कर्ण में नायक के सभी गुण होते हुए भी उसकी मां, उसके भाइयों, उसके गुरू, यहां तक की भगवान ने भी उसे नायक बनने नहीं दिया। इसलिए उसके प्रति एक तरह की सहानुभूति का होना स्वाभाविक है।
उसके जन्म की कहानी तो सभी जानते हैं – राजकुमारी कुंती ने एक जादुई मंत्र पाया था, जिसके प्रयोग से उसने सूर्यदेव का आवाहन किया और उनसे पुत्र प्राप्त किया। कुंती को डर था कि अविवाहित होने के कारण उसकी बदनामी होगी। इसलिए उसने इस पुत्र को जो दिव्य कवच और दिव्य कुंडल पहनकर जन्मा था, टोकरी में रखकर नदी में छोड़ दिया। एक सारथी ने इस बच्चे को बचा लिया। इस प्रकार कर्ण जो राजकुमारी का पुत्र और क्षत्रिय था, शूद्र बनकर बड़ा हुआ।
बड़े होते कर्ण ने अपनी नियति को बदलने की ठान ली। वह जानता था कि वह योद्धा था। आख़िर वह कवच के साथ जो जन्मा था। वह द्रोणाचार्य से मिला, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया यह कहकर कि वह क्षत्रिय वर्ण का नहीं था। ग्रंथों के अनुसार किसी व्यक्ति का वर्ण पिता के वर्ण पर निर्भर होता है। क्या कर्ण सारथी का बेटा था, जिसने उसकी परवरिश की थी, सूर्यदेव का बेटा था, जिन्होंने उसकी मां को गर्भवती बनाया था, या पांडु का बेटा था, जिन्होंने उसकी मां से विवाह किया था?
महाभारत में पांडवों के पिता कौन थे, इसपर बहुत चर्चा हुई। क्या पांडु उनके पिता थे? या उनकी मांओ को गर्भवती बनाने वाले देवता उनके पिता थे? या फिर क्या भीष्म और विदुर को उनके पिता कहना चाहिए, जो वास्तव में उनके पालक पिता थे? अंत में यह निष्कर्ष निकाला गया कि चूंकि पांडु ने पांडवों की मांओ से विवाह किया था, उन्हें उनका पिता कहा जाना चाहिए। लेकिन क्या कुंती का बेटा, कर्ण, भी एक पांडव था? यदि हां तो कर्ण पांडवों में ज्येष्ठ और पांडव संपत्ति का सच्चा उत्तराधिकारी बन जाता था। कृष्ण का यही मानना था।
द्रोण की अस्वीकृति के बाद कर्ण परशुराम का शिष्य बना, जो क्षत्रियों के अलावा सभी को युद्ध-विद्या सिखाने के लिए तैयार थे। लेकिन कुछ ही दिनों में उन्हें पता चला कि कर्ण तीव्र पीड़ा शांति से सहन कर लेता था। इससे वे समझ गए कि कर्ण जन्म से क्षत्रिय था। धोखा दिए जाने पर क्रोधित होकर उन्होंने कर्ण को शाप दिया, “युद्ध में निर्णायक क्षण पर तुम मुझसे सीखा ज्ञान भूल जाओगे।”
निराश होकर कर्ण घर लौटा। आंध्र प्रदेश की एक लोककथा के अनुसार, रास्ते में उसे एक लड़की रोती हुई दिखाई दी। उसका दूध का मटका फिसलकर दूध धरती पर गिर गया था। कर्ण ने मिट्टी को निचोड़कर दूध फिर से मटके में लौटा दिया। लड़की ख़ुशी-ख़ुशी घर लौटी, लेकिन धरती मां कर्ण से नाख़ुश थी। उन्होंने सौगंध खाई कि एक दिन वे भी कर्ण को निचोड़कर उसकी मृत्यु का कारण बनेंगी।
स्वयं धरती मां की अस्वीकृति के बाद कर्ण ने ठान लिया कि वह समाज में अपने गुणों के आधार पर ही अपनी जगह बनाएगा। उसने हस्तिनापुर में भीष्म द्वारा आयोजित धनुर्विद्या की प्रतियोगिता में भाग लिया। भीष्म पांडवों और कौरवों के कौशल का प्रदर्शन करना चाहते थे, लेकिन प्रतियोगिता में कर्ण विजयी रहा। कौन था ये योद्धा? कुंती उसका कवच और कुंडल देखकर उसे पहचान गई, लेकिन उसने अपना रहस्य अपने पास ही रखा। तब, अपने बेटे की जीत की ख़ुशी में कर्ण के सारथी पिता रणभूमि के बीच दौड़ें और उससे गले मिल गए। सभी प्रेक्षक दंग रह गए – कर्ण योद्धा नहीं बल्कि मामूली सारथी था। इसके बाद कर्ण को हमेशा के लिए सारथियों के साथ जोड़ा गया।
