हल्दी-कुमकुम-चावल की रस्म से मिली सीख

अनुष्ठानों में देवता को हमेशा पहले हल्दी लगाईं जाती है, फिर कुमकुम और अंत में चावल दिए जाते हैं। इस क्रम का भारतभर में सदियों से ध्यानपूर्वक पालन किया जाता रहा है।

मान लो कि आपकी एक महत्त्वपूर्ण मीटिंग होने जा रही है। आप उस व्यक्ति से पहली बार मिल रहें हों। इसलिए थोड़ा चिंतित होना स्वाभाविक है। मीटिंग अच्छी जाए इसे सुनिश्चित करने के लिए बातचीत कैसे शुरू करें, इत्यादि विचार आपके मन में हैं। संभवतः अतिथियों और देवताओं को आमंत्रित करने की हल्दी-कुमकुम-चावल की रस्म से हम कुछ सीख ले सकते हैं।

हल्दी-कुमकुम की रस्म विवाहित स्त्रियों में लोकप्रिय है। त्योहारों में वे घर में इकट्ठा होकर एक दूसरे पर हल्दी और कुमकुम लगाती हैं। विवाह का आमंत्रण देते समय भी यही किया जाता है। ग्रीटिंग कार्ड पर बहुधा हल्दी और फिर कुमकुम लगाया जाता है ताकि वे शुभ बनें। और कलाइयों पर पीले-लाल रंग की डोरी बांधी जाती है। यह रस्म ऊरवर्ता, विकास, सफलता, धन और शुभता से जुड़ी है।

इस रस्म के क्रम पर ध्यान दें। अनुष्ठानों में देवता को हमेशा पहले हल्दी लगाईं जाती है, फिर कुमकुम और अंत में चावल दिए जाते हैं। इस क्रम का भारतभर में सदियों से ध्यानपूर्वक पालन किया जाता रहा है। अधिकांश अन्य रस्मों की तरह इसका भी कोई तार्किक नहीं बल्कि प्रतीकात्मक कारण है। इस रस्म से अचेतन रूप से कुछ समझाया जा रहा है।

हल्दी का पीला रंग ओजस्वी है। वह सूर्य का रंग है, जिसका प्रकाश आकाश के पार फैलकर धरती तक पहुंचता है। देवता पर हल्दी छिड़कने का उद्देश्य उनकी कृपा और शक्ति को जागृत करना है। हल्दी रोगाणुरोधक है। जैसे देवता दानवों को नष्ट करते हैं वैसे वह रोगाणुओं को नष्ट करती है। कुमकुम का लाल रंग अंतर्निहित ऊर्जा का प्रतीक है। इसलिए, कुंवारी देवियों को लाल साड़ियां पहनाईं जाती हैं। लाल रंग देखकर वर्षा-ऋतु शुरू होने के पहले की लाल उर्वर धरती मन में आती है, जिस धरती से लोग फ़सल की आशा रखते हैं।

चावल खाद्य पदार्थ है, जिससे जीवन को पोषण मिलता है। वह धरती की अंतिम उत्पाद है, और उस प्रक्रिया से बनता है जो धरती पर सूर्य का प्रकाश गिरने से शुरू हुई थी। इस प्रकार, हल्दी, कुमकुम और चावल सूर्य, धरती और खाद्य पदार्थ के प्रतीक हैं। यदि हल्दी, कुमकुम और चावल के माध्यम से श्रद्धालु देवता से जुड़कर उनकी कृपा पाता है, तो संभवतः इस प्रतिरूप की मदद से हम अनजान लोगों से भी सफल बातचीत कर सकते हैं।

हल्दी रोगाणुओं को मारकर शरीर में उष्णता का निर्माण करती है। उसी तरह किसी अनजान व्यक्ति से बातचीत शुरू करते समय सभी नकारात्मक ऊर्जाओं को निकालना आवश्यक है, क्योंकि ये ऊर्जाएं बातचीत को दूषित कर सकती हैं। इस उद्देश्य से उस व्यक्ति में सुरक्षा और सहजता की भावना जगाई जाती है। कोई चुटकुला सुनाना या अपने आप का मज़ाक उड़ाना इसका एक सरल तरीक़ा है। इससे वातावरण हल्का हो जाता है और हम मित्रवत पेश आते हैं। कभी-कभार, केवल मुस्कराना भी काम कर जाता है और बातचीत की अच्छी शुरुआत होती है। इस तरह, किसी अनजान व्यक्ति को हल्दी लगाकर हम कम डरावने और अधिक मानवीय पेश आते हैं।

फिर कुमकुम लगाया जाता है। नकारात्मक ऊर्जा निकालने के पश्चात सक्रिय रूप से सकारात्मक ऊर्जा निर्मित की जाती है। इसे करने का सबसे सरल तरीक़ा उस व्यक्ति की प्रशंसा करना है। प्रशंसा करने से उसे लगता है कि हम उसे ध्यान दे रहें हैं और वह हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। कुमकुम लगाने से व्यक्ति को लगता है कि उसकी प्रशंसा की जा रही है। वह बातचीत में योगदान करने के लिए प्रेरित हो जाता है।

हल्दी और कुमकुम लगाने के बाद ही चावल दिए जाते हैं। यह मुख्य बातचीत है, जिसके लिए आप मिलें थे। हल्दी और कुमकुम लगाने से एक ऐसा वातावरण का निर्माण होता है जहां सभी निश्चिंत महसूस कर पूरा योगदान देने के लिए प्रेरित होते हैं। फिर बातचीत का सफलतापूर्वक निष्कर्ष निकल सकता है।

कई बार, समय की कमी के कारण लोग पहले दो चरण जल्दी में निपटाकर मुख्य बातचीत पर आ जाते हैं। फिर, उनमें बातचीत बस एक अवैयक्तिक प्रक्रिया बन जाती है। वे एक दूसरे को गहराई से जानने का अवसर खो देते हैं।

हल्दी, कुमकुम और चावल अर्पण करने से मनुष्यों में संबंध दृढ़ बनता है। एक सकारात्मक ऊर्जा निर्माण होती है, जिस कारण लोग सहजता से विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। इसलिए, इस रस्म से शुरू की गई बातचीत के परिणाम हमेशा सकारात्मक होते हैं।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।