भीतर के ‘शिव’ को करें जागृत

हमें यह याद रखना चाहिए कि जब तक हम अपने भीतर के शिव को जागृत नहीं करते, तब तक हमें भांग का सेवन नहीं करना है।

शैव परंपरा में शिवजी को भांग चढ़ाई जाती है। शिवरात्रि में भांग पीने की भी धार्मिक परंपरा है। वैसे भांग का सेवन तो होली पर भी किया जाता है, लेकिन शिवरात्रि पर इसका अलग महत्व है। गांजा, चरस और भांग तीनों ही मादक पदार्थ हैं, लेकिन इनका उल्लेख हमारे वेदों और आयुर्वेदिक शास्त्रों में भी हुआ है। हज़ारों वर्षों से भारत में साधु और वैरागी इनका उपयोग करते आए हैं। भक्त गण भी पूजा के समय इनका सेवन करते हैं। औषधि के रूप में भी इनका उपयोग होता है।

कई लोगों को यह देखकर आश्चर्य होता है कि भांग जैसे मादक पदार्थ हम देवी-देवताओं को अर्पित करते हैं। लेकिन हमारे यहां तो हज़ारों वर्षों से देवी-देवताओं को भांग जैसे मादक पदार्थ, धतूरे जैसे विषाक्त पदार्थ और शराब तक चढ़ाई जाती रही है। कई तांत्रिक रिवाज़ों में भी शराब का उपयोग होता है। मादक पदार्थों का सेवन योग और तंत्र के साथ जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि जब शिवजी ने अमृत मंथन के समय हलाहल विष पिया था, तब उनके शरीर को ठंडक पहुंचाने के लिए उन्हें भांग दी गई। तभी से भांग शिवजी के लिए एक भेंट बन गई।

कई शिव भक्त मानते हैं कि जब तक वे भांग का सेवन नहीं करते, शिवजी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त नहीं कर पाते हैं। लेकिन कुछ और लोगों का मानना है कि केवल शिवजी ही मादक पदार्थ का सेवन कर सकते हैं। हम जब तक अपने भीतर के शिव को जागृत नहीं करते, तब तक हमें मादक पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसे लोग कहते हैं कि शिव तो केवल एक बहाना हैं मादक पदार्थ का सेवन करने का। इसलिए संत अक्सर भांग से दूर ही रहते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिव को वैरागी से गृहस्थ बनाने के लिए देवी शक्ति ने तपस्या की थी और विवाह में उन्हें दूल्हा बनकर आने को कहा था। चूंकि शिवजी वैरागी थे, उन्हें दूल्हा कैसे बनना है, इस बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। इसलिए वे घोड़ी के बजाय बैल पर बैठकर आ गए। हार पहनने के बजाय उन्होंने नाग को अपने गले में लपेट लिया। शरीर पर चंदन लगाने के बजाय उन्होंने भस्म लगाई। अपनी बरात में बरातियों के रूप में वे भूत-पिशाच, राक्षस और गण साथ ले आए। अमृत के सेवन के बजाय वे विष पीते विवाह के मंडप में पहुंच गए। यह सब कुछ महाशिवरात्रि की रात को हुआ। इसी दिन शिवजी, देवी की आराधना सुनकर, वैरागी रूप त्यागकर, कैलाश पर्वत छोड़कर काशी आ गए और वहां सांसारिक जीवन में भागीदार हो गए।

वैराग्य का अनुभव करने के लिए भांग का सेवन एक प्रकार का रिवाज़ है, क्योंकि ऐसे सेवन से हम अपनी इंद्रियों से परे हो जाते हैं। सांसारिक जीवन के बंधनों और तनाव से मुक्ति प्राप्त करने के लिए इसे एक साधन माना जाता है। इसलिए दुनिया भर में सभी जनजातियां किसी न किसी प्रकार के मादक पदार्थ का सेवन करती हैं। हालांकि इनका नियमित सेवन निषेध है। केवल उत्सवों के दौरान ही मादक पदार्थ देवताओं को अर्पित किए जाते हैं और उसी समय उनके भक्त भी उनका सेवन करते हैं।

कई धर्मों में मादक पदार्थ लेने की मनाही है। इस्लाम में इसे हराम माना जाता है, सिख धर्म भी इसकी अनुमति नहीं देता। जब ब्रिटिश और पुर्तगाली भारत पर राज कर रहे थे, तब उन्होंने गांजा और चरस का सेवन बंद करने की बहुत चेष्टा की। हमने भी विगत कुछ सालों से गांजा और चरस के सेवन को प्रतिबंधित कर रखा है। कई फ़िल्मों में दिखाया जाता है कि पाश्चात्य परंपरा से प्रभावित नायक और नायिका गांजा का सेवन कर रहे हैं। लेकिन इसका शिवभक्ति के साथ कोई संबंध नहीं है। शिवभक्ति के साथ केवल भांग का संबंध है। लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि जब तक हम अपने भीतर के शिव को जागृत नहीं करते, तब तक हमें भांग का सेवन नहीं करना है। यदि हम उसका सेवन कर रहे हैं, तब भी यह याद रहें कि हम वैरागी नहीं बल्कि सांसारिक हैं और हमें इस दुनिया में अपने तमाम दायित्वों का निर्वाह करना है।

सेवन पर प्रतिबंध

चरस और गांजा मारीहुआना पौधे के बाय प्रोडक्ट हैं जो मुख्यत: दक्षिण अमेरिका में उगता है। इन पदार्थों की बिक्री से आतंकवाद को बढ़ावा मिल रहा था। इसलिए लगभग 20 साल पहले दुनिया भर में इस पर प्रतिबंध लगाने की मुहिम शुरू हुई। इस मुहिम के तहत भारत ने भी गांजा और चरस के सेवन को कानूनी अपराध ठहराया। चूंकि भांग का सेवन उत्सवों में होता है, इसलिए सरकार ने भांग को प्रतिबंधित नहीं करते हुए यह प्रावधान किया कि इसकी बिक्री सरकार द्वारा अधिकृत दुकानों पर ही होगी।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।

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