पांडवों द्वारा नकारे जाने के बावजूद कौरवों ने उसे स्वीकारा। दुर्योधन ने उसे अंग देश का राजा घोषित किया। कर्ण दुर्योधन का सदा के लिए आभारी रहा। दुर्योधन और कर्ण सबसे अच्छे मित्र बन गए। लेकिन हम दावे से नहीं कह सकते कि क्या उनकी मित्रता सच्ची थी या वे आपसी सुविधा के लिए मित्र बन गए। कर्ण के राजसी पद को किसी ने महत्त्व नहीं दिया। सभी के लिए वह सूत-पुत्र ही था। यह तब स्पष्ट हुआ जब सभी राजकुमार द्रौपदी के स्वयंवर में भाग लेने गए थे।
कर्ण के धनुष उठाने से पहले ही द्रौपदी ने ठहराया कि कर्ण उसका पति बनने के लिए अयोग्य था। द्रौपदी का मानना था कि कर्ण सारथी होने के कारण निचले वर्ण का था। यह संभव है कि सबकी उपस्थिति में हुए इस अपमान के कारण कर्ण ने द्रौपदी का वस्त्रहरण होने से नहीं रोका। और यही कारण है कि कृष्ण ने कर्ण और अन्य कौरवों के विरुद्ध प्रतिशोध लिया कि वे असहाय व्यक्तियों की मदद नहीं करते थे।
दुर्योधन आश्वस्त था कि कर्ण हमेशा उसका साथ देगा, जिस कारण उसने ढीठता से पांडवों को उनके हिस्से की संपत्ति से वंचित किया। जब युद्ध की घोषणा हुई, तब कृष्ण ने कर्ण को पांडवों की ओर से लड़ने के लिए लुभाने का प्रयास किया, लेकिन कर्ण दुर्योधन के प्रति निष्ठावान रहा। तब कृष्ण के कहने पर कुंती ने कर्ण को उसके जन्म का सच बताया। सच जानकर कर्ण दंग रह गया। फिर भी उसने कौरवों का साथ छोड़ने से इंकार किया। उसने कुंती को वचन दिया कि अर्जुन को छोड़ वह किसी भी पांडव का वध नहीं करेगा।
कर्ण दान देकर पुण्य और प्रसिद्धि कमाना चाहता था। कृष्ण ने उसकी इस प्रवृत्ति का फ़ायदा उठाते हुए इंद्र को कर्ण से उसका कवच मांगने के लिए कहा। कर्ण ने ख़ुशी से कवच दान में दे दिया। कर्ण की दान के प्रति प्रतिबद्धता से इंद्र प्रसन्न हुए। उन्होंने कर्ण को एक भाला दिया, जिसका अचूक निशाना था लेकिन जिससे केवल एक बार वार किया जा सकता था।
कर्ण ने उसे अर्जुन के लिए बचाए रखा, लेकिन कृष्ण ने कर्ण को भाले को घटोत्कच पर चलाने के लिए विवश किया। जब अंत में अर्जुन और कर्ण आमने-सामने आए, तब कृष्ण के कहने पर धरती मां ने कर्ण के रथ का पहिया जकड़ लिया। कर्ण ने जादुई मंत्र से पहिया छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन ठीक उसी समय परशुराम के शाप के कारण वह मंत्र भूल गया। हताश होकर उसने अपना धनुष पटक दिया और रथ से कूदकर ख़ुद पहिया छुड़ाने लगा। तब कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि कर्ण उतना ही असहाय था, जितना की द्रौपदी थी जब कौरव उसका वस्त्रहरण कर रहें थे। कर्ण सहित कौरवों ने उसकी मदद नहीं की थी और कृष्ण ने अर्जुन से भी निर्मम बनकर कर्ण पर वार करने के लिए कहा।
कर्ण की पीठ अर्जुन की ओर होने के कारण वह असहाय था। फिर भी अर्जुन ने बाण चलाकर कर्ण का वध किया। कृष्ण ने इतनी निर्दयता से कर्ण का वध क्यों करवाया? विद्वान मानते हैं कि ऐसा करके भगवान ने कार्मिक संतुलन बनाए रखा। कृष्ण भगवान अपने पहले जन्म में राम थे। राम ने सूर्यदेव के पुत्र सुग्रीव का समर्थन किया था। जब सुग्रीव की अपने भाई और इंद्रदेव के पुत्र बाली से लड़ाई हुई, तब राम ने बाली को पीठ पर धनुष से वार करके मार डाला था। इसलिए जब भगवान ने कृष्ण के रूप में जन्म लिया, तब उनका इस स्थिति को उलटना ज़रूरी था। इसलिए कृष्ण ने इंद्रदेव के पुत्र अर्जुन का समर्थन किया और सूर्यदेव के पुत्र कर्ण का वध करवाया। इससे हमें यह सीख मिलती है कि जिसे एक जन्म में भगवान की कृपादृष्टि प्राप्त हुई वह उसने अगले जन्म में खो दी। और इसी प्रकार कर्म का लेखा-जोखा संतुलित रहा।
देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।
