जिया की ज़िंदादिली

जिया की ज़िंदादिली

परिवार में सबसे अलग स्वभाव की जिया ने एक दिन ऐसी ज़िंदादिली दिखाई कि दादा जी की आंखें खोल दी। उस दिन से दादा जी ने भेदभाव से तौबा कर ली।

जिया, एक संयुक्त परिवार में रहती थी। परिवार के नियम घर के सभी बच्चों पर बराबर लागू होते थे, लेकिन जिया ने उन नियमों को तोड़ने की ज़िम्मेदारी ले रखी थी। बिंदास, अल्हड़, बातूनी, हाजीर जवाब, मस्तमौला और ज़िंदादिल, ये सभी शब्द जिया का चरित्र-चित्रण करने के लिए काफी थे। परिवार में दादा-दादी, ताऊ-ताई, मम्मी-पापा, ताई के दो बच्चे, जिया और उसका छोटा भाई थे। जिया को अपने जीवन में हर वो काम करना था, जो उसके बड़े भईया करते थे। उसे दोस्तों के साथ घूमना था, उसे बाइक चलानी थी, उसे अपना बिजनेस शुरू करना था। लेकिन दादा जी की नज़र में वो एक लड़की थी।

दादा जी का मानना था कि लड़कियां घर का काम करने के लिए होती हैं और लड़के बाहर का काम करने के लिए। इसी तरह से शाम के 5 बजते-बजते बेटियों के कदम घर के अंदर होने चाहिए और बेटों के 7 बजे तक। जिया और उसकी ताई की बेटी पलक, दोनों साथ में कॉलेज जाते थे। पलक रोज़ सुबह उठ कर किचन में अपने मम्मी और चाची का हाथ बंटाती थी। लेकिन जिया 7 बजे से पहले सो कर उठती ही नहीं थी। जिसके लिए उसे अपना दादी और मां से चार ताने रोज़ सुनने होते थे। उसकी तुलना हमेशा ही पलक से की जाती थी। पलक को पेंटिंग, सिलाई-कढ़ाई, सब कुछ आता था। वहीं, जिया इन सब से परे अपना बिजनेस शुरू करने का सपना देखा करती थी

कॉलेज से घर आते वक्त कभी-कभी अपने राहुल भईया से बाइक सीखने की ज़िद भी कर देती थी। राहुल ने जिया को धमकाते हुए कहा, “देख जिया, मैं दादा जी को बोल दूंगा कि तू बाइक चलाने की ज़िद कर रही थी।” जिया हंसते हुए कहती है कि, “ठीक है, फिर मैं भी बता दूंगी कि आप पान वाली दुकान से सिगरेट खरीद रहे थे।” राहुल खुद को फंसता हुआ पाता, तो जिया को बाइक चलाने के लिए दे देता था। लेकिन बाइक चलाने की भी अपनी ही सीमा थी। जिया अपने मुहल्ले के दो गली पहले ही बाइक राहुल को दे देती थी।

एक रोज़ दोपहर में घर पर कोई नहीं था, सिर्फ दादा-दादी, जिया और मां थे। अचानक से दादा जी के चीखने की आवाज़ आने लगी, “जिया! देख ये तेरी दादी को क्या हो रहा है?” जिया अपने कमरे से भागते हुए आई, तो देखा की दादी के सीने में तेज दर्द हो रहा था। उसने तुरंत राहुल की बाइक निकाली। दुपट्टे की मदद से दादी को खुद से बांध कर बैठ गई और दादा जी को पीछे बैठने बोला। मां को घर के सभी सदस्यों को अस्पताल पहुंचने की जानकारी देने को कह कर तेजी से निकल गई। पतली गलियों और उसकी भीड़ को चीरते हुए एक अनुभवी व्यक्ति की तरह बाइक चला कर वह अस्पताल पहुंची।

अस्पताल में दादी को तुरंत भर्ती कराया गया। थोड़े देर में ही घर के सभी सदस्य अस्पताल पहुंच गए और दादा जी के पास बैठ गए। तभी डॉक्टर बाहर आए, “माता जी अब खतरे से बाहर हैं, उन्हें हल्का हार्ट अटैक आया था। अगर आप लोग उन्हें वक्त पर नहीं लाते, तो खतरा हो सकता था।” इतना सुनते ही दादा जी जिया की तरफ मुड़ें और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “सच में तुम ज़िंदादिल लड़की हो। तुमने लड़का-लड़की के भेदभाव को लेकर मेरी आंखें खोल दी। तुम्हें जो करना है, करो। मेरी तरफ से कोई पाबंदी नहीं है।” दादा जी की ये बात सुन कर जिया भावुक हो गई और उनके गले लग गई। उस दिन के बाद से पूरे परिवार में बेटियों को भी बेटों के बराबर का दर्जा मिलने लगा।

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