क्या चंद्र का मातृत्व से भी नाता है?

आज मदर्स डे के दिन हम विश्वभर सभी माँओं और मातृत्व का सम्मान करते हैं। आइए देखें कैसे विश्वभर में चंद्र मातृत्व और अन्य विश्वासों से जुड़ें हैं।

यूनानी आख्यान शास्त्र में सूर्य को अपोलो नामक गॉड और चंद्र को आर्टेमिस नामक गॉडेस माना जाता है। दोनों भाई-बहन हैं। एज़्टेक सभ्यता यूनानी सभ्यता के पतन के लगभग हज़ार वर्ष बाद, उससे हज़ारों मील दूर, अटलांटिक महासागर के पार, दक्षिण अमेरिका में पनपीं। उसमें भी कुछ ऐसी ही मान्यता थी – सूर्य हुइत्ज़इलोपोचली नामक गॉड और चंद्र कोयोलशाओक्वी नामक गॉडेस हैं और दोनों भाई-बहन हैं। पूर्व-इस्लामी अरब में भी चंद्र को गॉडेस माना जाता था। चीन में सूर्य को यांग और चंद्र को यिन माना जाता है।

चंद्र को नारीत्व के साथ जोड़ना तर्कसंगत लगता है। प्राचीन काल के लोगों के ध्यान में आया था कि दो पूर्णिमाओं के बीच की अवधि और स्त्री के मासिक धर्मों के बीच की अवधि लगभग एक थी। फलस्वरूप, स्त्री और चंद्र को एक सांतत्यक का भाग मानकर चंद्र को गॉडेस माना गया। अर्धचंद्र को कुंवारी, पूर्णचंद्र को कुल-माता और अमावस्या के चंद्र को बुढ़िया माना गया। पितृसत्ता के उभरने के साथ, स्वभावतः चंद्र के साथ जुड़ीं सभी चीज़ें शैतानी मानी जाने लगीं।

यूरोप में रोमीय साम्राज्य ने ईसाई धर्म अपनाया। इस साम्राज्य के पतन के पश्चात ईसा सूर्य के साथ जोड़ें जाने लगें और संडे ईसा का दिन माना जाने लगा। दूसरी ओर जादू-टोना करने वाले लोग चंद्र को बहुत महत्त्व देते थे। इसलिए, उन्हें शैतान उपासक मानकर उनकी निंदा की गई। दुष्ट जीवों की कहानियों को चंद्र के आवर्तनों के साथ जोड़ा गया। इन कहानियों के अनुसार लोग पूर्णिमा की रात भेड़मानस बनते थे और सूर्यास्त के पश्चात चंद्रोदय के साथ पिशाच जाग जाते थे।

विश्वभर की संस्कृतियों की ज्योतिष में, चंद्र को हमेशा भावनाओं, अचेत आदतों, लयों, स्मृतियों और भावों जैसी स्त्रैण चीज़ों के साथ जोड़ा गया है। वह माता और मातृ वृत्ति के साथ भी जोड़ा गया है। चंद्र की बढ़त और उसके क्षय के जैसे हम भी अच्छी और बुरी मनोदशाओं के बीच झूलते हैं। कुछ लोगों की मनोदशा इतने जल्दी बदलती है कि उन्हें लूनाटिक (lunatic) अर्थात पागल कहते हैं। लूनाटिक लूना (luna) शब्द से उत्पन्न हुआ है। लैटिन भाषा में लूना चंद्र के लिए शब्द है।

भारत में चंद्र को पहले से ही देवी नहीं बल्कि एक आकर्षक और प्रेममय देवता माना गया है। वे हमेशा नक्षत्रों के साथ मस्ती-मज़ाक करते रहते थे। उन्हें सोमदेव भी कहा जाता है, क्योंकि उनकी बढ़त और उनके क्षय से धरती के तरल पदार्थों में भी उतार-चढ़ाव होता है। समुद्र की लहरों का निर्माण इसका सबसे दृश्य प्रभाव है।

संभवतः, सोमदेव का अधिक सूक्ष्म प्रभाव पौधों के रस पर होता है। इसलिए, वे वनस्पति के स्वामी हैं। सोमरस पीने से मनोदशा में वृद्धि होती है। इसलिए, वैदिक काल में सोम नामक जड़ी बूटी सबसे मूल्यवान थी। चंद्रदेव मृग समान चंचल हैं। इसलिए, कला में उन्हें हमेशा हाथ में सोम की जड़ी बूटी पकड़ें हुए और मृग पर बैठें हुए दिखाता जाता है। नेपाली कला में वे हंसों द्वारा खींचे गए रथ पर सवार होते हैं।

वैदिक काल में, आकाश को 28 भागों में विभाजित किया जाता था। 27 भागों में नक्षत्र नामक देवियां निवास करती थी। वे दक्ष प्रजापति की पुत्रियां थी और सबका विवाह चंद्रदेव से करवाया गया था। लेकिन चंद्रदेव को केवल रोहिणी नामक नक्षत्र के साथ समय बिताना पसंद था। इसलिए रोहिणी की बहनों ने उनके बारे में अपने पिता से शिक़ायत की। क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्र को शाप दिया कि उन्हें क्षय-रोग होगा।

भयभीत होकर चंद्र ने शिव से प्रार्थना की। तब शिव ने चंद्र को अपनी ललाट पर रखा। चंद्र तुरंत फिर से बढ़ने लगें। और तब से, शिव को सोम-शेखर इस नाम से जाना जाने लगा, क्योंकि उन्होंने अर्धचंद्र को अपनी ललाट पर रखकर उन्हें बचाया था।

फिर दक्ष ने घोषणा की कि चंद्र को प्रत्येक पत्नी के साथ एक दिन बिताना होगा। इसलिए, रोहिणी की दिशा में जाते समय चंद्र प्रतिदिन बढ़ने लगें और उनसे दूर जाते समय उनका प्रतिदिन क्षय होने लगा। अमावस्या के दिन, जब चंद्र अदृश्य होते थे, तब वे किसी भी पत्नी के साथ नहीं होते थे। सभी बहनों ने फिर से शिक़ायत की कि उनके पति अपने सबसे आकर्षक रूप में केवल अपनी प्रिय पत्नी, रोहिणी, के साथ रहते थे। इसलिए, दक्ष ने घोषणा की कि आकाश हिलता रहेगा। इसलिए, अब पूर्णिमा के दिन, चंद्र अलग-अलग नक्षत्रों के साथ होते हैं, न कि केवल रोहिणी के साथ।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।