सच में घर मंदिर बन गया

सच में घर मंदिर बन गया

खाना खाने के बाद तुषार और कनिका कमरे में जाते हैं। कनिका थोड़ी नाराज़ लग रही थी। तुषार समझ गया कि उसे हनीमून पर जाना है। अगली सुबह वह बाबू जी से कह देता है कि “मैं पहले कनिका को हनीमून पर ले जाऊंगा, उसके बाद आप लोग हरिद्वार जाना।”

बरेली के एक छोटे से घर में शादी की चहल-पहल थी। मां नई बहू के स्वागत की तैयारी में लगी थीं। थोड़ी ही देर में तुषार अपनी दुल्हन कनिका को लेकर गाड़ी से नीचे उतरा। मां ने अपनी नई-नवेली बहू की आरती उतारते हुए कहा, “भगवान तुम दोनों के जीवन में खुशियां भरे, तुम्हारे आने से मेरा घर मंदिर हो जाए।” फिर शुरू हुई मुंह दिखाई की रस्म और इन सब में पूरा दिन बीत गया। दो-चार दिन में मेहमानों से भरा घर खाली हो जाता है। अब घर में बचते हैं सिर्फ पांच लोग- मां, बाबू जी, तुषार, कनिका और रोहन।

शादी हुए 10 दिन बीत चुके थे। एक दोपहर, तुषार कनिका ने कहता है, “सोच रहा हूं कि ऑफिस जॉइन कर लूं।” कनिका तुरंत बिस्तर से उठ कर बैठ जाती है, “क्या हम हनीमून पर नहीं जा रहे हैं?” तुषार ने जवाब दिया, “अभी शादी में बहुत खर्चा हो गया है। आने वाले एक-दो महीने में जाते हैं न!” कनिका ने पूछा, “पक्का!” तुषार ने जवाब दिया, “हां! पक्का।”

अगले दिन तुषार ऑफिस के लिए निकल जाता है। शाम को तुषार घर पहुंचा तो देखा कि मां, बाबू जी और रोहन, कनिका के साथ टीवी देख रहे थे। मां कनिका से कहती है, “लो बहू, आ गए हमारे नवाबजादे।”

थोड़े समय में डिनर करने के लिए परिवार के सभी सदस्य बैठते हैं। बाबू जी ने तुषार से कहा, “अब तुम्हारी शादी हो गई। रोहन को लेकर हमें कोई चिंता नहीं है। तुम उसकी पढ़ाई देख ही रहे हो। सिर्फ एक इच्छा है वैकुंठ जाने से पहले मैं और तुम्हारी मां हरिद्वार जाना चाहते हैं।” “बिल्कुल बाबू जी, मैं आप लोगों की यह इच्छा पूरी करूंगा।” तुषार ने हामी भरते हुए कनिका की तरफ देखा और मन ही मन सोचने लगा कि पत्नी को खुश करूं कि मां-बाप को।

खाना खाने के बाद तुषार और कनिका कमरे में जाते हैं। कनिका थोड़ी नाराज़ लग रही थी। तुषार समझ गया कि उसे हनीमून पर जाना है। अगली सुबह वह बाबू जी से कह देता है  कि “मैं पहले कनिका को हनीमून पर ले जाऊंगा, उसके बाद आप लोग हरिद्वार जाना।” बेटे की इस बेरुखी से पिता को दुख हुआ, वह बोले, “मेरा तो ठीक है बेटा, लेकिन अपनी मां के बारे में सोच। वह कल से कितनी खुश है।” तुषार बिना कुछ कहे चला जाता है। ऑफिस के लिए निकलते समय वह लंच बॉक्स भी नहीं ले जाता। कनिका को ये बात और खराब लगती है।

शाम को  वह घर आता है और कनिका को अपना डेबिट कार्ड देते हुए कहता है, “नाराज़ मत हो। ये लो कार्ड तुम्हें जहां भी जाना है, टिकट बुक कर लो।” अगले दिन तुषार के फोन पर बैंक का मैसेज आता है। वह समझ जाता है कि कनिका ने आखिर टिकट बुक कर लिया।

शाम को खाने के टेबल पर सब काफी खुश होकर बैठे रहते हैं। इतने में उमा अपने बेटे का माथा चूम लेती है। तुषार के चेहरे पर सवालिया निशान साफ झलकने लगते हैं । तभी बाबू जी बेटे के पीठ पर हाथ फेरते हुए कहते हैं, “थैंक्यू बेटा! परसो हमें निकलना है हरिद्वार के लिए।” आश्चर्य के साथ तुषार ने कनिका की तरफ देखा। कनिका मुस्कुरा दी। कमरे में पहुंचने के बाद कनिका ने कहा, “इच्छा चाहे किसी की भी हो, पूरी होनी चाहिए। क्या हुआ अगर पहले मां-बाबू जी घूम आएंगे।” तुषार ने पत्नी को गले लगाते हुए कहा, “माता-पिता को सर्वश्रेष्ठ बना कर, तुमने सच में घर को मंदिर कर दिया।”

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