मिथ, मिथोलॉजी, इतिहास इत्यादि

कुछ लोग मानते हैं कि मिथोलॉजी शब्द संस्कृत शब्द मिथ्या से आया है। ये धारणा ग़लत है। अंग्रेज़ी शब्द ‘मिथोलॉजी’ की यूनानी जड़ें हैं - मिथोस (mythos) और लोगोस (logos)।

मैं अपने आप को मिथोलॉजिस्ट (mythologist) बुलाता हूं। लेकिन मैंने देखा है कि लोग मिथ (myth) और मिथोलॉजी (mythology) इन अंग्रेज़ी शब्दों का अर्थ नहीं समझते हैं। आइए आज इसपर बात करते हैं।

मिथ और मिथोलॉजी के अर्थ

कई लोग मानते हैं कि अंग्रेज़ी शब्द ‘मिथ’ जिसका हिंदी अनुवाद मिथक है का अर्थ, कल्पना या झूठ है। कुछ लोग मानते हैं कि मिथोलॉजी शब्द संस्कृत शब्द मिथ्या से आया है। ये धारणा ग़लत है। अंग्रेज़ी शब्द ‘मिथोलॉजी’ की यूनानी जड़ें हैं – मिथोस (mythos) और लोगोस (logos)। यूनानी शब्द मिथोस का अर्थ “आख्यान” है और लोगोस का अर्थ “शास्त्र” है। इस प्रकार, हम मिथोलॉजी को आख्यान शास्त्र कह सकते हैं। मिथ शब्द की उत्पत्ति भी मिथोस से हुई है, जिस कारण उसका अर्थ भी आख्यान है।

मिथोलॉजी- कुछ लोगों का सच

वैज्ञानिक सच सभी लोगों का सच होता है। हम इस सच तक शंका से शुरू करते हुए पहुंचते हैं और ये प्रमाण एवं मापदंड पर आधारित होता है। इसके विपरीत मिथ अर्थात आख्यान का सरल अर्थ “कुछ लोगों का सच” है, जिससे लोग विश्व को समझने की कोशिश करते हैं। मानवता ने हमेशा से अपने अस्तित्व के बारे में जानना चाहा है। जीवन कहां से शुरू हुआ, कहां समाप्त होगा; इसका अर्थ क्या है, मृत्यु के बाद क्या होता है; इत्यादि प्रश्नों से हम शुरू से जूझते आए हैं। इनका उत्तर देने के लिए आख्यानों का जन्म हुआ और ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी बताए गए। इन्हें हम फ़ैंटसी (fantasy) नहीं कह सकते हैं क्योंकि आख्यान संस्कृति को जोड़ने का काम करता है। आख्यान विश्वास वाला सच है, जो शब्द प्रमाण अर्थात भक्ति पर आधारित होता है। यहां शंका की बात आती ही नहीं है।

ध्यान में रहें कि आख्यान, उपन्यास से अलग है, क्योंकि उपन्यास काल्पनिक अर्थात फ़िक्शनल (fictional) होता है और इसलिए किसी के लिए सच नहीं होता है। आख्यान के विपरीत उपन्यास किसी समुदाय का सच नहीं होता है।

परमात्मा में विश्वास और अविश्वास दोनों मिथोलॉजी हैं

विश्व में परमात्मा में विश्वास करने वाले और उनमें विश्वास न करने वाले दोनों तरह के लोग होते हैं। देखा जाएं, तो ये दोनों धारणाएं मिथोलॉजी का भाग हैं, क्योंकि दोनों प्रमाण पर नहीं, बल्कि विश्वास पर आधारित हैं। विश्व में अलग-अलग मान्यताओं से विभिन्न कहानियां उभरीं हैं, जिन्हें हम मिथ या आख्यान कहते हैं। और इन आख्यानों के माध्यम से विश्व में तरह-तरह की मान्यताएं फैलीं हैं। जैसे की मध्य-आशिया में एकदेववाद और पैग़ंबर परंपरा  प्रचलित हुई; जिससे यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म का उगम हुआ और वे विश्वभर में फैलें।

