रंगोली की समझ

क्या इस प्रथा का कोई तार्किक उद्देश्य है? तर्कवादी मानते हैं कि चूँकि चींटियां चावल का आटा खा जाती हैं, इस प्रथा से उनका घर में प्रवेश रुक जाता है। क्या इसका कोई सौंदर्यपरक उदेश्य है? हाँ, क्योंकि इन आकृतियों से घर की सुंदरता बढ़ती है। लेकिन उन्हें रोज़, दरवाज़े पर और वो भी केवल महिलाओं द्वारा क्यों बनाया जाता है?

मेरे पड़ोस में हर सुबह एक महिला अपने घर के दरवाज़े के बाहर, ज़मीन पर चावल के आटे के लेई से सुंदर आकृतियां बनाती है। वह आंध्र प्रदेश से है और इन आकृतियों को मुग्गू कहती है। यही प्रथा भारतभर लाखों घरों में देखी जाती है। वह दक्षिण भारत में बहुत प्रचलित है और वहां उसे कोलम कहते हैं।

यह आकृतियां दरवाज़े के पार घरों की दीवारों पर भी बनाईं जाती हैं। उन्हें ओडिशा और बंगाल में अल्पोना, बिहार में अरिपन और महाराष्ट्र में रांगोळी कहते हैं। किसी समय ये आकृतियां रोज़ बनाईं जाती थी। ग्रामीण भारत के कई भागों में आज तक यही होता है। लेकिन भारत के अधिकाँश भागों में यह प्रथा अब केवल त्यौहारों के समय और विशेष रूप से दिवाली में देखी जाती है। यह आकृतियां दिवाली के अलावा कोजागिरी पूर्णिमा और कृष्ण जन्माष्टमी के समय और शादियों के समय भी बनाईं जाती हैं। यह प्रथा पारसी समुदाय में भी देखी जाती है।

यह आकृतियां केवल महिलाएं बनाती हैं। हालाँकि पहले केवल चावल के आटे का उपयोग होता था, अब कृत्रिम पाउडर और रंगों का उपयोग भी हो रहा है। और यदि किसी को और भी समय बचाना हो तो अब रंगोली के स्टिकर भी मिलते हैं।

क्या इस प्रथा का कोई तार्किक उद्देश्य है? तर्कवादी मानते हैं कि चूँकि चींटियां चावल का आटा खा जाती हैं, इस प्रथा से उनका घर में प्रवेश रुक जाता है। क्या इसका कोई सौंदर्यपरक उदेश्य है? हाँ, क्योंकि इन आकृतियों से घर की सुंदरता बढ़ती है। लेकिन उन्हें रोज़, दरवाज़े पर और वो भी केवल महिलाओं द्वारा क्यों बनाया जाता है? त्यौहारों और जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं के समय और भी विस्तृत आकृतियां बनाईं जाती हैं। इससे स्पष्ट है कि इस अनुष्ठान की जड़ें भावनाओं, आख्यानों और जादू में हैं।

संभवतः, यह जंतर हैं, जिनसे घरों में सौभाग्य आता है। इस अनुष्ठान से परिवार की कुलमाता ब्रह्मांडीय ऊर्जा को जोतकर उसे घर के भीतर लाती थी। यह आकृतियां घरों पर दैवी कृपा बरसाती थी। और कुलमाता यह अनुष्ठान किसी पुरुष या पुजारी की सहायता लिए बिना अपने दम पर करती थी।

लेकिन इस अनुष्ठान के कुछ नियम भी थे। कुलमाता का विवाहित होना और उनकी संतान होना आवश्यक था। विधवाओं को यह आकृतियां निकालना मना था और कुंवारियां यह आकृतियां बनाने में केवल अपनी मांओं की मदद कर सकती थी। पुरुषों में केवल पुजारी रंगोली बना सकते थे और वो भी केवल एक निर्धारित अनुष्ठान करते समय; रंगोली उस जगह को पवित्र बनाने के लिए निकाली जाती थी जहां कोई अनुष्ठान होने जा रहा होता था। इसके विपरीत महिलाओं की रंगोली संपूर्ण घर को पवित्र कर देती थी।

