वादा करना, वादा

वादा रहा, जल्द मिलेंगे

जैसे-जैसे उसके जाने का दिन नज़दीक आ रहा था, उसके मन में दर्द और गर्व दोनों ही तरह की भावनांए घर कर रही थी। उसने वादा किया कि वह जल्द से जल्द वापस आ जाएगा और दोनों वह काम करेंगे जो उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था- रात को आकाश में तारों को देखना।

सुबह का समय था। चमकीली धूप निकली हुई थी। वह गलियारे के पास खड़ी हुई खिलौना बंदूक से खेलते अपने छोटे से बेटे को निहार रही थी। उसने देखा कि बच्चे की बड़ी-बड़ी नीली आंखे सूर्य की रोशनी में चमचमा रही थी। इन आंखों से बह रही थी प्रेम की वह गर्मी, जिसकी उसे अपने मन के अंधेरे गलियारों को रोशन करने के लिए ज़रूरत थी। आखिरकार उसका बेटा ही उसका एकमात्र सहारा था जिस पर उसकी आशाएं टिकी थी। अन्यथा तो उसका जीवन उजाड़ और वीरान था।

वह किसी मुर्दे की तरह निर्जीव खड़ी-खड़ी अपने बच्चे को देख रही थी। बच्चे ने हरे रंग का आर्मी वाला जंप सूट पहना हुआ था। मानो वह अपने बहादुर पिता की प्रतिमूर्ति हो। खिलौना बंदूक से फायर करती हुई बच्चे की नन्हीं–नन्हीं अंगुलियां उसे अपने पति की याद दिला रही थी। उस पति की जिसने उसे इतने साल तक पूरे मन से प्यार किया था। वह पति जो उसे सैन्य अधिकारी वाले मनोहारी ढंग से प्रेम किया करता था और जब तक वह उससे ‘हां’ नहीं कहलवा लेता था तब तक वह हार नहीं मानता था। वे दोनों पति-पत्नी सैन्य प्रशिक्षण अकादमी में सहपाठी रहे थे, दोनों मित्र थे, प्रेमी थे, जन्म-जन्मांतर के साथी थे। उसने अपनी बाकी ज़िंदगी उसके साथ निभाने का वादा और प्रतिज्ञा की थी और अंतिम सांस तक मातृभूमि की सेवा करने का प्रण लिया था।

संसार में सबसे ज्यादा ऊंचाई पर स्थित युद्ध क्षेत्र सियाचिन में जाने से पहले तक ज़िंदगी अपने आप में पूर्ण थी। अपने उत्साही और जोशीले पति से उसे युद्ध में सियाचिन भेजे जाने की खबर सुनकर उसकी रीढ़ में कंपकंपी दौड़ गई थी।

ज्यों-ज्यों पति के बिछड़ने का दिन निकट आता जा रहा था, वह दर्द और गर्व दोनों की भावनाओं से भरती जा रही थी। पति ने जल्दी से जल्दी वापस आने का वादा किया था और न लौटने तक अपना वह सबसे ज्यादा प्रिय काम करते रहने को कहा था। यह काम था रात में तारों को देखते रहना। आंसुओं को आंखों के अंदर ही रोककर उसने पति को विदा किया था। उसे इस बात का कोई अनुमान भी न था कि यह उसके पति की अंतिम विदाई है।

उसका सीना गर्व और सम्मान से भरा हुआ था क्योंकि वह पति के अंदर युद्ध में जाने वाले रण बांकुरे को देख रही थी। इसके 6 महीने के बाद जब वह दूरदर्शन पर गणतंत्र दिवस की परेड देख रही थी तभी उसका फोन लगातार बजने लगा। कानों में चुभने वाली फोन की वह घंटी तब तक नहीं थमी जब तक की उसने फोन उठा नहीं लिया।

फोन पर मिली खबर सुनकर वह मानो जम-सी गई। उसे ऐसा लगा कि जैसे उसके नीचे की जमीन उसे जीवित ही निगल गई हो। उसे ऐसा महसूस हुआ मानो ज़िंदगी कभी वापस न आने के लिए हमेशा-हमेशा के लिए चली गई हो। आंसुओं से उसका कंठ अवरुद्ध हो चुका था। पति द्वारा किए गए वादा को याद कर वह निर्जीव सी सोफे पर गिर पड़ी।

सोफे के पास ही दीवार पर फोटो फ्रेम में लिखी हुई वे पंक्तियां लटक रही थी जो उसके पति को बहुत पसंद थी :

मधुर है ये उपवन ये प्यारे सलोने

ये मन चाहता है कि बस जाऊं इनमें।

निभाने हैं लेकिन किए थे जो वादे

है मीलों की यात्रा अंधेरे से पहले।

मुझे मीलों जाना है अंधेरों से पहले।

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