मातृत्व: मां के बराबर कोई नहीं…

मदर्स डे के इस खास मौके पर सोलवेदा आपको अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाली उन महिलाओं से रू-ब-रू करा रहा है, जिनके लिए मातृत्व या यूं कहें ममता खास मायने रखती है। इस लेख के माध्यम से जानेंगे कि मातृत्व जैसे सुनहरे पल के दौरान उन महिलाओं ने अपनी ज़िंदगी में आने वाली चुनौतियों और अपने बच्चों के साथ बॉन्डिंग को कैसे मैनेज किया।

एक मां बनने की सुखद अनुभूति को आप तब तक महसूस नहीं कर सकती हैं, जब तक कि आप खुद एक मां नहीं बन जाती। इसके लिए आप पूरा प्रयास कर सकती हैं। लेकिन, वास्तव में आप खुद को इसके लिए तैयार नहीं कर पाती हैं। इसके लिए नौ महीने के कठिन दौर से गुज़रना पड़ता है। मगर अपने मासूम से नवजात को अपनी गोद में रखने का सुखद पल आता है, तो आपकी नौ महीने की उम्मीद, इंतजार व उत्सुकता एक खुशी में तब्दील हो जाती है। आप महसूस करेंगी कि अपने नन्हें-मुन्ने बच्चे के आगे आपके लिए कोई चीज़ मायने नहीं रखेगी। चाहे आपके जीवन में कोई बड़ा से बड़ा ही उद्देश्य ही क्यों ना हो। सब फीके पड़ जाते हैं। बावजूद इसके मातृत्व (Motherhood) को परिभाषित करने वाली सारी सुंदरता के पीछे काफी चुनौतियां भी रहती हैं, जिसे हम और आप कभी छिपा नहीं सकते हैं।

अपने नन्हें-मुन्ने बच्चे के प्रति अधिक से अधिक प्यार जताने और जिम्मेवारी को समझने में स्वाभाविक तौर पर आपको थोड़ा वक्त लग सकता है। लेकिन, बदलते वक्त के साथ आप महसूस करेंगी कि धीरे-धीरे आप एक नई ज़िम्मेवारी के लिए खुद को तैयार कर लेंगी। सबसे बड़ी बात यह है कि आप अपने बच्चे के साथ एक मां की भूमिका में खुद को ढाल लिया होगा।

मदर्स डे के इस खास मौके पर सोलवेदा आपको अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाली उन महिलाओं से रू-ब-रू करा रहा है, जिनके लिए मातृत्व या यूं कहें ममता खास मायने रखती है। इस लेख से जानेंगे कि मातृत्व जैसे सुनहरे पल के दौरान उन महिलाओं ने अपनी ज़िंदगी में आने वाली चुनौतियों और अपने बच्चों के साथ बॉन्डिंग को कैसे मैनेज किया।

 

  • मालविका अविनाश

    अभिनेत्री और राजनीतिज्ञ

    जब मेरा एक्टिंग करियर अपने खास मुकाम पर था, तब उस वक्त मैंने मां बनने के लिए कोई प्लानिंग नहीं की थी। मुझे इस बात का अक्सर डर लगा रहता था कि मैं अपने बच्चे की कैसे देखभाल कर पाऊंगी। उस समय उसके लिए समय दे पाना काफी मुश्किल था। मगर मेरे भाग्य में शायद एक मां बनना लिखा था। क्योंकि, जब मुझे मालूम हुआ था कि मैं प्रिग्नेंट हूं, तो उस वक्त अचानक से मुझे इस बात का अहसास हुआ कि इसे तो मैं ले सकती हूं। आज भी मेरे में भीतर वह डर कायम है कि मैं अपने बच्चे को पर्याप्त समय नहीं दे पाऊंगी। मेरे बेटे की उम्र अब नौ साल हो गई है और उसकी अपनी खास ज़रूरतें हैं। ऐसे में उसके लिए एक मां बनना मेरे लिए भी सीखने की एक निरंतर प्रक्रिया रही है।
  • रीथ अब्राहम

    एथलीट

    मैं एक बेटे और एक बेटी की मां हूं। मेरे दोनों बच्चे अब बड़े हो गए हैं। लेकिन, जब मैं उनकी देखभाल कर रही थी, तब मैं हमेशा इस बात का ख्याल रखती थी कि दोनों के पालन-पोषण और व्यवहार करने में किसी तरह का कोई भेदभाव ना हो। मैंने उन दोनों के लिए एक ही तरह के उपयुक्त नियम तय कर रखे थे। मेरी बेटी उन नियमों का बखूबी पालन भी करती थी, लेकिन मेरा बेटा हर कदम पर कभी-कभार काफी उग्र हो जाता था। खासकर उस वक्त, जब वे दोनों किशोरावस्था में थे। इसलिए मैं यह कह नहीं सकती हूं कि मेरा पैरेंटिंग एक्सपीरियंस काफी सुनियोजित तरीके का था। लेकिन, जब दोनों बच्चे बड़े हो गए, तो अब इस बात का अहसास होता है कि मैंने उनके लिए जो कुछ किया वह बेहतर था।
  • सुजाता अय्यर

