देवों तक पहुंचने का प्रवेशद्वार

अग्नि की मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि हम एकमात्र जीव हैं जिसने अग्नि को वश में किया है।

ऋग्वेद के पहले स्तोत्र के पहले शब्द में अग्निदेव का उल्लेख है। इस प्रकार वे सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण वैदिक देवता हैं। ऋग्वेद में वे यज्ञ के देवता हैं, जिनकी पूजा से लोग समृद्ध बनते हैं, क्योंकि अग्नि ही भूलोक को देवलोक से जोड़ती है। अग्नि से निकला धुआं ऊपर उठकर मनुष्यों के उच्चारे स्तोत्र और उनके अर्पण पदार्थ दैवी विश्व तक ले जाता है। स्वाभावतः अग्नि एक महत्त्वपूर्ण देवता थे, वे देवताओं तक पहुंचने के लिए प्रवेशद्वार थे, एक दूत, जो लौकिक और दैवी विश्वों के बीच मध्यस्थ बनें।

अग्निदेव को दो हाथ, दो सिर और तीन पैरों के साथ कल्पित किया जाता है। उनकी सात तेजस्वी जीभें हैं, जिनसे वे अर्पण किया गया मक्खन चाटते हैं। मेढ़े पर सवार अग्निदेव साधारणतः लाल रंग के होते हैं। वे इंद्र के जुड़वां हैं। ऋग्वेद के 20 प्रतिशत स्तोत्र उन्हें समर्पित होने के कारण, केवल इंद्र उनसे अधिक महत्त्वपूर्ण वैदिक देवता हैं।

वैदिक काल में कई अग्नियों की बात की गई – जंगल में जलने वाली मुक्त, अबाधित अग्नि, रसोईघर में जलने वाली अग्नि, यज्ञशाला में जलने वाली पवित्र अग्नि, शवों और कूड़े-कचरे को जलाने वाली अग्नि और पेट में भोजन को पचाने वाली अग्नि। और अंत में समुद्र के नीचे स्थित अग्नि, जो वडवाग्नि नामक घोड़ी उगलती है। इस अग्नि से धुंध और बादल बनते हैं। यह अग्नि समुद्र को अपने किनारों से बहने से रोकती है। लेकिन एक दिन ऐसा आएगा जब समुद्र का पानी ज्वालामुखी के रूप में किनारों से बह निकलेगा और धरती को खा जाएगा। वो दिन प्रलय होगा।

दो लकड़ियों को एक दूसरे में लगातार रगड़कर अग्नि बनाई जाती थी, जिस कारण प्राचीन काल में उन लकड़ियों को अग्नि के माता-पिता माना जाता था। पहली लकड़ी अग्नि की ‘माता’ थी। दूसरी लकड़ी जो ‘पिता’ थी, पहली लकड़ी में दक्षिणावर्त और वामावर्त दिशा में रगड़ी और घुमाई जाती थी, जैसे दूध में लकड़ी घुमाकर मक्खन बनाया जाता है। चूँकि पिता-लकड़ी को हाथों की मदद से माता-लकड़ी में रगड़ा जाता था, हाथों की उंगलियां अग्नि की दासियां कहलाईं गईं। होम के समय अग्नि को अर्पण किए गए पदार्थ अग्नि की पत्नी, स्वाहा, कहलाए।

अग्नि की मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि हम एकमात्र जीव हैं जिसने अग्नि को वश में किया है। हालाँकि हम अग्नि से डरते हैं, हम न केवल उसे निर्माण कर सकते हैं बल्कि उसे बुझा सकते हैं और उसे नियंत्रित भी कर सकते हैं। और यही बात जो हमें पेड़ों और प्राणियों से अलग करती है हमारी विशेषता भी है। पेड़-पौधे अग्नि के सामने असहाय हैं। प्राणी उससे डरते हैं। केवल मनुष्य अग्नि की मदद से खाना पका सकते हैं। हम जंगलों को आग लगाकर उनकी जगह खेत और गांव स्थापित करते हैं। हम अग्नि को यज्ञ वेदी, रसोईघर, मशाल और सबसे महत्त्वपूर्ण दीयों में सीमित रखते हैं।

दीये में लौ अग्नि का सबसे पालतू रूप है। दीये की बत्ती से निकलने वाली स्थिर, एकल, कोमल लौ तपस्या में खड़े ऋषि जैसी है। इस प्रकार, दीये की लौ अग्नि का सबसे शुभ रूप है। इसके विपरीत, अशुभ अबाधित वनाग्नि में हर दिशा में बढ़ने वाली लाखों लपटें होती हैं।

चरम पर स्थित अग्नि के इन इन दो रूपों के बीच नियंत्रित अग्नि के अन्य रूप हैं – होली और लोहरी जैसे त्यौहारों में जलाए गए अलाव, रसोईघर में खाना बनाने की अग्नि, ब्राह्मणों के होम और यज्ञों के लिए अनिवार्य अग्नि, रास्तों को प्रकाशित करने वाली अग्नि, इत्यादि।

इस प्रकार, दीये धन की देवी लक्ष्मी, से जुड़ें हैं। जैसे वश में की गई भूमि पर स्थापित खेत से हमें अन्न मिलता है, वैसे दीये की नियंत्रित अग्नि से हमें सौभाग्य मिलता है। दीये की ज्योत उसके चारों ओर एक नम्र उजाला निर्माण करती है, जिसमें हम बैठकर प्रार्थना और पढ़ाई कर सकते हैं और हम सुरक्षित महसूस करते हैं। यहां लक्ष्मी निवास करती हैं। दीयों के त्यौहार दिवाली में लक्ष्मी को आकर्षित करने के लिए विशेषतः घर के सामने कई दीये जलाए जाते हैं।

परंपरागत रूप से, यदि दीये में पर्याप्त तेल होने पर भी ज्योत अपने आप बुझ जाती है, तो वह दुर्भाग्य का संकेत है। इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य को भले ही लगें कि उसने अग्नि को नियंत्रित किया है, उससे बड़ी शक्तियां (देव,दानव) इससे असहमत हैं। ज्योत को पहले फड़फड़ाकर और फिर बुझाकर ये शक्तियां उनकी अस्वीकृति संचारित करती हैं।

इस प्रकार, दीये में ज्योत का रूप भाग्य का संकेतक है। यह सुनिश्चित करने के लिए कड़े प्रयास किए जाते हैं कि तेल के अंतिम बूंद तक ज्योत जलती रहें। भारत में दीया जीवन के लिए रूपक बन गया है, जिसे नियंत्रित कर उसकी रक्षा करना भी आवश्यक है।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।

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