे। अगले दिन उन्हें पेड़ों की जगह बाणों से घायल लोमड़ियों के शरीर मिलते थे।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।

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