ईरान के आर्य

ईरान आर्यन का फ़ारसी शब्द है और ईरानवासी मानते हैं कि वे ही आर्य हैं। इस्लाम के आने से पहले ईरान ज़रथूस्ट्राई था। ज़रथूस्ट्राई धर्म विश्व का सबसे प्राचीन एकेश्वरवादी धर्म है।

प्राचीन काल के हिंदू अपने आप को आर्य और अपनी भूमि को आर्या-वर्त कहते थे। मनुस्मृति के अनुसार आर्या-वर्त उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैला था। लेकिन मनुस्मृति में एक और आर्य समुदाय का उल्लेख नहीं है, जो उसी समय ईरान में रहता था। वास्तव में, ईरान आर्यन का फ़ारसी शब्द है और ईरानवासी मानते हैं कि वे ही आर्य हैं। इस्लाम के आने से पहले ईरान ज़रथूस्ट्राई था। ज़रथूस्ट्राई धर्म विश्व का सबसे प्राचीन एकेश्वरवादी धर्म है। उसके पवित्र ग्रंथ अवेस्ता के अनुसार अहुरा (असुर) अच्छे हैं और देव बुरे हैं।

इस्लाम के विकास के साथ-साथ अधिकांश अवेस्ता नष्ट किया गया। अवेस्ता में आर्यों की मूल जन्मभूमि, मध्य एशिया, को ‘ऐर्यनेम वाएजा’ अर्थात ‘जहां आर्य फैलें हैं’ कहा गया। यहां यिम (वेदों के यम) जैसे राजाओं ने राज किया। लेकिन फिर यिम घमंडी बनकर मानने लगें कि वे सभ्यता के स्रोत थे, ना कि अहुरा माज़डा। इसके पश्चात उनके राजत्व का अंत हुआ।

ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 14वें सूक्त में उल्लिखित है कैसे मरने वाले पहले मनुष्य यम ने पितरों की भूमि तक मार्ग दिखाया। संभवतः यह सूक्त यम के नेतृत्व में आर्यों के ईरान के बाहर एक नई भूमि (भारत?) तक के प्रवसन को वर्णित करता है। ज़रथूस्ट्र का जन्म 3000 वर्षों से भी पहले मध्य एशिया की आर्य जन्मभूमि में हुआ और उसके पश्चात ज़रथूस्ट्राई धर्म फैला। इसी समय देवों को पूजने वाले बहुदेववादी लोगों ने इन आर्यों से अलग होकर भारत की ओर प्रवसन किया।

आर्य शब्द के लिए सबसे प्राचीन शिलालेखीय प्रमाण पश्चिमी ईरान में पाए जाने वाले 2500 YBP बेहिस्टून शिलालेख में है। उसमें फ़ारसी राजा डरायस द ग्रेट और ज़्कर्कज़ीस को ‘आर्य कुल के आर्य’ (आर्य आर्य चीका) कहकर वर्णित किया गया है। यहां, अहुरा माज़डा को ‘आर्यों के गॉड’ और प्राचीन फ़ारसी भाषा को भी आर्य कहा गया। यह शिलालेख लगभग उसी समय अस्तित्व में आए जब भारत में बुद्ध जीवित थे।

प्राचीन काल के यूनानी मध्य एशिया और सिंधु नदी के बीच के क्षेत्र को ‘आर्याना’ अर्थात ‘आर्यों या ईरानवासियों की भूमि’ कहते थे। प्राचीन अवेस्ता में पाए जाने वाले ईरानी आख्यान शास्त्र के अनुसार अहुरा माज़डा ने भूमि और समुद्र के सकेंद्रित चक्रों से घिरी आर्यों की भूमि निर्मित की। इस भूमि के केंद्र में स्थित पहाड़ से एक विशाल नदी समुद्र तक बहती थी। पहला मनुष्य ‘गायोमार्ट’ का निर्माण नदी के तट पर हुआ। उसने भूख, भय, बीमारी और मृत्यु केवल तब अनुभव किए जब आरिमान (डेविल) ने उनका निर्माण किया। गायोमार्ट का वीर्य सूर्य द्वारा निषेचित हुआ और उससे पहले पुरुष और स्त्री ने जन्म लिया।