कई लोग मानते हैं कि रंगोली या कोलम आगे जाकर तांत्रिक मंडला और यंत्र बन गए। या संभवतः वे मंडलाओं और यंत्रों से उत्पन्न हुए। इन मंडलाओं और यंत्रों में देवी-देवताओं और नैसर्गिक आत्माओं को ज्यामितीय आकारों से दिखाया गया।

स्त्री और पुरुष को क्रमशः नीचे और ऊपर की ओर मुड़े त्रिकोण से दिखाया गया। वृत्त निसर्ग का जबकि वर्ग संस्कृति का प्रतीक था। कमल गर्भ का प्रतीक था। पंचकोण शुक्र ग्रह और पांच तत्त्वों का प्रतीक था।

साधारणतः रंगोली में शुरू में बिंदुओं का ग्रिड निकाला जाता है। जितने ज़्यादा बिंदु, उतनी विस्तृत आकृति। ग्रिड चाहे एक हो, लेकिन अलग स्त्रियां उसमें अलग आकृतियां निकाल सकती हैं। इसलिए, किसी गांव की गली में अलग-अलग घरों में अलग-अलग आकृतियां देखने मिलती हैं।

अलग घरों की महिलाओं की पहचान और सौंदर्य को लेकर समझ भी अलग थी, जो वे रंगोली के माध्यम से हर दिन व्यक्त करती थी। हालाँकि बिंदुओं का ग्रिड और रंगोली बनाने का अनुष्ठान उन्हें साथ लाता था, उनकी आकृतियों से लोगों को समझ आता था कि सभी का अलग व्यक्तित्व था। प्रत्येक महिला अपनी क्षमतानुसार सबसे अच्छी रंगोली बनाती थी, लेकिन इसमें उसका उद्देश्य किसी और से प्रतिस्पर्धा करना नहीं होता था।

उद्देश्य यह था कि कोई अपने घर का सबसे अच्छा प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता था। इन सुंदर लेकिन भिन्न आकृतियों से भारतियों को पीढ़ी दर पीढ़ी सिखाया गया कैसे दूसरों के प्रति सहिष्णु होना चाहिए और कैसे आलोचना किए बिना अपनी और दूसरों की आकृतियों का आनंद उठाना चाहिए।

घर में माहौल कैसा था वह आकृति देखकर समझ आता था। नैत्य आकृतियां घर में अनुशासन की संकेतक थी। सुंदर आकृतियां आनंदपूर्ण माहौल की संकेतक थी। विस्तृत आकृतियां एकाग्रता की संकेतक थी। हड़बड़ी में निकाली गईं आकृतियां बुरे माहौल की संकेतक थी। और किसी दिन घर के बाहर आकृति न होना इस बात की संकेतक थी कि कुछ अनुचित हुआ था।

कभी-कभार, जैसे त्यौहारों के समय, निर्धारित आकृतियां बनाईं जाती थी। तब, महिलाओं को अपनी रचनात्मकता को दबाकर संस्कृति या परंपरा के अनुसार आकृतियां बनानी पड़ती थी। तब, वे विस्तृत समुदाय का भाग बन जाती थी और इसलिए गांव के नियम घर पर लागू होते थे।

रंगोली कभी स्थायी नहीं थी। हर सुबह उसे साफ़ करने से लोगों को जीवन के अस्थायित्व की याद दिलाई जाती थी। आज की बुरी मनःस्थिति कल अच्छी बन सकती है। बुरी आकृतियां अच्छी आकृतियों में बदल सकती हैं। जैसे घर का माहौल बदलता है वैसे आकृतियां भी बदलती हैं। घर के सदस्यों के विकास के साथ आकृतियां भी अधिक आत्मविश्वासी और आनंदभरी बन जाती हैं।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।