श्याम की दुल्हन

श्याम की दुल्हन

अक्सर लोगों के मन में बार बार यह सवाल उठता है, कि यदि प्रभु सर्वव्यापी हैं, यदि वे कण कण में हैं, तो हम उन्हें क्यों नहीं देख सकते?

एक दिन विष्णु चित्त अपने बगीचे की ज़मीन खोद रहा था, और तुलसी के पौधे लगा रहा था। उस समय उसका ध्यान एक गुच्छे पर गया, जहाँ एक नन्ही मुन्नी बच्ची सोई थी। बच्ची के चेहरे पर गज़ब का नूर था। विष्णु चित की कोई संतान नहीं थी। वह सोचता है कि शायद प्रभु ने इस बच्ची को मेरे लिए भेजा है। वह बच्ची का नाम “गोदा” रखता है। तेलगु में इसका अर्थ है, “धरती से उत्पन्न हुआ।“

हज़ारो वर्ष पहले राजा जनक जब धरती पर हल चला रहे थे। तब उन्हें एक बच्ची मिली थी, जो सारे भारत में सीता के नाम से प्रसिद्ध है। उसी प्रकार विष्णु चित्त को यह बच्ची मिली, जिसे वह गोदा कहकर पुकारने लगा। गोदा शब्द का दूसरा अर्थ है। “जो मीठे गीत गाये।“  जैसे-जैसे यह बच्ची बड़ी होती है वैसे वैसे बच्ची विभोर होकर मधुर गीत गाने लगती है और गोदा शब्द का तीसरा अर्थ है। “वह जो मालाएँ बनाकर दे।“

यह बच्ची भी रोज माला बनाकर श्री विष्णु के गले में पहनाती थी। उस बच्ची का चेहरा बड़ा ही प्यारा और मन को मोहने वाला था। हमेशा उसके चेहरे पर मुस्कान रहती। उसकी आँखें चमकती रहतीं। जो भी उसे देखता वह उसकी ओर आकर्षित हो जाता, उसे लगता कि वह बच्ची उसकी गोद में ही बैठी रहे।

उसके चेहरे से मासूमियत झलकती थी। साथ-साथ वह नटखट भी थी। पहला शब्द जो उसने बोलना सीखा, वह था “हरि।“ अभी चार साल की भी नहीं थी, कि आस-पड़ोस के लोगों को आस-पास के बच्चों को इकट्ठा करती।

‘हरि बोल, हरि बोल, हरि बोलो भाई! हरि बोल, हरि बोल, हरि बोलो भाई!’ का कीर्तन करवाती थी।

उसकी मधुर आवाज़ में ऐसा आकर्षण था कि सारे नगर के बूढ़े-बच्चे उसके साथ मिलकर हरि बोल की धुन लगाते थे। अब नगर में कीर्तन होने लगा। एक-एक गली से आवाज़ आती,

“हरि बोल, हरि बोल, हरि बोलो भाई!

हरि बोल, हरि बोल, हरि बोलो भाई!”

वह अन्य बच्चों की तरह गलियों में खेलने नहीं जाती थी। किन्तु एकान्त में बैठकर, बातें करती थी। कभी हँसती थी, तो कभी रोती थी, उसकी आँखों से सावन-भादो बरसता था। कभी लगता था, वह बेहद दुःखी है। वह किसी का इन्तज़ार कर रही है। जब लोग उससे पूछते, क्या कारण है, जो तुम इतनी दुःखी हो? तब गोदा रोती हुई कहती, “अभी अभी सांवरा मेरे साथ खेल रहा था, अचानक न जाने कहाँ गायब हो गया।“ कभी-कभी कहती थी,

“साँवरा, रात न आया, रोती हूँ ज़ारोज़ार,

सखियों, यह इश्क है बड़ा नागवार!”

