ग्रामीण तमिल नाडु में योद्धा-देवताओं की विशाल मूर्तियां दिखाई देती हैं। घनी, काली मूछों वाले ये देवता घोड़ों, हाथियों यहां तक की बैलों पर सवार होते हैं, उनके हाथों में हथियार होते हैं और उनके आगे-पीछे स्वान होते हैं। ये मूर्तियां योद्धा-देवता अय्यनार की हैं। कभी-कभार वीरन जैसे अन्य योद्धा उनके साथ होते हैं। ये मंदिर साधारणतः खुले होते हैं और अक्सर पेड़ों के नीचे या तालाबों के पास और हमेशा गांव के छोर पर होते हैं। बाहर की ओर मुड़ें ये मंदिर गांव को विनाशकारी शक्तियों से सुरक्षित रखते हैं।
अय्यनार लोक परंपरा के देवता हैं। उनकी तरह भारत के गांवों में कुल मिलाकर सैंकड़ों देवी-देवता हैं – अपरिष्कृत, शक्तिशाली, सबके चहेते और जिनसे सभी डरते भी हैं। ये देवी-देवता मुख्यधारा के धर्मों के सौम्य और भव्य देवताओं से बहुत अलग हैं। विश्वभर यही देखा जाता है – बस्तियों में अपने-अपने देवता, नायक, भयंकर प्राणी और डीमन से परिपूर्ण स्थानीय आख्यान शास्त्र होते थे। प्राचीन काल में मिस्र से लेकर चीन तक सभी जगहों की बस्तियों में देवत्व की अपनी विशिष्ट समझ हुआ करती थी।
हम परंपरा को मुख्यधारा और ग़ैर मुख्यधारा की परंपराओं में बांट सकते हैं। मुख्यधारा की परंपराएं हमेशा वहां उभरीं जहां सत्ता केंद्रित थी, जैसे शहरों और राजदरबारों में। भारत में ब्राह्मणवाद, बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म और फिर इस्लाम और ईसाई धर्म भी ऐसी परंपराओं में शामिल हुए। ग़ैर मुख्यधारा की परंपराएं गांव की मिट्टी से उभरीं। मुख्यधारा की परंपराएं अपने आप को संगठित करके फैलती आईं हैं; ग़ैर मुख्यधारा की परंपराएं असंगठित रहकर गांव में ही बनी रहीं हैं।
दोनों परंपराओं का एक दूसरे पर बहुत अनोखा प्रभाव होता है। अधिक कर्मकांडी, भावनात्मक और कम बौद्धिक होने के कारण ग़ैर मुख्यधारा की परंपराएं अक्सर अपने आप को अपर्याप्त समझती हैं। इसलिए, वैधता पाने के लिए वे अपने आप को मुख्यधारा की परंपराओं की विचारधाराओं से संरेखित करने का कठोर प्रयास करती हैं। इस प्रयास में स्थानीय देवताओं को शिव, विष्णु या देवी की अभिव्यक्ति या किसी वैदिक ऋषि के अनुयायी माना गया।
केरल में अय्यप्पा का मंदिर अब शिव, विष्णु यहां तक की बौद्धों के साथ भी जुड़ा है। इतना ही नहीं, अय्यप्पा के मुसलमान साथी वावर के माध्यम से अय्यप्पा का अब इस्लाम से भी निकट का संबंध है। इन संबंधों ने इन स्थानीय परंपराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा। तिब्बत में, स्थानीय बॉन देवताओं ने बुद्ध और बोधिसत्त्वों की अभिव्यक्तियों का रूप लिया। यूरोप में भी इसी तरह का आत्मसात्करण देखा गया है। वहां, माना जाता है कि ब्लैक मैडोना एक स्थानीय देवी हैं। उनका पंथ कैथोलिक धर्म की माता मरियम के साथ जोड़ा गया और इस तरह चुनौतियों के बावजूद वह सदियों से जीवित रहा है।
उलटी दिशा में भी प्रभाव देखा गया है। विद्वान मानते हैं कि रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की जड़ें लोक परंपराओं में हैं। बुद्ध द्वारा स्थापित किया गया बौद्ध धर्म बहुत बौद्धिक और विचारशील था। साधारण व्यक्तियों को पेड़-पौधों, चट्टानों और स्पृश्य कलाकृतियों को पूजने की आवश्यकता थी। एक थ्योरी के अनुसार यही कारण है कि बौद्ध स्तूप बनाए गए और उन्हें पूजा गया।
कुछ लोग ग़ैर मुख्यधारा की परंपराओं के लिए ‘पेगन’ शब्द का नकारात्मक रूप में इस्तेमाल करते हैं। यह इसलिए कि ऐसी परंपराओं में बहुधा कोई विचारधारा नहीं होती है न ही उनका कोई संरचित धर्मिक आधार होता है। पेगन शब्द का अर्थ है वह जो अपरिष्कृत और ग्रामीण है। और विश्वभर की पेगन परंपराओं के अध्ययन से हम जीवन में मनुष्यों की सबसे मूल ज़रूरतें समझ जाएंगे।
सभी मनुष्यों की दो मूल आवश्यकताएं होती हैं – पोषण और सुरक्षा। गांव के देवी-देवता इनका मूर्त रूप हैं। ग्राम देवी उर्वरता की देवी हैं, वे वो धरती हैं जो गांव को पोषित करती हैं, वो खेत हैं जहां खाद्य पदार्थ उगाए जाते हैं या वह जंगल या तालाब हैं जहां से जानवर और मछलियों के रूप में हमें खाना मिलता है। सुरक्षा को बहुधा पुरुष रूप दिया जाता है उदाहरणार्थ अय्यनार की तरह। ग्राम देव संरक्षक देव होते हैं जो घोड़े, हाथी, बैल या भैंस पर सवार होकर, हाथों में हथियार लिए गांव की रक्षा करते हैं।
समय के साथ ये विचार और जटिल होते गए और इनमें शारीरिक के साथ-साथ भावनात्मक और बौद्धिक आवश्यकताओं का भी समावेश हुआ। उर्वरता की देवी से पोषण के साथ-साथ अन्य ज़रूरतों की भी पूर्ति होने लगी। और संरक्षण देवता नियम और अनुशासन के रक्षक भी बन गए। दोनों से मिलकर गांव के जीवन को अर्थ मिला।
देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।
