हौसले से उड़ान

“बेटा होता, तो भाईसाहब का गैरेज संभाल लेता। लेकिन दुख का बात है कि आपके पास तो दो बेटियां ही हैं।” सुधा का दुख हल्का करने के बजाए उसे अपनी बातों से बढ़ाया जा रहा था।

फैजाबाद के छोटे से कस्बे में रमाशंकर अपने परिवार के साथ रहते थे। परिवार में पत्नी और दो बेटियां थीं। बड़ी बेटी का नाम आव्या और छोटी का काव्या था। बाजार में रमाशंकर का एक छोटा सा गैरेज था। जिसका नाम उन्होंने अपनी बड़ी बेटी के नाम पर रखा था ‘आव्या गैरेज’। रमाशंकर ने अपनी बड़ी बेटी का नाम बहुत सोच के रखा था। आव्या का अर्थ ‘ईश्वरीय उपहार’ होता है। आव्या ग्रेजुएशन के अंतिम वर्ष में थी। छोटी बेटी काव्या अभी हाईस्कूल में थी। आव्या जिम्मेदार थी और काव्या बेफिक्र।

रमाशंकर और सुधा अपने बच्चों के साथ सामान्य जिंदगी जी रहे थे। एक दिन रमाशंकर दुकान का नया बोर्ड लेकर आते हैं, जिस पर लिखा होता है आव्या गैरेज, देखते ही काव्या कहती है कि “पापा दीदी से बहुत प्यार करते हैं।” सुधा ने हंसते हुए कहा, “काव्या! तुम पढ़ लिख कर अपनी नई दुकान खोलना, तब अपने नाम का बोर्ड लगाना।” काव्या तुनक कर बोली, “कौन सी दीदी की है!” सब ठहाके मार कर हंसने लगे।

एक दिन रमाशंकर गैरेज में काम करते हुए बेहोश होकर गिर गए। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टर ने बताया कि रमाशंकर को ब्रेन हेमरेज हुआ है। एक हफ्ते तक इलाज चला, लेकिन डॉक्टर उसे बचा न सके। रमाशंकर का जाना पूरे परिवार के लिए एक अपूर्णीय क्षति थी। सुधा, आव्या और काव्या का रो-रोकर बुरा हाल था। इसी दौरान रमाशंकर के बगल की दुकान वाले श्यामलाल घर पर आतो हैं। श्यामलाल परिवार के सभी सदस्यों को दिलासा देते हुए कहते हैं, “भाभी! अब जो होना था हो गया। आगे की सोचिए कि अब क्या करना है? घरबार कैसे चलेगा? आपके पास बेटा होता, तो कम से कम भाई साहब का गैरेज संभाल लेता। आप जिस भी कीमत पर गैरेज को बेचेंगी, मैं ले लूंगा। वैसे भी दो बेटियां हैं, आपके पास। पढ़ाई-लिखाई, शादी-ब्याह, सब देखना है।” सुधा ने हां में सिर हिला कर सहमति जता दी।

मां की हामी आव्या को पसंद नहीं आई। एक दिन आव्या के टीचर उससे मिलते हैं। आव्या ने उन्हें सारी बातें बताईं। आव्या के टीचर ने उसे समझाते हुए कहा, “बेटी हो तो क्या हुआ! गैरेज को क्या पता कि उसका मालिक कौन है? बेटी या बेटा। एक सरकारी स्कीम के तहत ग्रेजुएशन कर रहे विद्यार्थियों को कई तरह के काम सिखाए जा रहे हैं, जिसमें गैरेज का काम भी शामिल है। मैं आज ही तुम्हारा फॉर्म भर देता हूं। 6 महीने का कोर्स करके तुम खुद अपने पापा का गैरेज संभालने लगोगी।” ये सब बातें सुनकर आव्या आत्मविश्वास से भर गई।

आव्या घर जाकर मां से बोली, “मां! तुम श्यामलाल चाचा को मना कर दो कि तुम गैरेज नहीं बेचोगी।” सुधा ने सवालिया नजरों से उसकी तरफ देखा। काव्या ने अपने टीचर की बात मां से बताई और साथ ही अपना फैसला भी सुना दिया कि पापा का गैरेज मैं संभालूंगी। पहले तो मां हिचकिचाई, फिर बेटी का आत्मविश्वास देखकर बोली, “बेटा, आज तेरे पापा होते तो उन्हें तुझ पर गर्व होता।”

अगले दिन जब सुधा श्यामलाल को मना करती है, तो वह गुस्से में कहता है कि “जब भूखे मरोगे, तब समझ में आएगा।” देखते ही देखते 6 महीने बीत गए। आव्या ने गैरेज का कोर्स पूरा कर लिया। वह गैरेज को फिर से खोलती है। घर में पड़ा दुकान का नया बोर्ड लेकर काव्या गैरेज पर आई और बोली, “दीदी, अब इसे लगाने का समय आ गया है।” मां की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े, वह बोली, “ये है, मेरे आव्या का गैरेज।”