जब वह बड़ी हुई, तो श्रीभागवत पुराण और विष्णु पुराण का पाठ करने लगी। वह हर समय श्री कृष्ण के विचारों में खोई रहती। श्रीकृष्ण की महिमा के गीत गाती और लिखती थी। धीरे-धीरे उसके हृदय में प्यास उत्पन्न होने लगी। उसकी प्यास की चिंगारी बढ़ते-बढ़ते अग्नि का रूप ले लेती है। कौन-सी प्यास? उठते बैठते, चलते फिरते, काम काज करते, सोते जागते, उसके हृदय में एक ही प्यास थी कि वह श्याम की दुल्हन बनें। शाम सुबह उसके दिमाग में यही विचार घूमता रहता था, और रात को सपने में भी वह यही देखती कि श्रीकृष्ण ने उसे स्वीकार किया है, और वह हमेशा हमेशा के लिए अपने प्रीतम की हो गई है। अपने पिता के बगीचे से गोदा तुलसी के पत्ते तोड़कर हार बनाती और वे अपने पिता को देती ताकि वह मंदिर में ठाकुरों पर चढ़ाए। यदि उसके पिता कहीं चले जाते, तो वह हार अपने गले में डालकर दर्पण के सामने खड़ी होकर स्वंय से पूछती। “क्या तुम इतनी खूबसूरत हो कि श्याम तुम्हें अपनी दुल्हन के रूप में स्वीकार करें।“ फिर वह हार उतारकर रखती थी। जिसे पिता मंदिर ले जाकर श्री कृष्ण की मूर्ति पर चढ़ाते थे।

एक दिन पिता मंदिर में हार ले जाते हैं। पर पुजारी उन हारों को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि एक हार में बाल चिपके हुए थे। पुजारी कहते हैं, “ये हार साफ नहीं है, पहने हुए लगते हैं।“

यह सुनकर पेरी आलवर चकित हो जाता है। दूसरे दिन देखता है। गोदा छिपकर वे हार पहनकर दर्पण में देख कर स्वंय से पूछ रही थी, “क्या श्याम तुम्हें अपनी दुल्हन बनाएगा?” फिर हार उतारकर रख दिये। पेरी आलवर गोदा पर गुस्सा होते हैं। कहते हैं, “मेरी बच्ची! यह तू क्या कर रही है? तुम्हें पता नहीं, कि जो हार ठाकुरों पर चढ़ते हैं, उन्हें हम नहीं पहन सकते। आज के बाद ऐसा मत करना।“ यह सुनकर गोदा का चेहरा उतर जाता है। उस दिन पेरी आलवर हार मंदिर में नहीं ले जाते। रात को भगवान श्री कृष्ण उसके सपने में आते हैं और कहते हैं, “मेरे प्रिय! आज तुमने मुझे हार नहीं दिए? इसका क्या कारण है? तुम्हारे हार की माला की राह मैं सारा दिन देखता रहा।“ पेरी आलवर कहते हैं, “प्रभु! मुझे क्षमा करना। आज मैंने देखा, मेरी बेटी ने वे हार अपने गले में डाले थे। फिर मैं वे पहने हुए हार आपके पास कैसे ले आता?” तभी श्याम कहते हैं, “मुझे तो वे ही हार पसंद हैं। जिन्हें पहले तुम्हारी बेटी पहनती है। तुम अपनी बेटी पर कभी गुस्सा मत होना। वह कोई साधारण कन्या नहीं है। गुस्सा मत होना। वह तो आन्डाल है। आन्डाल मेरी है। मेरी परम प्यारी है। तेलगु में आन्डाल शब्द का अर्थ है, “जो जगत का कल्याण करे!” उस दिन से पेरी आलवर उसे गोदा के बदले आन्डाल कहने लगे। आन्डाल स्वयं को एक गोपी समझती थी। जिस नगर में रहती थी, उसका नाम था, ‘श्रीवलूपत्तर’। इस कन्या के लिए वह नगर वृन्दावन था। नगर की हर कन्या को, हर बालक और बालिका को वह गोपी समझती थी। श्रीकृष्ण से गोपी जैसा प्यार करती थी। लोग उससे पूछते, “तुम कौन हो?” तो वह कहती, “मैं एक गोपी हूँ, श्याम की गोपी।“ उसके हृदय में श्री कृष्ण के लिए गहरी प्यास थी। वह अपनी सखियों के साथ मिलकर कृष्ण लीला करती थी। जब मस्ती में आ जाती, तो आँखों से आँसू बहाते हुए होंठों से यह गीत गाती थी।

“श्याम! श्याम! श्याम!

मेरे जीवन का विश्राम!

मेरे दिल का धाम,

श्याम! श्याम! श्याम!”

