जागरण और विश्रांति

जागरण और विश्रांति

तुम हमेशा या तो अतीत की बात सोचते हो या भविष्य की, और वर्तमान से चूकते हो जो कि एकमात्र यथार्थ है। उससे तनाव पैदा होगा

पहला चरण: प्रति दिन सजगता

“प्रति दिन सामान्य क्रियाओं के बारे में सजग रहना सीखो, और जब अपनी सामान्य क्रियाएं कर रहे हो तब रिलैक्स रहो। तनाव लेने की कोई जरूरत नहीं है। जब तुम फर्श को धो रहे हो, तब तनावपूर्ण होने की क्या जरूरत? या जब तुम खाना बना रहे हो तब तनाव पूर्ण होने की क्या जरूरत? जीवन में एक भी मौका ऐसा नहीं है जिसमें तुम्हारे तनाव की जरूरत है। यह सिर्फ तुम्हारी बेहोशी और तुम्हारे अधैर्य के कारण होता है।

मुझे तो कभी तनाव का कारण नहीं मिला; और मैंने हर तरह से जीवन जीया है, हर तरह के लोगों के साथ जीया है। मुझे हमेशा हैरानी होती है कि ये लोग तनाव ग्रस्त क्यों हैं? लगता है तनाव का किसी बाह्य घटना से कोई संबंध नहीं है, उसका तुम्हारे अंतस से संबंध है। तुम हमेशा बाहर बहाना ढूंढ लेते हो क्योंकि यह इतना मूर्खतापूर्ण लगता है कि कोई कारण नहीं है और तुम तनाव पूर्ण हो। इसे तर्क संगत बनाने के लिए तुम बाहर कोई कारण ढूंढ लेते हो अपने तनाव का। लेकिन कारण बाहर नहीं है, वह तुम्हारी गलत जीवन शैली में है।    

दूसरा चरण: स्वयं का स्वीकार करो

तुम हमेशा प्रतिस्पर्धा में जीते हो जिससे तनाव पैदा होगा। तुम सतत तुलना में जीते हो जिससे तनाव पैदा होगा ही। तुम हमेशा या तो अतीत की बात सोचते हो या भविष्य की, और वर्तमान से चूकते हो जो कि एकमात्र यथार्थ है। उससे तनाव पैदा होगा। अपनी प्रतिभा की खोज करो। प्रकृति कभी एक भी व्यक्ति को बिना किसी अनूठे उपहार के नहीं भेजती। सिर्फ थोड़ी सी खोज…। तुम्हारे भीतर जो भी गुणवत्ताएं, जो भी प्रतिभाएं हैं, उनका पूरी तरह उपयोग करो और जो ऊर्जा तनावों में उलझी हुई है वह तुम्हारा सौंदर्य, तुम्हारा प्रसाद बन जाएगी।

चरण तीन: प्रेम के कलाकार बनो

तुम जो भी कर रहे हो उसे इतने प्रेम से करो, इतनी सावधानी से करो कि दुनिया की छोटी सी बात भी एक कलाकृति बन जाए। वह तुम्हें अपूर्व आनंद से भर देगी। और वह एक ऐसी दुनिया बनाएगी जिसमें प्रतिस्पर्धा नहीं है, तुलना नहीं है। वह हर व्यक्ति को गरिमा प्रदान करेगी। वह उनके स्वाभिमान को वापिस लौटाएगी जिसे धर्मों ने नष्ट कर दिया है। समग्रता से किया गया कोई भी कृत्य तुम्हारी प्रार्थना बनता है।

ओशो: दि हिडन स्प्लेण्डर/ # 11 से उद्धृत 

ओशो को आंतरिक परिवर्तन यानि इनर ट्रांसफॉर्मेशन के विज्ञान में उनके योगदान के लिए काफी माना जाता है। इनके अनुसार ध्यान के जरिए मौजूदा जीवन को स्वीकार किया जा सकता है।

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