खूबसूरत दोस्ती की शुरुआत

खूबसूरत दोस्ती

लड़की और उसकी मां की छोटी-छोटी आंखें और दबी हुई सी नाक थी। वो लड़की हमें डरी हुई नजरों से देख रही थी। चलिए जानते हैं कैसे हुई एक खूबसूरत दोस्ती की शुरुआत।

मैं जब छोटा था, तब हम फ्लैट में रहते थे। हमारे सामने वाला फ्लैट खाली था। खाली होने की वजह से वो हमेशा ही खुला रहता था। मैं और मेरे दोस्त उसी में घुसकर क्रिकेट खेलते रहते थे।

एक दिन उस फ्लैट में अचानक ही फर्नीचर का काम चालू हो गया। सुनने में आया कि उस फ्लैट में अब कोई रहने आने वाला है। इससे हम लोग बहुत उदास हो गये। पर फिर भी हमने फ्लैट में खेलना नहीं छोड़ा। फर्नीचर वाले अंकल हमें डांट कर भगाते कि उनके सामान से हमें चोट लग सकती है, पर हम उनकी सारी बातें अनसुनी करके खेल में लगे रहते।

एक दिन हम फ्लैट में खेल रहे थे और फर्नीचर का काम भी चल रहा था। तभी वहां एक औरत और उनके साथ हमारे बराबर की ही एक लड़की आई। लड़की और उसकी मां की छोटी-छोटी आंखें और दबी हुई सी नाक थी। वो लड़की हमें डरी हुई नज़रों से देख रही थी। हमने उन्हें देखकर खेलना बंद कर दिया था।

“शायद ये लोग ही यहां रहेंगे।” मेरे दोस्त ने धीरे से मेरे कान में कहा। उसकी बात सुनकर मुझे बड़ी खुशी हुई कि अब हमारी गैंग में एक और सदस्य जुड़ जाएगा। उस लड़की की नज़रें मुझसे टकराई और मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई।

मुझे अपनी तरफ मुस्कुराता देखकर उस लड़की ने मुझसे मुंह फेर लिया। मुझे बड़ा अजीब सा लगा और मैं फ्लैट से बाहर निकल आया।

कुछ दिनों बाद, अचानक ही वो लोग फ्लैट में रहने लगे।

मैंने मम्मी से सुना वो लोग हिमाचल से आए हैं। उसके घर में सिर्फ वो दो ही लोग थे। उस लड़की के मम्मी-पापा का तलाक हो चुका था।

वो लड़की कभी अपने घर से बाहर नहीं निकलती थी। कभी कहीं गलती से बालकनी में खड़ी दिख भी जाती, तब भी हमें देखकर अंदर चली जाती थी।

दिवाली की एक शाम हमारे घर पूजा हुई और मम्मी ने मुझे प्रसाद लेकर सामने वाले फ्लैट में भेज दिया। दरवाज़ा उस लड़की ने ही खोला।

“मम्मी ने प्रसाद दिया है और कहा है कि आप लोग हमारे साथ दिवाली मनाएं।” मैंने उसकी मां को प्रसाद पकड़ाते हुए कहा।

“बेटा…हम दिवाली नहीं मनाते… बैठो मैं अभी आती हूं” उसकी मां ने मुझे बैठने का इशारा करते हुए कहा और किचन से मेरे लिए कुछ खाने के लिए लेने चली गईं।

“तुम्हें पटाखे जलाना अच्छा नहीं लगता?” मैंने लड़की से पूछा।

“हां” वो बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोली। “तुम चलो बाहर हम साथ में पटाखे जलाएंगे” मैंने कहा।

“नहीं मम्मी बाहर जाने से मना करती हैं।” उसने बताया।

“अच्छा। हमसे बात करने के लिए भी?” मैंने चौंक कर पूछ लिया।

“नहीं।…उन्हें डर लगता है, लोग हमारा मज़ाक बनाते हैं।” उसने धीरे से कहा।

“क्यों?” मैंने पूछा।

“क्योंकि हमारी छोटी आंखें हैं ना… हम यहां पहले रहते थे, वहां सब बच्चे मुझे चाइनीज.. चाइनीज…बोलकर चिढ़ाते थे। एक दिन मुझे गुस्सा आ गया। मैंने एक लड़के को घूंसा मार दिया। फिर उसकी मम्मी ने मेरी मम्मी से बहुत झगड़ा किया। मेरे पापा-मम्मी के बारे में गंदी-गंदी बातें की। फिर हमने वो घर छोड़ दिया। इसलिए ही मम्मी यहां किसी से बात करने के लिए मना करती हैं।” वो बता ही रही थी कि उसकी मम्मी आ गई।

“आंटी आप नहीं आ रही तो मैं इसे ले जाऊं? हम साथ में पटाखे जलाएंगे, प्लीज़ आंटी।” मैंने कहा तो कुछ देर बाद उसकी मम्मी मान गईं।

मैंने उसका हाथ पकड़ा और कहा, “डरो मत यहां कोई तुम्हारा मज़ाक नहीं बनाएगा।” फिर हम दोनों हमेशा के लिए अच्छे दोस्त बन गए।

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