योग का क्या उद्देश्य है?

योग का उद्देश्य चेतना की गाँठों को सुलझाना है। इससे हमारी चेतना का विस्तार होकर हम अधिक अभिज्ञ बन जाते हैं। योग के अभ्यास में अवलोकन और अभिज्ञा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

पाश्चात्य देशों में सिखाए जाने वाले योग में कुछ प्राप्त करने को बहुत महत्त्व दिया जाता है – क्या आप कोई आसन कर पा रहें हों या क्या योग करने से आपके शरीर में कुछ बदलाव आ रहा है या नहीं। लेकिन भारत में प्रशिक्षित परंपरागत गुरु इससे बहुत भिन्न प्रकार का योग सिखाते हैं। वे प्राप्ति की बजाय अभिज्ञा को महत्त्व देते हैं। उनका उद्देश्य होता है कि हम अपने शरीर, श्वास और मन की मदद से ना केवल स्वयं के बारे में बल्कि अपने भीतर और बाहर के विश्व के बारे में भी अभिज्ञ बन जाए। पाश्चात्य और भारतीय विचारों में यह महत्त्वपूर्ण अंतर है।

इस संदर्भ में ‘पाश्चात्य’ का मूल अर्थ यूनानी सिद्धांतों के अनुसार शरीर की देखभाल करना है। यह समझना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यूनानी आख्यानशास्त्र में लोगों को हमेशा बलिष्ठ दिखाया जाता है।

उसके अनुसार नायकों की मृत्यु होने पर ओलिम्पिक खेल आयोजित किए जाते थे। उनमें खेलकूद की अहम भूमिका थी। अपोलो और आर्टेमिस जैसे देवी-देवताओं तथा अटलांटा जैसे नायकों को अपनी तेज़ी और स्फूर्ति तथा अपने मज़बूत शरीरों के लिए सम्मानित किया जाता था। यूनानवासी अपने मज़बूत शरीरों के लिए जाने जाते थे। इन कहानियों में प्राप्ति को महत्त्व दिया गया। यह मान्यता थी कि विजेताओं में दौड़ने वाले एड्रेनलिन तथा उल्लास और सफलता की भावनाओं का देवताओं की सुधा के साथ संबंध था। इसलिए, विजेताओं को माला पहनाकर सम्मानित किया जाता था। विजेता देवताओं के साथ जुड़ जाते थे। इसलिए, यूनानी नायकों का ध्यान हमेशा कुछ प्राप्त करने पर सकेंद्रित था।

खेलकूद में कुछ पाने के लिए इनाम मिलता है। अब यह योग परंपराओं में भी दिखाई देने लगा है – हमें सदा नए आसन सफलतापूर्वक सीखने या शरीर को और लचीला और शक्तिशाली बनाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है। अब, उद्देश्य ही सर्वोपरि बन गया है। इसके बिलकुल विपरीत परंपरागत योग आत्मबोध के लिए एक साधन है।

वैज्ञानिक अनुसंधान के अनुसार मानव शरीर को लगातार कई प्रकार के उद्दीपनों से जूझना पड़ता है। इन उद्दीपनों के बोझ के कारण हमारा मन ढह सकता है। इसे रोकने के लिए हमारी चेतना निश्चित करती है कि मन को केवल सीमित उद्दीपनों का विश्लेषण करना पड़ें। हिंदू परंपरा में मान्यता है कि यह चेतना में गांठ बाँधने समान है और मनुष्यों की काल्पनिक भूख और भय के कारण ये गाँठें बढ़ती ही जाती हैं।

योग का उद्देश्य चेतना की गाँठों को सुलझाना है। इससे हमारी चेतना का विस्तार होकर हम अधिक अभिज्ञ बन जाते हैं। योग के अभ्यास में अवलोकन और अभिज्ञा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

किसी आसन को सफलतापूर्वक करने से अधिक महत्त्वपूर्ण उस आसन द्वारा तनी मांसपेशी पर ध्यान केंद्रित करना है। क्या वह संकुचित या शिथिल है और क्या वह सही अवस्था में है? श्वास, मन और मांसपेशी को समन्वित करने से हम जान सकते हैं कि शरीर के किसी अंग की चाल से हमारे श्वास पर क्या असर होता है।

हमारी अभिज्ञा बढ़ने से हमारी समझ भी बढ़ती है। हम विश्व को कैसे महसूस करते हैं, कैसे निर्णय लेते हैं और कैसे अपने आप को अनुशासित करते हैं वह इस समझ पर निर्भर है। यह विश्व हमारे भीतर और बाहर दोनों जगह स्थित है। आत्मबोध बढ़ने से हमारे नातों में भी बदलाव आता है।

इस प्रकार, योग के आठ अंगों – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि – में कोई मूल अंतर नहीं है। प्रत्येक अंग का दूसरे अंग पर प्रभाव होता है। सभी अंग एक साथ विकसित होते हैं। जैसे हम कढ़ी के घटक मसालों का कढ़ी के मिश्रण में आनंद लेते हैं, उसी तरह, हम योग के व्यक्तिगत अंगों में भेद नहीं कर पाते हैं, लेकिन हमें उनके मिश्रण से लाभ मिलता है। पाश्चात्य देशों में योग के प्रत्येक अंग को अलग करने पर ध्यान दिया जाता है। अब वहां इन अंगों का मिश्रण नहीं हो पा रहा है। लेकिन यही मिश्रण भारतीय विचार का सार है। परंपरागत योग का उद्देश्य स्वयं को तरल बनाकर आत्मबोध निर्माण करना है न कि केवल आसनों पर ध्यान केंद्रित करना है।

उसमें हम कुछ प्राप्त करने की इच्छा छोड़ देते हैं। केवल अधिक अभिज्ञ बनना और अपने शरीर और जीवन की वास्तविकता को स्वीकारना मायने रखता है। इससे हमारा जीवन अधिक संतुलित बनता है और हमारी चेतना के विस्तार से हम अदृश्य तनावों के बारे में अभिज्ञ होते हैं। जीवन के प्रति यह बहुत ही अहिंसक दृष्टिकोण है, जो महत्त्वाकांक्षी आधुनिक पीढ़ी बहुधा भूल गई है। अपने उद्देश्य पर सकेंद्रित होने से हम भूल जाते हैं कि हमारे निर्णयों के हमारे काम, जीवन, सगे-संबंधियों और पर्यावरण पर क्या परिणाम हो रहें हैं। हममें फिर से आत्मबोध बढ़ना आवश्यक है।