Shiva aur Vishnu ke liye Holi

शिव और विष्णु के लिए होली

होली शिव के विवाह की रात यानि ‘शिवरात्रि’ के एक पक्ष बाद मनाया जाता है। और यह उचित भी है। शिव ने काम-देव को नष्ट किया, जिस कारण वे कामांतक कहलाते हैं।

आज होलिका दहन है और कल होली मनाई जाएगी। आइए इस त्योहार के बारे में जानें। साधारण मान्यता यह है कि होली का त्योहार विष्णु से जुड़ा है, जो हिंदू आख्यान शास्त्र के अनुसार विश्व के संरक्षक हैं। कहते हैं कि असुर राजा हिरण्यकशिपु को अमरत्व का वरदान मिला था। इस वरदान की सहायता से उन्होंने संपूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त की। लेकिन उनका पुत्र प्रह्लाद जो विष्णु भक्त था, ने अपने पिता की आराधना करने से इनकार किया। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान मिला था कि अग्नि उन्हें जला नहीं सकती थी। इसलिए, उन्होंने हिरण्यकशिपु से कहा कि वे प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाकर चिता पर बैठकर उसे जला देगी।

तब विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर अपने भक्त को जलने से बचाया और स्वयं होलिका जल गई। इस प्रकार विष्णु ने उन्हें पराजित किया, जो उनकी आराधना में बाधा लाए थे। इसी को याद करते हुए होली का त्योहार मनाया जाता है।

वसंत के अंत और ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत में कृष्ण और राधा को झूले पर बैठकर फूलों के साथ होली खेलते हुए दिखाना भी प्रचलित है। पानी से न केवल ग्रीष्म ऋतु की गरमी, बल्कि प्रेम की गरमी भी कम होती है। समय के साथ यह त्योहार मुग़ल और राजपूत दरबारों में भी लोकप्रिय बन गया। संगीतकार संगीत वाद्य खेलते थे और पुरुष अपनी पत्नियों और गणिकाओं के साथ अंतःपुर में होली खेलते थे। वे फूलों से बनाया रंगीन, सुगंधित पानी एक दूसरे पर फेंककर और साथ में भांग पीकर इस त्योहार का आनंद लेते थे।

लेकिन क्या भांग शिव के साथ नहीं जुड़ा हुआ है? विष्णु-उपासकों के अनुसार भांग कृष्ण के बड़े भाई बलराम के साथ जोड़ा जाता है, जिन्हें यह मादक पदार्थ भाता था। वे उग्र स्वभाव के थे और भांग उन्हें शांत करता था। कई मायनों में बलराम शिव जैसे थे। वास्तव में, ओडिशा में जगन्नाथ के मंदिर में बलराम को शिव माना जाता है। स्थानीय कला में दोनों को श्वेत रंग में, जबकि कृष्ण को कृष्ण रंग में रंगाया जाता है। पीले रंग में रंगाईं राधा को देवी माना जाता है।

पहले, होली मदन अर्थात प्रेम के देवता काम-देव का त्योहार हुआ करती थी। यह त्योहार वसंत ऋतु की शुरुआत में, वसंत पंचमी के दिन शुरू होकर वसंत ऋतु के अंत यानि होली तक चलता था। महिलाएं बागों में इकठ्ठा होकर गीत गाती हुईं नृत्य करती और पेड़ों से लिपटती थीं। उनकी हंसी और स्पर्श से पेड़ों पर फूल खिलते थे और उनकी ओर मधुमक्खियां और तितलियां आकर्षित होती थीं। यह मान्यता थी कि यह इसलिए होता था कि वे सभी काम-देव की चहेती थीं।

इस त्योहार का कई संस्कृत नाटकों में भी उल्लेख है। महिलाएं पूर्णिमा की रात झूले (डोल) पर बैठती थीं। इसलिए, इस दिन को डोल पूर्णिमा कहा गया जो फिर होल पूर्णिमा और अंततः होली बन गया। कैरिबियाई हिंदू, जिन्होंने 19वीं सदी में भारत के बाहर प्रवसन किया, भी यह त्योहार फगवाह के नाम से मनाते हैं, क्योंकि वह फाल्गुन के महीने में आता है।

बौद्ध धर्मियों को काम-देव अच्छे नहीं लगते थे। वे मानते थे कि काम-देव वासना के दानव ‘मार’ थे, जिन्हें पराजित कर सिद्धार्थ गौतम बौद्ध में परिवर्तित हुए थे। लेकिन होली का त्योहार अत्यंत लोकप्रिय था जिस कारण उसका विरोध करना कठिन था। आज भी कई बौद्ध सक्रियतावादी मानते हैं कि यह त्योहार जातिवादी है। थाईलैंड के बौद्ध धर्मीय होली जैसा सोंगक्रान नामक त्योहार मनाते हैं। ऐसा ही त्योहार म्यानमार में भी मनाया जाता है। दोनों त्योहार अप्रैल में गरमी के मौसम में मनाए जाते हैं और उनमें केवल पानी से न कि रंगों से खेला जाता है।

होली शिव के विवाह की रात यानी ‘शिवरात्रि’ के एक पक्ष बाद मनाया जाता है। और यह उचित भी है। शिव ने काम-देव को नष्ट किया, जिस कारण वे कामांतक कहलाते हैं। इस कारण विश्व को शीत ऋतु के कष्ट भुगतने पड़े। पौधे मुरझाकर मर गए। फिर शिव ने पार्वती से विवाह किया और कामेश्वर बन गए। इसलिए एक पक्ष के बाद प्रेम होली के रूप में संसार में लौट आता है। होली की पहली रात वह नष्ट होता है और दूसरे दिन पुनर्जीवित होता है।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।

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