बड़ी होते हुए भी उसका स्वभाव एक मासूम बच्ची की तरह था। वह सांसारिक बातों से कोसों दूर थी। उसके मुखड़े पर मासूमियत, और आँखों में इश्क का नशा था। उसके हृदय में कृष्ण प्रेम था।

श्री ईसा कहते थे “यदि प्रभु को पाना चाहते हो, तो मासूम बालक की तरह बनो।“ श्री राम कृष्ण परमहंस जी कहते थे, “प्रभु तक वे पहुँच पाते हैं, जो सात साल के बच्चे की तरह हैं।“

अब आँडाल युवती हो गई थी। उसका सौंदर्य खिलने लगा है। पिता उसके लिए योग वर की तलाश करने लगे। जब बालिका को पता चलता है, तो वह पिता से कहती है, “पिताजी! मैं अपना हृदय तो श्याम पर हार चुकी हूँ। मैं तो उसकी दुल्हन हूँ। मैं शादी करूँगी तो सिर्फ श्याम से, किसी और से नहीं।“ उसके संत पिता पेरी आलवर उससे कहते हैं, “मेरी बच्ची! तुम श्याम सुन्दर से कैसे शादी करोगी?” पेरी आलवर उससे कहते हैं। “एक सौ आठ मंदिर हैं, और हर मंदिर में श्याम का रूप निराला है।“ “तुम कौन से श्याम सुंदर से शादी करना चाहती हो?” आन्डाल तुरन्त उतर देती है, “श्री रंगम के रंगनाथ से। उसी पर मैंने अपना दिल हारा है। वही मेरा दूल्हा, मेरे प्राण पति है। मैंने स्वंय को उसके हवाले किया है। वही है मेरा सब कुछ। ऐसा कहकर वह फूट फूट कर रोने लगती है और रोते-रोते बेसुध हो जाती है। पिता जान जाते हैं। आन्डाल के हृदय में प्रभु रंगनाथ बसे हैं। परन्तु वे सोचते हैं शादी कैसे होगी? फिर पेरी आलवर को एक रात सपना आता है। जिसमें रंगनाथ उससे कहते हैं, “तुम मेरी शादी अपनी बेटी आन्डाल से कराओ। मैं तुम से आन्डाल का हाथ माँगता हूँ, क्योंकि उसे मुझसे लगाव है और मुझे भी उससे लगाव है।“

यह नियम है, यदि हमें प्रभु के लिए प्यास है, तो प्रभु को भी हमारे लिए प्यास होती है। पहले प्रभु को प्यास होती है फिर हमारे भीतर प्यास जागती है। “मैं चाहता हूँ वह हमेशा के लिए मेरी हो जाए।“

उसी रात मंदिर के मुख्य पुजारी को भी सपना आता है। रंगनाथ उससे कहते हैं, “कल सुबह तुम आन्डाल के पिता के घर जाना अपने साथ में काम आने वाली सारी सामग्री ले जाना। शगुन करके आन्डाल को दुल्हन के वस्त्र पहनाकर पालकी में बिठाकर बारात के साथ इस मंदिर में ले आना, मैं उससे विवाह करूँगा।“

अगले दिन सवेरे मंदिर का पुजारी हुकम की तामील करता है। वह पेरी आलवर के घर आता है। सारी चीज़ें अपने साथ लेकर आता है। आन्डाल का घर खुशियों से भर जाता है। वीणा, बाजे, शहनाईयों बज उठती हैं। शगुन होते हैं। आन्डाल को शादी का जोड़ा पहनाते हैं। उसे पालकी में बिठाकर हज़ारों लोग कीर्तन करते हुए, गीत गाते हुए, मंदिर में ले आते हैं। यह चौदह वर्ष की बालिका मंदिर में रंगनाथ के आगे खड़ी होती है। पढ़े-लिखे लोग शायद यह बात नहीं मानेंगे, परन्तु ऐसा क्या है, जो प्रभु नहीं कर सकते। प्रभु के लिए सब कुछ संभव है।

Nothing is impossible for God.

फिर रंगनाथ अपनी बाँहें फैलाकर आन्डाल को अपने में समेट लेते हैं। गोदा, जिसकी थी, उसने उसे अपने में समा लिया। भक्ति में समा गई।

भाग्यवान थी आन्डाल, श्याम ने उसे अपनी दुल्हन के रूप में स्वीकार किया। मैं नहीं समझता कि दुनिया के इतिहास में ऐसा कोई अन्य उदाहरण होगा।

