अर्जुन और संजय

भगवद्गीता के दो अंत

कृष्ण ने यह कहकर गीता का अंत किया, “अर्जुन, मैंने तुम्हें सबसे गूढ़ रहस्य बताए हैं। उनपर चिंतन करके अपने विवेकानुसार निर्णय लेना…”

अपने सामाजिक-आर्थिक दर्जे और परिस्थिति के अनुसार अलग लोग जीवन से अलग परिणाम चाहते हैं। भगवद्गीता के दो अलग अंत होने का क्या यह कारण हो सकता है – एक अंत अर्जुन के लिए, जो एक राजकुमार है, और दूसरा अंत धृतराष्ट्र के सारथी, संजय के लिए। संजय ने कृष्ण की गीता सुनी और अपनी टेलीपैथी की शक्तियों से उसे अपने अंधे राजा तक प्रसारित की।

कृष्ण ने यह कहकर गीता का अंत किया, “अर्जुन, मैंने तुम्हें सबसे गूढ़ रहस्य बताए हैं। उनपर चिंतन करके अपने विवेकानुसार निर्णय लेना। जान लो कि यदि तुम मुझपर पूरा विश्वास करके अन्य सभी मार्गों का त्याग करोगे, मैं तुम्हें मुक्त कर दूंगा। इस ज्ञान को निंदक, तिरस्कारपूर्ण या उदासीन लोगों के साथ मत बाँटो। जो लोग मेरे शब्दों का प्रसार करेंगे, उन्हें मैं पसंद करूंगा। जो मेरी बातों को बिना समझे भी सुनेंगे, उन्हें आनंद प्राप्त होगा। मुझे उम्मीद है कि तुमने मेरी बातों पर ध्यान दिया है। मुझे उम्मीद है कि इस ज्ञान ने तुम्हारे सारे भ्रम नष्ट कर दिए हैं।”

तब अर्जुन ने कृष्ण को आश्वस्त किया कि उसका भ्रम नष्ट हुआ था और परिप्रेक्ष्य की जगह ध्यान ने ले ली थी। अब उसे जो भी बताया गया, उसपर विश्वास करने के लिए तैयार था। फिर संजय ने व्यास से टेलीपैथी की दृष्टि प्राप्त करने के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त किया, जिस दृष्टि से उसे कृष्ण के बुद्धिमान शब्दों को सुनने और उनके शानदार रूप को देखने में मदद मिली। गीता की अंतिम कुछ पंक्तियों में, संजय ने कृष्ण के प्रवचन की अपनी व्यक्तिगत व्याख्या दी – “जब कृष्ण मन को वश में करते हैं और अर्जुन धनुष धारण करते हैं, तब भाग्य, सफलता, प्रभुत्व, स्थिरता और कानून हमेशा आते हैं। यह मेरी राय है।”

दोनों निष्कर्षों में अंतर स्पष्ट है। कृष्ण का निष्कर्ष मनोवैज्ञानिक है। उधर संजय का निष्कर्ष अधिक भौतिक है। कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि यदि वह किसी प्रशंसा की अपेक्षा किए बिना, दूसरों के लाभ के लिए, एक योद्धा के रूप में अपनी भूमिका निभाकर कृष्ण पर विश्वास करेगा तो वे उसे सांसारिक बंधनों से ​​मुक्ति, अर्थात मोक्ष, प्रदान करेंगे। संजय का मानना ​​​था कि कृष्ण के प्रवचन में उन्होंने पाँच वादे किए थे – भाग्य (श्री), सफलता (विजय), प्रभुत्व (भू), स्थिरता (ध्रुव) और कानून (नीति)।

अर्जुन अपनी ही समस्या में उलझा था, लेकिन कृष्ण के उपाय ने उसे दूसरों का विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। संजय वह दूसरा व्यक्ति है: हस्तिनापुर के लोगों का मूर्त रूप, जिन्हें पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध में अनदेखा किया गया। संजय के लिए, गीता स्पष्ट रूप से राजाओं के लिए प्रवचन है, क्योंकि वह उनसे शासन करने, अपनी प्रजा का उत्तरदायित्व लेने और भोगासक्ति में युद्ध लड़ने के बजाय शांति और समृद्धि लाने में कार्यरत रहने का आग्रह करती है। धृतराष्ट्र अपने आप को पीड़ित व्यक्ति समझते थे और परिणामस्वरुप दूसरों की दुर्दशा की उपेक्षा करते थे। इसलिए संजय ने उनसे आग्रह किया कि वे गीता को सुनें ताकि वे यह करना बंद कर दें।

संजय का निष्कर्ष गीता को वैष्णव पुराणशास्त्र से जोड़ता है। यह इसलिए कि श्री और भू व्यक्ति वाचक संज्ञाएँ होने के बजाय विष्णु, जिन्हें विजय नाम से भी जाना जाता है, की दो पत्नियों के नाम भी हैं। विष्णु को ब्रह्मांड का स्वामी माना जाता है, जो शाही पोशाक पहनते हैं और जिनके बग़ल में उनकी दो रानियाँ आसन्न होती हैं: श्री, जो प्रभुत्व, महिमा, प्रसिद्धि और आकर्षण-शक्ति जैसे अमूर्त भाग्यों का रूप हैं; और भू, जो पृथ्वी और उसके खज़ाने जैसे मूर्त भाग्यों का रूप हैं।

ध्रुव और नीति विष्णु भक्त हैं। ध्रुव एक बच्चा है जो विष्णु की गोद में बैठना चाहता है, क्योंकि वह एकमात्र जगह है जहाँ से कोई उसे नीचे नहीं खींच सकता। यहाँ उसे अपने दिव्य पिता का स्नेह सदा के लिए मिल सकता है। इस प्रकार वह ध्रुव तारे का प्रतीक है। नीति का अर्थ कानून है, जो केवल तब मूल्यवान है जब कोई विष्णु को स्वीकार करके धर्म का पालन करता है। धर्म की उपस्थिति में कानून से असहायों को मदद मिलकर सभी को न्याय मिलता है। धर्म की अनुपस्थिति में कानून नियंत्रण, उत्पीड़न और यहाँ तक कि नुक़सान पहुँचाने का एक उपकरण बनता है।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।

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