वन किसके रूपक है?

ऋग्वेद में वन को अरण्यानि नामक देवी से जोड़ा जाता है। उन्हें समर्पित ‘अरण्यानि सूक्त’ बड़ा ही विवरणात्मक है। उसमें अरण्यानि को पायल पहनी हुईं नर्तकी वर्णित किया गया है। हम पायलों की धुन सुन सकते हैं पर देवी को देख कभी नहीं सकते हैं।

हिंदू आख्यान शास्त्र को समझने के लिए हमें वन को एक रूपक की तरह समझना होगा। वन वह अनियंत्रित विश्व है जहां केवल शक्तिशाली जीवों का राज चलता है। दूसरे शब्दों में कहना हो तो चूँकि यह प्रकृति का रूप है, यहां बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है अर्थात यहां ‘मत्स्य न्याय’ लागू होता है।

दूसरी ओर प्रकृति को अपना बनाने से संस्कृति स्थापित होती है। ऐसे विश्व में आवश्यक नहीं कि शक्तिशाली लोगों का ही वर्चस्व हो। यहां शक्तिशाली लोग शक्तिहीन लोगों की देखभाल करते हैं। वास्तव में मनुष्य केवल तब सभ्य कहलाते हैं जब दूसरों पर वर्चस्व पाने और क्षेत्रीय बनने की उनकी इच्छाएं, जो प्राणियों में भी होती हैं, दुर्बलों की मदद करने की इच्छा में बदल जाती हैं। इस कारण असहाय लोग भी पनप सकते हैं।

इसलिए सामवेद में दो प्रकार की धुनें मिलती हैं – पहली प्रकार की धुनों को बस्तियों में और दूसरी प्रकार की धुनों को वनों में गाना होता है। मनुष्यों का प्राणियों से अतिमानवीय जीवों में परिवर्तन समझने के लिए यह भेद समझना महत्त्वपूर्ण है। प्राणी भूख और भय के वश में होते हैं। लेकिन मनुष्यों में अपनी भूख और भय के पार जाकर दूसरों की भूख और भय के प्रति संवेदनशील बनने का सामर्थ्य होता है।

ऋग्वेद में वन को अरण्यानि नामक देवी से जोड़ा जाता है। उन्हें समर्पित ‘अरण्यानि सूक्त’ बड़ा ही विवरणात्मक है। उसमें अरण्यानि को पायल पहनी हुईं नर्तकी वर्णित किया गया है। हम पायलों की धुन सुन सकते हैं पर देवी को देख कभी नहीं सकते हैं। इस बात पर विचार किया गया है कि अरण्यानि मनुष्यों की बस्ती से इतनी दूर रहकर भी निर्भय कैसी रहती हैं और धरती पर हल चलाए बिना सभी जीवों को पोषित कैसी करती हैं। हिंदू धर्म में वनों की प्रारंभिक समझ हमें इस सूक्त में मिलती है। यह सूक्त तैत्तिरीय ब्राह्मण में दोहराया गया है। अरण्यानि को बिहार के आरा नगर में अरण्य देवी मंदिर में पूजा जाता है।

रामायण और महाभारत इन महाकाव्यों में वनों की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। राम को चौदह वर्ष के वनवास और पाण्डवों को तेरह वर्ष के वनवास के लिए जाना पड़ता है। वे एक ऐसे संसार में पहुंचते हैं जहां कोई राजा नहीं होता है। राजा व्यवस्था स्थापित करते हैं और इसलिए वनों में अराजकता होती है। वहां बलवान बलहीन पर हावी होते हैं, अर्थात वहां अधर्म होता है। इस प्रकार रामायण और महाभारत में यह विचार प्रस्तुत किया गया है कि राजाओं को मत्स्य न्याय को वश में करके धर्म स्थापित करना चाहिए।

पौराणिक साहित्य में कहा गया है कि कई देवता वनों में रहते हैं। शिव देवदार के वन अर्थात दारुक-वन से जुड़ें हैं, गणेश ईख के वन अर्थात इक्षु-वन से जुड़ें हैं, कृष्ण तुलसी के वन अर्थात वृंदा-वन से जुड़ें हैं, हनुमान केले के वन अर्थात कदली-वन से जुड़ें हैं और देवी इमली के वन से जुड़ीं हैं, जो सदा हरित रहता है।

इस साहित्य में मंत्रमुग्ध वनों का उल्लेख भी है, जहां केवल महिलाएं निवास करती हैं और जिनमें प्रवेश करने वाले सभी पुरुष स्त्री बन जाते हैं। केवल योगियों जैसे पुरुष, जिनका अपने आप पर संपूर्ण नियंत्रण होता है, वही इन वनों में प्रवेश करने के बाद भी पुरुष बने रहते हैं।

इस प्रकार वन एक ऐसी जगह है जहां कोई नियम या विनियम लागू नहीं होते हैं। वहां किसी पर कोई प्रतिबंध नहीं होता है और वह सभी कुछ उचित होता है जो किसी जीव को जीवित रखता है। यहां न्याय समाज के नियमों के अनुसार नहीं बल्कि प्रकृति के नियमों के अनुसार निर्धारित होता है। यहां प्राणी झुंड में रहते हैं। प्रत्येक झुंड के हर सदस्य को एक निर्धारित बलाधिक्रम के अनुसार ही खाना खाने मिलता है। विभिन्न झुंड अपने-अपने क्षेत्र भी हिंसात्मक ढंग से ही स्थापित करते हैं। वन में सभी को अपनी देखभाल करनी पड़ती है और कोई किसी की देखभाल नहीं करता है। यदि झुंड के किसी सदस्य को चोट लगती है तो झुंड उसे पीछे छोड़ देता है। क्या यह आपको आधुनिक समाज की याद नहीं दिलाता है?

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।

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