वे भोलेनाथ हैं, बालक की तरह मासूम, वे नटराज हैं, एक दिव्य नर्तक, वो तो महादेव हैं, देवों के देव, वे लोकनाथ हैं, जगत के अधिपति। यह समझना बहुत आसान है कि कई लोग भगवान शिव पर क्यों मोहित हैं। जहां तक हिंदू देवताओं की बात है तो शिव ‘ईश्वर’ की आदर्श परिभाषा में नहीं बैठते हैं। वह न केवल देवताओं के लीडर और एक आकर्षक नर्तक हैं बल्कि अपने स्वभाव में मानव भी हैं। एक मिनट में नरम, लेकिन गुस्सा दिलाए जाने पर अगले ही पल निर्दयी! अमीश त्रिपाठी (Amish Tripathi) के ‘शिवा ट्राइलॉजी (Shiva Trilogy)’ उपन्यासों में शिव को देवता बताने की बजाय वीर व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। ऐसे में अब शिव, मानव से और नज़दीक से जोड़कर देखे जा सकते हैं।

वह शायद सभी हिंदू देवताओं (Hindu gods) में सबसे अधिक पूजनीय हैं, साउथ ईस्ट एशिया (South East Asia) में मौजूद असंख्य शिवालय इस बात के गवाह हैं। हालांकि इन सभी मंदिरों में शिव निवास करते हैं, लेकिन कहा जाता है कि सबसे प्राचीन मंदिरों (Ancient temple) में उनकी उपस्थिति दृढ़ता से महसूस की जा सकती है। कुछ लोगों का मानना है कि उन मंदिरों की वास्तुकला (Architecture) ही वह असली वजह है, जो इस तरह के आध्यात्मिक अनुभव को बढ़ा देता है। जबकि कुछ अन्य इस बात पर ज़ोर देते हैं कि यहां शिव आरंभ से ही मौजूद पावरफुल एनर्जी हैं, जो भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करते है। कारण चाहे जो भी हो कुछ प्राचीन शिव मंदिरों को उनके जन्म से जुड़ी हुई विशेष प्रचलित लोक कथाओं को देखते हुए शुभ माना गया है। इन मंदिरों को कुछ राजवंशों के शासन को चिह्नित करके इतिहास (History) में दर्ज करने के लिए भी अद्वितीय माना जाता है। ‘सोलवेदा’ ने साउथ ईस्ट (दक्षिण पूर्व) एशिया में मौजूद प्रसिद्ध प्राचीन शिव मंदिरों के जन्म के पीछे के इतिहास और प्रचलित लोक कथाओं के बारे में जानने की कोशिश की है।

प्रम्बानन शिवालय, इंडोनेशिया (Prambanan Shivalaya, Indonesia)

आर्कियोलॉजिस्ट (Archaeologist) का मानना है कि इंडोनेशिया का प्रम्बानन मंदिर मूलत: शिव के पहाड़ी घर ‘मेरु’ की तरह डिजाइन किया गया था। इस शिवालय के आर्किटेक्चर (वास्तुकला) में नश्वर दुनिया (भुलरेक), परी की दुनिया (भुवलरेक) और देवताओं की दुनिया (स्वलरेक) को हिंदू ब्रह्मांड संबंधी सिद्धांत के साथ बनाया गया है। ऐसा कहा जाता है कि यहां के शिवाग्रह शिलालेख में उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह प्राचीन शिवालय 856 सीई (कॉमन एरा) में हिंदू संजय राजवंश की वापसी को चिह्नित करता है। इतिहासकारों का मानना है कि मेदांग कोर्ट (दरबार) के पैट्रोनेज (संरक्षण) में महायान बुद्धिज्म (बौद्ध धर्म) से शैवीते (शैव हिंदू धर्म) में स्थानांतरित होने का यह मंदिर प्रतीक है।

इस शिवालय में भगवान शिव अपनी कन्सॉर्ट (सहचारी/पत्नी) दुर्गा के साथ विराजमान हैं। परिसर में मौजूद दुर्गा की मूर्ति जावानीज दंतकथा की राजकुमारी रारा जोंगग्रांग से जुड़ी हुई है। कहानी के अनुसार अपने पिता की हत्या करने वाला बांडुंग बॉन्डोवोसो राजकुमारी रारा का लगातार पीछा करता था। उससे शादी करने को अनिच्छुक रारा ने बांडुंग को एक रात में एक हजार मंदिरों का निर्माण करने की चुनौती दी। बांडुंग ने चुनौती को स्वीकार कर राक्षसों को यह काम करने को कहा। उसके काम की तेज़ गति को देखकर रारा ने उसे विफल करने का प्रयास किया। उसने मंदिर के पूर्वी हिस्से में आग लगा दी और ग्रामीणों से वहां पर चावल पीसने के लिए कह दिया। यह सोचकर कि भोर हो रही है मुर्गे भी आवाज़ देने लगे। इस वजह से राक्षस उजाले के डर से भूमिगत हो गए। इस युक्ति से क्रोधित बांडुंग ने रारा को श्राप देकर पत्थर का बना दिया। मान्यता है कि इसी पत्थर की अब मां दुर्गा के रूप में पूजा की जाती है।

ऐसा कहा जाता है कि भारत में 12 ज्योतिर्लिंग मंदिर हैं, जो सामूहिक शिव के शरीर को दर्शाते हैं। इन मंदिरों को इसलिए शुभ माना जाता है क्योंकि मान्यता है शिव यहां के परिसर में ‘कॉलम ऑफ लाइट’ (प्रकाश पूंज) के रूप में प्रकट हुए थे।

पशुपतिनाथ मंदिर, काठमांडू, नेपाल (Pashupatinath Temple, Kathmandu, Nepal)

