कला वस्तु को पूजनीय बनाना

किसी कला वस्तु को पूजनीय बनाने हेतु एक विशिष्ट अनुष्ठान के माध्यम से देवत्व को उस वस्तु में निवास करने का ‘आवाहन’ किया जाता है। इस अनुष्ठान को ‘प्राण-प्रतिष्ठा’ या ‘चक्षु-दान’ भी कहते हैं।

कला वस्तुएं हमारे घरों की शोभा बढ़ाती हैं। इसलिए, हमारे दैनिक जीवन में उनका विशेष स्थान है। लेकिन पूज्य वस्तुएं अलग होती हैं, क्योंकि उनके माध्यम से हम परमात्मा तक पहुंचते हैं। हालांकि दोनों प्रकार की वस्तुओं में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं हो सकती हैं, दोनों का अलग महत्त्व होता है। यह अंतर क्यों?

किसी कला वस्तु को पूजनीय बनाने हेतु एक विशिष्ट अनुष्ठान के माध्यम से देवत्व को उस वस्तु में निवास करने का ‘आवाहन’ किया जाता है। इस अनुष्ठान को ‘प्राण-प्रतिष्ठा’ या ‘चक्षु-दान’ भी कहते हैं। इस अनुष्ठान से कला वस्तु पूजनीय वस्तु में बदलकर आगामी अनुष्ठान का भाग बन जाती है।

अनुष्ठान में प्रयोग किए जाने वाले कलश, घंटा और बर्तन के साथ भी यही किया जाता है। कोई हिंदू अनुष्ठान शुरू करने से पहले पंडित इन वस्तुओं की पूजा करते हैं। इस अनुष्ठान से वह सांसारिक वस्तु पवित्र बनकर उसमें दैवी ऊर्जा बहने लगती है। अब वह अनुष्ठान का भाग बन जाती है और उसे पूजा भी जाता है।

अनुष्ठान के अंत में ‘विसर्जन’ के अनुष्ठान से देवता से विनती की जाती है कि वे पूजनीय वस्तु छोड़ दें। इससे पूजनीय वस्तु फिर से कला वस्तु बन जाती है। चूँकि जीवन शक्ति उसमें से बह गई है इसलिए यह माना जाता है कि वह लगभग शव की तरह है। जैसे शव का दहन किया जाता है वैसे यह माना जाता है कि उस पूजनीय वस्तु पर अन्य अनुष्ठानों का प्रभाव भी चला गया है।

यह एक वैदिक प्रथा है। वैदिक काल में अनुष्ठान के अंत में संपूर्ण यज्ञ शाला जलाई जाती थी। आज भी पूजा के अंत में उसमें प्रयोग किए गए फूल और मिट्टी के बर्तन पानी में विसर्जित या दान में दिए जाते हैं।

भारतभर के गांवों में कुछ चट्टान वर्षभर यूं ही पड़ें रहते हैं और अचानक किसी विशिष्ट दिन पूजनीय बन जाते हैं। लोग उन्हें सुगंधित जल से धोते हैं तथा हल्दी और फूलों से सुसज्जित करते हैं। मंदिरों का उगम यही से हुआ। इनमें से कुछ चट्टान मंदिरों के भीतर होते थे जैसे उत्तराखंड के बद्रीनाथ और ओडिशा के लिंगराज मंदिरों में। उन्हें स्वयंभू माना जाता है।

लगभग 1500 वर्ष पहले देवताओं की प्रतिमाएं पत्थरों और धातुओं में तराशी जाने लगीं। इसका वर्णन आगम साहित्य में पाया जाता है। यह साहित्य दक्षिण भारत में अधिक प्रसिद्ध है। ‘मूल-विग्रह-मूर्ति’ एक प्रकार की मूर्ति है। यह पत्थर की विशेष मूर्ति है, जो मंदिर के गर्भगृह में रखी जाती है। प्रतिदिन अनुष्ठान करके उसे पवित्र बनाया जाता है। ‘उत्सव-मूर्ति’ एक अन्य प्रकार की मूर्ति है जो धातु से बनाई जाती है। उसे धार्मिक जुलूसों में ले जाया जाता है।

दोनों प्रकार की मूर्तियां धर्मनिरपेक्ष कला वस्तुएं हो सकती हैं। लेकिन जब उन्हें पवित्र बनाया जाता है, तब वे देवता का ‘स्वरुप’ बन जाती हैं। फिर, उन्हें मंदिर में रखकर भोजन देना, सुसज्जित करना, मनोरंजित करना यहां तक कि सुलाना भी अपेक्षित है, मानों वे एक जीवित व्यक्ति हों।

हिंदू कला को अन्य धर्मों के संदर्भ में समझना भी महत्त्वपूर्ण है। हिंदू मंदिर एक ऐसी जगह है जहां देवता निवास करते हैं और श्रद्धालु उन्हें मिलने जाते हैं। यह मान्यता है कि देवता सजीव और सचेतन होते हैं। इसलिए, उनका ‘दर्शन’ करते हुए न केवल हम उन्हें देखते हैं बल्कि वे भी हमें देख और सुन सकते हैं। देवता नींद से उठते हैं, सो जाते हैं, भोजन करते हैं और सुंदर कपड़ें पहनते हैं। उन्हें कला वस्तुएं पसंद होती हैं, और नांव में घूमना तथा झूले पर झूलना भी पसंद है। देवता का मानवीकरण हिंदू समारोहों का महत्त्वपूर्ण भाग है।

इसके विपरीत, गिरिजाघर और मस्जिद ऐसी जगहें हैं जहां लोग इकठ्ठा होकर प्रार्थना के माध्यम से परमात्मा में अपनी श्रद्धा की पुष्टि करते हैं। वहां परमात्मा को देखने कोई नहीं जाता है। हालांकि गिरिजाघरों में पैग़ंबरों, राजाओं, परमात्मा और फ़रिश्तों की प्रतिमाएं होती हैं, वे केवल अलंकरण और शिक्षा के लिए होती हैं। मस्जिदों में पेड़-पौधों, प्राणियों और मनुष्यों को कल्पित करना सख्त मना है। इसलिए, इस्लाम में प्रतिमाएं और कला केवल सुलेखन और ज्यामितीय रूपों तक ही सीमित हैं।

संग्रहालयों में कला वस्तुएं होती हैं। उन्हें अनुष्ठानों से जीवित नहीं किया जाता है। यह इसलिए कि जीवित करने पर मूर्ति को प्रतिदिन नहलाना, सुसज्जित करना, भोजन देना और मनोरंजित करना अपेक्षित है। संग्रहालय यह प्रतिदिन नहीं कर सकते हैं। इसलिए वे इन कला वस्तुओं को कला वस्तुएं ही रहने देते हैं।