पाकिस्तान का हिंगलाज माता मंदिर

हिंगलाज माता मंदिर एक पुराने ज्वालामुखी और घाटी से जुड़ा है। यह एक शक्ति पीठ है। कहते हैं कि सती की मृत्यु के पश्चात शिव इतने शोकाकुल और क्रोधित थे कि उन्होंने तांडव नृत्य किया।

पाकिस्तान के इस्लामी राष्ट्र होने और उसमें ईश-निंदा तथा मूर्तिपूजा के विरुद्ध नियम होने के बावजूद आज भी वहां कई हिंदू मंदिर हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम के आने से पहले, अर्थात 1000 वर्ष से भी पहले से यह मंदिर यहां रहें हैं। यह मंदिर पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान प्रांतों में आज भी पनप रहें हैं। स्थानीय मुसलमान कई मंदिरों की देख-रेख धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं के अनुसार करते हैं। यह वो प्रथाएं हैं जो औपनिवेशी काल में धार्मिक अनन्यता के रूप लेने के पहले से पनपीं थी।

पाकिस्तान के कुछ प्रमुख हिंदू मंदिर हैं कराची के पास स्थित दुर्गा का शिवहरकारय या करावीपुर, पेशावर में गोरखनाथ और कालीबारी मंदिर, मुल्तान का सूर्य मंदिर और पंजाब प्रांत का कटास राज मंदिर परिसर। एक और महत्त्वपूर्ण मंदिर है हिंगलाज माता मंदिर, जो कराची से कुछ घंटों की दूरी पर, बलूचिस्तान में है।

हिंगलाज माता मंदिर एक पुराने ज्वालामुखी और घाटी से जुड़ा है। यह एक शक्ति पीठ है। कहते हैं कि सती की मृत्यु के पश्चात शिव इतने शोकाकुल और क्रोधित थे कि उन्होंने तांडव नृत्य किया। विष्णु को डर था कि इस नृत्य से विश्व का नाश होगा। इसलिए, उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से सती की पार्थिव देह के टुकड़े कर दिए, जिससे शिव का नृत्य रुक गया।

सती के शरीर के टुकड़ें जहां गिरें उन जगहों को शक्ति पीठ कहा जाता है। कहते हैं कि सती का सर हिंगलाज में गिरा और वह उस घाटी से जुड़ गया। चूँकि धरती पर गिरने पर उनके सिर ने बहुत उष्णता और ऊर्जा निर्माण की, इसलिए वहां एक घाटी निर्मित हुई। और यह मान्यता है कि स्थानीय भैरव, बग़ल में स्थित ज्वालामुखी के रूप में सिर की रक्षा कर रहें हैं। उन्हें बाबा चंद्रगुप्त कहते हैं।

पाकिस्तान के अन्य प्रांतों से भी तीर्थयात्री यहां आते हैं। हिंगलाज माता के साथ दो कहानियां जुड़ीं हैं। पहली कहानी परशुराम के साथ जुड़ी है। कहते हैं कि जब परशुराम सभी क्षत्रियों का वध कर रहें थे, तब कुछ क्षत्रियों ने हिंगलाज माता के मंदिर में शरण ली। चूँकि माता उनकी रक्षा कर रही थी, परशुराम ने उनका वध नहीं किया। उन्होंने इन क्षत्रियों को वेद सिखाए और बदले में उन क्षत्रियों ने हथियार त्याग दिए। बाद में, यह क्षत्रिय जुलाहें बनकर भारतभर में फैलें। औद्योगिक क्रांति के पहले जिन कपड़ों के लिए भारत मशहूर था, वह कपड़ें इस समुदाय ने बुनें थे।

दूसरी कहानी राम से जुड़ी है। रावण के वध के पश्चात राम ने हिंगलाज माता की तीर्थयात्रा पर जाने का निर्णय लिया। रावण ब्राह्मण थे और इसलिए राम उनके वध के पाप से मुक्त होना चाहते थे। इसलिए, राम अपने राजसी साथियों के साथ वहां पहुंचें। लेकिन देवी के भैरवों ने राम को तीर्थयात्रा शुरू करने से मना किया। यह इसलिए कि वे एक साधारण तीर्थयात्री जैसे नहीं आए थे।

इसलिए, राम ने अपने सैनिक और राजसी साथी पीछे छोड़ दिए और वे केवल सीता, लक्ष्मण और हनुमान के साथ तीर्थयात्रा पर निकलें। तीर्थयात्रा बहुत लंबी और कठिन थी। कई बार उन्हें पीने का पानी भी कम पड़ा। लक्ष्मण ने धरती में तीर मारकर पानी निकालने का प्रयास किया, लेकिन वे असफल रहें। हनुमान ने भी धरती को रौंदकर उसमें दरार बनाने का प्रयास किया, जिसमें से पानी निकल सकें। लेकिन, पानी नहीं निकला। अंत में सीता ने धरती को स्पर्श कर हिंगलाज माता से विनती की कि वे पानी को निकलने दें। इस तरह, कई कुंड और कुएं उभरें। उनकी मदद से राम और उनके साथी रेगिस्तान में से लंबी यात्रा कर हिंगलाज माता के मंदिर तक पहुंचें।

राम ने अपनी यात्रा को चिन्हित करने के लिए देवी के मंदिर के पास की गुफ़ाओं में सूर्य और चंद्र की कई छवियां बनाईं। राम के साथ आए सैनिक हिंगलाज माता की तीर्थयात्रा नहीं कर पाए थे। इससे उन्हें दुःख हुआ। उन्हें आश्वासन दिया गया कि अगले जन्मों में वे तीर्थयात्री बनकर लौटेंगे और देवी उन्हें आशीर्वाद देंगी।

यह मंदिर आज भी पाकिस्तान का महत्त्वपूर्ण मंदिर है और कई समुदाय उसकी तीर्थयात्रा करते हैं।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।