ऐसा कहा जाता है कि भारत में 12 ज्योतिर्लिंग मंदिर हैं, जो सामूहिक (collectively) शिव के शरीर को दर्शाते हैं। इन मंदिरों को इसलिए शुभ माना जाता है क्योंकि मान्यता है शिव यहां के परिसर में ‘कॉलम ऑफ लाइट’ (प्रकाश पुंज) के रूप में प्रकट हुए थे। काठमांडू (Kathmandu) में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर (Pashupatinath Temple) को शिव के सिर का प्रतीक जाना जाता है। नेपाल (Nepal) के सबसे पुराने ऐतिहासिक दस्तावेज गोपालराज वामसावली (वंशावली) के अनुसार लच्छिवी राजा सुपुष्पा देव ने इस प्राचीन शिवालय का निर्माण करवाया था।

एक दंतकथा के अनुसार भगवान शिव ने एक बार बागमती नदी (Bagmati River) के पूर्वी तट पर स्थित जंगल में हिरण का रूप धारण कर लिया था। बाद में देवताओं ने उन्हें उसी रूप में उनके सींग से पकड़ा और उन्हें अपने दिव्य रूप में आने के लिए मजबूर कर दिया। ऐसा करने से उसका एक सींग टूट गया, जिसे बाद में लिंग के रूप में पूजा जाने लगा। लेकिन समय के साथ यह धरती में दफन हो गया और अंतत: कहीं खो गया। कई सदियों के बाद एक चरवाहे ने अपनी एक गाय को एक निश्चित स्थान पर खड़े होकर धरती को अपने दूध से स्नान करवाते हुए पाया। उस स्थान को खोदने पर उसे जानवरों के स्वामी पशुपतिनाथ का लिंग वहां मिला था। इस प्रकार पशुपतिनाथ मंदिर की स्थापना हुई।

लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर(Lingaraj Temple, Bhubaneswar)

माना जाता है कि लिंगराज मंदिर का निर्माण सोमवंशी राजवंश (Somvanshi dynasty) के राजा ययाति प्रथम ने 11वीं शताब्दी ईस्वी में किया गया था। बाद में 12वीं शताब्दी ईस्वी में गंगा राजवंश (Ganga dynasty) ने इसमें कुछ बदलाव किया था। यहां शिव को हरिहर के रूप में पूजा जाता है जो विष्णु और शिव का संयुक्त रूप हैं। यह ध्यान में रखते हुए कि गंगा राजवंश में कई वैष्णव थे, इस शिवालय में विष्णु के चित्र भी हैं।

दिलचस्प बात यह है कि 13वीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथ एकमरा पुराण में उल्लेख है कि सतयुग ओर त्रेता युग के दौरान पीठासीन देवता को लिंगम नहीं माना जाता था। शिवालय में लिंग एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला कच्चा/अधूरा पत्थर है जो एक शक्ति (फेमिनाइन एनर्जी/स्त्री ऊर्जा) पर टिका होता है। इस तरह के लिंग को कृतिवास या स्वयंभू जाना जाता है। यह भारत में पाए जाने वाले 64 स्वयंभू में से एक है। ऐसा केवल द्वापर युग (तीसरा हिंदू युग) और कलियुग (चौथा हिंदू युग) के दौरान हुआ कि शिव को लिंग के रूप में पूजा जाने लगा।

एलोरा का कैलाश मंदिर (Kailash Temple, Ellora)

मानव जाति की जानकारी में एलोरा के कैलाश मंदिर (Kailash Temple) को सबसे बड़े रॉक-कट (पहाड़ों को काटकर बनाया गया) प्राचीन हिंदू मंदिरों (Ancient Hindu temples) में से एक माना जाता है। इसकी संरचना न केवल इसकी मेगालिथिक क्वॉलिटी (महापाषाण गुणवत्ता) के लिए प्रसिद्ध है बल्कि इसके विशाल आकार और शानदार मूर्तिकला की विशेषताएं भी उस समय के आर्किटेक्चर में अनकॉमन (अनूठी) मानी जाती हैं।

एक मध्ययुगीन मराठी कथा के अनुसार राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम (आर 756-773 सीई) ने अपनी रानी के अनुरोध पर इस प्राचीन शिवालय को बनवाया था। इस कहानी के अनुसार राजा एक गंभीर बीमारी से पीड़ित था। उसकी रानी ने पति को ठीक करने के लिए एलापुरा (अब एलोरा) के एक मंदिर में भगवान शिव से प्रार्थना की कि उसके पति को ठीक कर दें। रानी ने शपथ ली कि यदि इच्छा पूरी हो गई तो वह भगवान के लिए एक शिवालय बनवाएगी। उसने कसम भी खाई थी कि जब तक वह मंदिर के शिखर (शीर्ष) को नहीं देख लेगी तब तक उपवास करेगी।

जब राजा ठीक हो गया तो उसने राजा से उसके वादे को पूरा करने के लिए कहा। कई आर्किटेक्ट्स (वास्तुकारों) ने जोर देकर कहा कि शिवालय बनने में महीनों लगेंगे और रानी के लिए अपनी मन्नत पूरी करना काफी मुश्किल होगा। लेकिन कोकासा नामक आर्किटेक्ट (वास्तुकार) ने उन्हें आश्वस्त किया कि रानी एक सप्ताह में ही मंदिर के शिखर को देख सकती हैं। चतुर वास्तुकार ने एक बड़े पत्थर का खंभा चुना और मंदिर के शीर्ष को तराशना शुरू कर दिया। उसने वास्तव में एक सप्ताह के भीतर ही शिखर का निर्माण कर दिया। इस प्रकार रानी की मन्नत पूरी हो गई। वह अपना उपवास तोड़ सकती थी।