क्या मैं बच्चे को जन्म दूं?

क्या मैं बच्चे को जन्म दूं?

यदि तुम इसे जन्म देने से बच सको तो अच्छा होगा। जब लोग पूछते हैं तब वे मेरे लिए मुश्किल खड़ी करते हैं।

अगर मैं मना करता हूं तो ऐसा लगता है जैसे मैं तुम्हारे मां बनने की इच्छा को ठेस पहुंचा रहा हूं। अगर मैं हां कहता हूं तो फिर निश्चय ही, मुश्किलें होंगी, जिम्मेदारियां होंगी और तुम उलझन में पड़ सकती हो। सबसे बढ़िया होगा कि तुम अभी कुछ समय तक अकेली रहो। पहले स्वयं के ऊपर तुम जो काम कर रही हो उसे पूरा करो। जब तुम उस स्थिति में आओगी जहां तुम्हें पता चलेगा कि अब तुम्हें कुछ भी विचलित नहीं कर सकता, तब फिर बच्चे पैदा करना बिल्कुल ठीक रहेगा। फिर तुम उनकी सहायता कर सकोगी; तुम सच्चे अर्थों में मां बनोगी।

अभी तो तुम्हें ही मां की ज़रुरत है और तुम उन्हें वे सब बीमारियां दोगी जो तुम अंदर पाल रही हो। एक मनोवैज्ञानिक ने उन बीमारियों को, जो मां-बाप अपने बच्चों को देते हैं, कहा है, ‘एन डी डी:’ न्यूरोसिस, डिज़ीज, डिप्रैशन। यही लोग देने वाले हैं। देने को कुछ और है ही नहीं। रुक जाओ। थोड़ा रुक जाओ तो बहुत अच्छा होगा। न्यूरोसिस और तुम्हारे मन की सारी कुंठाएं, यही तो समस्याएं हैं। तुम बच्चे को पालोगी और जो तुम्हारे भीतर है, उसे बच्चे में उंडेल दोगी। पहले थोड़ा आनंदपूर्ण हो जाओ।

ओशो, दि ओपन सीक्रेट, प्रवचन #16 से उद्धृत

ओशो को आंतरिक परिवर्तन यानि इनर ट्रांसफॉर्मेशन के विज्ञान में उनके योगदान के लिए काफी माना जाता है। इनके अनुसार ध्यान के जरिए मौजूदा जीवन को स्वीकार किया जा सकता है।

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