ज़रथूस्ट्र गायोमार्ट के वंशज थे। उन्होंने लोगों को अहुरा माज़डा और उनके फ़रिश्तों आमेशा स्पेंटा; यज़ाटा; और संरक्षक आत्माओं, फ़्रवाशी, की आराधना करना और अंगरा मैन्यू और उनके भयानक, हिंसक देव झुंडों से दूर रहना सिखाया। उन्होंने लोगों को बताया कि शुरू में विश्व अच्छी जगह हुआ करती थी, जिस कारण लोगों को अच्छा मार्ग (आशा) अपनाकर बुरा मार्ग (द्रुज) त्यागना चाहिए।

उन्होंने समझाया कैसे मृत्यु के पश्चात अच्छे लोगों के सामने एक चौड़ा पुल प्रस्तुत होगा, जो उन्हें हाउज़ ऑफ़ सॉन्ग (हेवन) ले जाएगा। दूसरी ओर बुरे लोगों के सामने एक संकीर्ण पुल प्रस्तुत होगा जो उन्हें हेल लेकर जाएगा। आग अहुरा माज़डा का प्रतीक था जबकि धुआं अंगरा मैन्यू का प्रतीक था। ज़रथूस्ट्राई लोग यास्ना नामक आग की विधि करते थे, वृषभ और गायों को पूजते थे और होम के पौधे से बनाया पेय गॉड को अर्पण करते थे।

2500 वर्षों से भी पहले ज़रथूस्ट्राई लोगों ने महान फ़ारसी साम्राज्य स्थापित किया। वहां आईं यहूदी जनजातियों ने प्रेममय गॉड, दूषित करने वाले डेविल, महान फ़रिश्तों, हेवन, हेल और जजमेंट जैसी धारणाओं के बारे में पहली बार जाना। यहूदी आख्यान शास्त्र के अनुसार फ़ारसी सम्राट, सायरस द ग्रेट, ने दूसरा यहूदी मंदिर बनाने में मदद की थी। ज़रथूस्ट्राई, यूनानी और रोमीय लोगों में संघर्ष होते रहते थे।

ज़रथूस्ट्राई मुसलमान और रोमीय साम्राज्य ईसाई बनने के बाद भी यह संघर्ष 1000 वर्ष पहले लड़े गए क्रूस युद्धों के रूप में चलता रहा। आज इस संघर्ष ने ईरान और अमरीका के बीच लड़ाई का रूप ले लिया है। ईरान में शिया इस्लाम प्रचलित है। ईरानवासी मानते हैं कि चूँकि वे मूलतः आर्य थे, इसलिए वे इस्लामी विश्व के सच्चे नेता हैं। लेकिन अरब के लोग, जो मुहम्मद पैग़ंबर के वंशज हैं, इस दावे को नकारते हैं।

ईरान में ज़रथूस्ट्राई धर्म के कुछ पूजा स्थल, जिन्हें अगिआरी कहते हैं, अभी भी बचे हैं। लेकिन अधिकांश ज़रथूस्ट्राई अब ईरान के बाहर भारत और पाश्चात्य देशों में रहते हैं। वे भारत लगभग 1000 वर्ष पहले आकर गुजरात में बसें। तब उन्होंने वहां के राजा को वचन दिया कि जैसे शक्कर दूध में मिलती है, वैसे वे भी भारत के लोगों से घुल-मिलकर रहेंगे। स्थानीय लोगों जैसे वे भी सगोत्र विवाह करने लगें, गुजराती बोलने लगें और रंगोली तथा आरती जैसी प्रथाओं का पालन करने लगें। शुरू में वे ग़ैर-हिंदू आर्य थे, वे आर्य जो अल हिंद के बाहर रहते थे। अब वे भारत के पारसी कहलाते हैं, जिनमें ऐसी कुछ आर्य प्रथाएं और यादें अब भी हैं, जो हिंदू धर्मीय कई हज़ार वर्ष पीछे छोड़ आए हैं।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।