रामायण और महाभारत इतिहास हैं

भारत में बहुदेववाद प्रचलित हुआ। यहां पुनर्जन्म पर आधारित हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों का उगम हुआ। आख्यानों से पुनर्जन्म, कर्म, धर्म, माया, मोक्ष इत्यादि धारणाएं जन-साधारण तक पहुंची। आख्यानों के महाकाव्य रामायण और महाभारत को इतिहास कहा जाता है। लेकिन संस्कृत शब्द इतिहास का अर्थ, हिंदी शब्द इतिहास से कुछ अलग है। आइए संस्कृत शब्द इतिहास का अर्थ समझते हैं। रामायण और महाभारत इतिहास इसलिए कहलाते हैं कि उनके लेखक उन घटनाओं के समय उपस्थित थे। वाल्मीकि ने रामायण में भाग लिया, इसलिए उनकी रचना को हम इतिहास कहते हैं। व्यास ने महाभारत की घटनाओं में भाग लिया, उन्होंने अंबिका और अंबालिका के साथ संबंध रखा। इस तरह महाभारत उनके बच्चों की कहानी है। महाभारत को भी हम इतिहास कहते हैं। लेकिन पुराणों में ऋषियों ने उन घटनाओं में भाग नहीं लिया, उन्होंने इन कथाओं को केवल सुना था। इसलिए उन्हें हम इतिहास नहीं कहते हैं।

युग के भीतर और बाहर की कहानियां

हिंदू धर्म की कहानियों को हम दो भागों में बांट सकते हैं – वे कहानियां जो एक निर्धारित समय में, अतः किसी युग में हुईं और वे जो समय की सीमा, अतः युगों के परे हैं। द्वापर युग में श्री कृष्ण की कहानी, त्रेता युग में श्री राम की कहानी, और कलियुग में कल्कि की कहानी इस श्रेणी की कहानियां हैं। इसके विपरीत, शिव और शक्ति की कहानियां युग के भीतर नहीं बल्कि उसके बाहर हुईं। वे देश, काल और गुण से नहीं जुड़ीं हैं। इसलिए ये कहानियां सनातन हैं। शिव-पुराण और विष्णु-पुराण की कहानियां इनके कुछ उदाहरण हैं। ध्यान रहें कि विष्णु के अवतारों की कहानियां युगों के भीतर की हैं। इन कहानियों की रचना पाश्चात्य, अरबी और फ़ारसी कहानियों में अलग है। भारत में दिगम्बर परंपरा और पाश्चात्य देशों में पैग़ंबर परंपरा है। पैग़ंबर परमात्मा का पैग़ाम लेकर आते हैं। पैग़ंबर की धारणा पाश्चात्य, अरब और फ़ारसी देशों की सच्चाई है, वे पूरे विश्व की सच्चाई नहीं है। दिगम्बर परंपरा के अनुसार परमात्मा अंतरात्मा हैं, हमारे भीतर हैं। इस प्रकार ये भारत की सच्चाई है, पूरे विश्व की सच्चाई नहीं है।

इतिहास और इतिहास पर आधारित उपन्यास में अंतर

पढ़ने में रूचि रखने वाले लोग विज्ञान और विज्ञान पर आधारित उपन्यास में अंतर जानते हैं। वे इतिहास और इतिहास पर आधारित उपन्यास में भेद समझते हैं। उदाहरण देना हो तो बाजीराव पेशवा और तानाजी जैसे लोग इतिहास में जीवित रहें पात्र हैं। लेकिन बॉलीवुड द्वारा उनपर बनाईं गईं फ़िल्में काल्पनिक फ़िल्में हैं जिनका इतिहास के साथ बहुत कुछ लेना-देना नहीं होता है। इसके बावजूद, जन-साधारण धीरे-धीरे इन काल्पनिक विवरणों को सच मानने लगते हैं। वे मानने लगते हैं कि अलाउद्दीन खिलजी को जैसे पद्मावत फ़िल्म में दर्शाया गया है वही सच है।

आख्यान शास्त्र और आख्यान पर आधारित उपन्यास में अंतर

अब आख्यान शास्त्र और आख्यान शास्त्र पर आधारित उपन्यास के उदाहरण जानते हैं। मेरी पुस्तक, ‘द प्रेग्नेंट किंग’ आख्यान शास्त्र पर आधारित एक उपन्यास है। इसमें मैंने कल्पना पर आधारित नईं कहानियां बुनी हैं। इस तरह के उपन्यासों में लेखक न्यायाधीश की तरह पात्रों को तौलकर उनपर निर्णय सुनाता है। मेरी पुस्तक, ‘शिव से शंकर तक’ आख्यान शास्त्र का उदाहरण है। इसमें मैंने मूल कहानी का पुनर्लेखन और उसका विश्लेषण किया है, यह समझने की कोशिश में कि मूल लेखक क्या कहना चाह रहा है। यहां लेखक पात्रों पर कोई निर्णय नहीं सुनाता है।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।