हम भी प्रभु से भक्ति का दान माँगें। उसे पुकारें, प्रभु! तुम कितने दयालु हो। यह तुम्हारी असीम कृपा है, कि तुम मेरे इस छोटे से हृदय में वास करते हो! तुम स्वयं मेरे हृदय में बैठे हो और मैं हूँ, कि तुम पर कोई ध्यान ही नहीं दे रहा। मैं हूँ कि संसार के झूठे पदार्थों के पीछे भाग रहा हूँ। भोग विलास में अपना समय नष्ट कर रहा हूँ। मेरे महबूब! मैं एक पल भी तुम्हारे बारे में नहीं सोचता। जब आप इस बात पर विचार करेंगे, तो आपकी आँखों से आँसू छलक आएँगे, और इस विचार से जब हमारे आँखों में आँसू छलक आते हैं, तब हमें सच्ची भक्ती का अनुभव होता है। हमारे भीतर सच्ची भक्ति उत्पन्न होती है। जब हमारे अंदर भक्ति उत्पन्न होती तो हम धन्य हो जाते हैं।

इस संसार में दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं। एक जिनके अन्दर ईश्वर के लिये भक्ति होती है और दूसरे जिनके अंदर ईश्वर के लिए भक्ति नहीं होती। आप भक्त बनना चाहेंगे या नहीं? ईश्वर की हम सब पर ऐसी कृपा हो कि हमारे अंदर भी भक्ति उत्पन्न हो। क्योंकि प्रभु की कृपा से ही हमें भक्ति प्राप्त होती है। प्रभु को पुकारें। हे प्रभु! हम पर ऐसी कृपा करें कि हम तुम्हारे चरणों में बैठकर, स्वयं को भूलकर, एक दिन तुम्हारे होकर, तुममें समा जाएँ। अक्सर लोगों के मन में बार बार यह सवाल उठता है, कि यदि प्रभु सर्वव्यापी हैं, यदि वे कण कण में हैं, तो हम उन्हें क्यों नहीं देख सकते?

एक बादशाह ने एक सत्पुरूष से कहा, “आप कहते हैं कि प्रभु हर जगह मौजूद हैं, तो मैं उन्हें क्यों नहीं देख सकता?” तब सत्पुरूष ने बादशाह से कहा। राजन! आओ ज़रा महल  के बाहर चलें। दोपहर का समय था, और सूर्य बहुत तेज़ चमक रहा था। बादशाह, और संत दोनों महल के बाहर आये। संत ने बादशाह से कहा, “राजन! ज़रा सूर्य की ओर देखें। बादशाह ने सूर्य को देखने की कोशिश की, किन्तु वे सूर्य के तेज को सहन नहीं कर पाये, और उन्होंने अपनी आँखें हटा लीं। तब संत ने कहा। राजन, “सूर्य तो प्रभु की एक रचना है। जब आप उसके तेज को नहीं सहन कर सकते, तो भला आप प्रभु का तेज़ कैसे सहन कर पाएँगे? हम ईश्वर को इसलिए नहीं देख पाते, क्योंकि ईश्वर मन और इंद्रियों की पहुँच से परे हैं। हमारी बुद्धि, मन और इंद्रियों तक ही सीमित है। हम वही देखते हैं, जो हमें आँखें दिखाती हैं, वही सुनते हैं, जो हमें कान सुनाते हैं। जिसे हमारे हाथ छू सकते हैं, हम उसे ही सच मानते हैं। इंद्रियाँ ईश्वर तक नहीं पहुँच सकती हैं। इन आँखों से हम ईश्वर को देख नहीं सकते, इन कानों से हम ईश्वर को सुन नहीं सकते। इन हाथों से ईश्वर को छू नहीं सकते। बुद्धि से समझ नहीं सकते। प्रभु विचारों से दूर है। इसलिए संत सत्पुरूष, और महात्मा हमें कहते हैं कि अन्तरमुखी बनो। हमारी इंद्रियाँ सारा समय बाहर देखती रहती हैं। इन इंद्रियों का रूख अंदर की ओर मोड़ना है। इंद्रियों को अंदर की ओर मोड़ने के लिए एकान्त में मौन का अभ्यास करना बहुत ज़रूरी है।

हर एक साधक को चाहिए कि वह रोज़ कुछ समय मौन साधना करे। हम पूरे दिन में कितने कार्य करते हैं। पर सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है, सबसे ज़रूरी काम है, मौन का अभ्यास थोड़ा निश्चित समय पर, निश्चित स्थान पर बैठकर मौन साधना करें। और अपने भीतर जाने की कोशिश करों फिर एक शुभ दिन प्रभु की कृपा से हमें भी उस परमपिता परमात्मा के दर्शन होंगे।

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