    आर्टिस्ट

    जब मेरी उम्र 15 साल की थी, तो उस वक्त मैं मां बनने का और अधिक इंतज़ार नहीं कर सकती थी। मैं एक क्रेच में पली-बढ़ी हूं, क्योंकि मेरे पैरेंट्स नौकरीशुदा थे। इसलिए मैं अक्सर ख्वाब देखा करती थी कि मैं एक ऐसी मां बनूं, जो अपने बच्चे को ज्यादा से ज्यादा समय दे और उनके साथ अधिक घुल-मिलकर रहे। आज मेरे बेटे की उम्र 17 साल है। उसके बड़े होने के साथ मेरी बहुत ही शानदार यात्रा रही है। उसकी देखभाल के अनुभवों के साथ-साथ एक मां अपने बच्चों के साथ कैसे बेहतर ढंग से बॉन्डिंग डेवलप कर सकती हैं, उनकी मदद करने के लिए मैंने अपना खुद का एक वेंचर शुरू किया है। मुझे नहीं लगता है कि मां को अपने बच्चे के ऊपर अपनी अपेक्षाओं को थोपना चाहिए। मैंने कभी भी अपने बेटे के प्रति कड़ा रूख नहीं अपनाया है। मैं इस बात में विश्वास रखती हूं कि बच्चों को खुद एक इंसान बनने दें। मैंने अपने बेटे को गलतियां करने की पूरी छूट दी, ताकि उन गलतियों से वे कुछ सीखें और दुनिया में बेतहर ढंग से जीने के लिए खुद का रास्ता अख्तियार करें।
  • हर्षिका उदासी

    राइटर, चिल्ड्रेंस बुक्स

    जब मेरा बेबी काफी छोटा था, तभी से हम दोनों के बीच गहरी दोस्ती रही है। हम दोनों एक-दूसरे से अपने मन की बातों को साझा करते थे। जब मैं अपने पुराने दिनों को उसे बताती, तो वह उसके जवाब में काफी गुर्राता था। आज भी हम दोनों के बीच इतनी ही नज़दीकियां है। मेरे बेटे को भली-भांति पता है कि वह कभी भी मेरे पास आ सकता है। कुछ पूछना हो तो पूछ सकता है। उसे मालूम है कि मैं उसके सवालों का संतोषजनक जवाब ज़रूर दे दूंगी। मैं सोचती हूं कि मेरे इस व्यवहार के कारण ही ऐसा माहौल विकसित हुआ कि वह अपने विचारों को मेरे साथ साझा कर सकता है और कोई भी अजीबोगरीब प्रश्नों को पूछ सकता है। अगर मेरी ज़िंदगी में कोई परेशानी भी आएगी, तो मैं मानती हूं कि मेरा बेटा ज़रूर मदद करेगा। मैंने पूरी शिद्दत के साथ उसकी परवरिश की है। उसकी लाइफ में मैंने कभी नो एंट्री जोन बनाया ही नहीं है और जहां तक मैं मानती हूं यही सबसे बेहतर उपाय भी है।
  • श्वेता श्रीवास्तव

    एक्ट्रेस

    एक मां होना निश्चित रूप से बहुत ही खुशी और अद्भुत अहसास का पल होता है। विशेष रूप से एक मां और एक बच्चे के बीच में प्रेम की व्याख्या करना बहुत ही मुश्किल काम है। इसे समझने के लिए आपको अनुभव होना बेहद ज़रूरी है। मैं पहले से ही मानसिक और शारीरिक स्तर से अपने भीतर नि:स्वार्थ और त्याग के भाव को महसूस कर रही हूं। वास्तव में ममता का कोई मोल नहीं है और बड़ी जिम्मेवारी के बाद ही विकसित हो पाता है। मेरी बेटी बहुत ही आज्ञाकारी है। वह मुझे बेहतर ढंग से समझती है और मैं भी उसे अच्छी तरह से समझती हूं। जब वह बड़ी हुई, तो वह दुनियादारी को भी अपने नज़रिए से देखने में सक्षम हो गई है। मैं एक ऐसी मां बनना पसंद करूंगी, जो अपने बच्चों के साथ काफी फ्रेंडली और मन की बातों को उनके साथ शेयर कर सके।
  • दिव्या चौहान

    वेडिंग प्लानर

    एक मां होना वाकई में सुखद अहसास वाला क्षण होता है। एक तरह से यह आपका विस्तारित रूप होता है, जो आपसे भी शानदार होता है। यह एक नि:स्वार्थ रिश्ता होता है। इस रिश्ते के बीच आप किसी दूसरे इंसान की खुशी के लिए काफी सजग रहती हैं। यह आपके इमोशनल एस्पेक्ट को पूरी तरह से बदलकर रख देता है। मैं अपने बच्चे को एक ऐसे इंसान के रूप से देखती हूं, जिसका अपना खुद का व्यक्तित्व है। मेरी ऐसी सोच उन्हें सिखाने भर की नहीं है, बल्कि मेरा मकसद उन्हें इस बात से अवगत कराना है कि वे जीवन में सीख सकें कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है। कभी-कभी मैं भी उनसे काफी कुछ सीखती हूं। साथ ही शेष समय में खुद को ठीक करने की कोशिश भी करती हूं। क्योंकि, जब आप एक पैरेंट्स बन जाती हैं, तो आपकी पहचान एक मिसाल बन जाती है।
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