भगवान का पुनर्जन्म

नव-कलेवर पिछली बार सन 2015 में हुई थी। इस प्रक्रिया की शुरुआत में नीम के पेड़ चुने जाते हैं। ओडिशा में इन पेड़ों को दारु-ब्रह्म कहते हैं। लेकिन केवल ऐसे पेड़ चुने जाते हैं जिनके कुछ विशेष पहलू हैं: उनपर पक्षियों के घोंसले नहीं होते हैं, उनपर वल्मीक होते हैं, उनमें सांप बसते हैं और उनपर विष्णु के चिन्ह होते हैं।

क्या आपको पता है कि कुछ साल पहले ओडिशा में पुरी के प्रसिद्ध देवता, जगन्नाथ, का देहांत होकर उनका अपनी बहन, सुभद्रा, ज्येष्ठ भाई, बलभद्र तथा अपने सुदर्शन चक्र सहित पुनर्जन्म भी हुआ था? इस प्रक्रिया को ‘नव-कलेवर’ कहते हैं और वह तीन महीनों से अधिक समय लेती है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार यह प्रक्रिया कम से कम 400 वर्षों से हर 14 से 19 वर्ष होती आ रही है। यह तब होती है जब पंचांग के अनुसार आषाढ़ महीने में अधिक-मास होता है। नव-कलेवर पिछली बार सन 2015 में हुई थी।

इस प्रक्रिया की शुरुआत में नीम के पेड़ चुने जाते हैं। ओडिशा में इन पेड़ों को दारु-ब्रह्म कहते हैं। लेकिन केवल ऐसे पेड़ चुने जाते हैं जिनके कुछ विशेष पहलू हैं: उनपर पक्षियों के घोंसले नहीं होते हैं, उनपर वल्मीक होते हैं, उनमें सांप बसते हैं और उनपर विष्णु के चिन्ह होते हैं। ऐसे पेड़ों को काटकर पुरी लाया जाता है। वहां, कुछ निर्धारित अनुष्ठानों के पश्चात उन्हें एक गोपनीय स्थान ले जाकर उनपर नक्काशी की जाती है। कुछ सप्ताहों की नक्काशी के पश्चात, मूर्तियां तैयार होती हैं। फिर, तीव्र गरमी में इन नई मूर्तियों को पुरानी मूर्तियों के पास रखा जाता है।

और फिर वह महत्वपूर्ण रात आती है, जब संपूर्ण पुरी शहर की बिजली बंद कर दी जाती है। शहर में अंधेरा हो जाता है। कुछ विशिष्ट पुजारी अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर मंदिर में प्रवेश करते हैं। कपड़े में लिपटे हुए हाथों से वे ‘ब्रह्म-पदार्थ’ को जगन्नाथ की पुरानी मूर्ति से नई मूर्ति तक पहुंचाते हैं। ब्रह्म-पदार्थ क्या है यह आज तक कोई नहीं जान पाया है। स्वभावतः, सदियों से इसके बारे में कई अनुमान लगाए गए हैं। कुछ लोग मानते हैं कि वह स्वयं कृष्ण के अवशेष हैं, तो कुछ और मानते हैं कि वह बुद्ध के अवशेष हैं। ब्रह्म-पदार्थ के पवित्र मणि, शालिग्राम यहां तक कि तांत्रिक यंत्र होने के भी अनुमान लगाए गए हैं।

इस हस्तांतरण से पुराने शरीर को फेंककर नए शरीर को अपनाया जाता है। पुरानी मूर्तियां मुख्य मंदिर को लगकर कोइली-वैकुंठ नामक विशिष्ट पवित्र बाड़े में दफ़नाईं जाती हैं। वर्षा-ऋतु के ठीक पहले होने वाली भव्य रथ यात्रा में लोगों को जगन्नाथ का नया शरीर पहली बार देखने मिलता है।

आश्चर्य की बात यह है कि इस मंदिर में अतीत में कई पंथों का समन्वय हुआ। पवित्र लकड़ी के कुंदे का उल्लेख संभवतः ऋग्वेद में है। सवर जनजाति के लोकसाहित्य में इस लकड़ी के सबसे पहले उल्लेख हैं। इसपर बौद्ध प्रभाव के भी कई संकेत पाए गए हैं। लेकिन वर्तमान काल में यह मुख्यतः वैष्णव मंदिर है। कृष्ण की बहन और उनका भाई हिंदू धर्म के क्रमशः शाक्त और शैव संप्रदायों के मूर्त रूप हैं। अनुष्ठान करने वाले पुजारी भी कई जातियों के हैं। उदाहरणार्थ, देवता की सेवा करने वाले दैत्य-पति ब्राह्मण नहीं हैं। और देवताओं की मूर्तियां और रथ बनाने वाले शिल्पकार महा-राना समाज के हैं।

इस सबके बावजूद, मंदिर में केवल हिंदुओं को प्रवेश करने की अनुमति है। सालबेग जैसे कवि-संत, जिनके पिता मुसलमान थे को मंदिर के प्रवेशद्वार पर खड़े रहकर ही जगन्नाथ की स्तुति में गीत गाने पड़ें थे। हालाँकि मंदिर के रूढ़िवादी पुजारियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ, स्वयं जगन्नाथ सालबेग से प्रभावित होकर पतित पावन का रूप धारण कर उनसे मिलने बाहर आए।

एक और उल्लेखनीय बात यह है कि सदियों से मंदिर पर हुए हमलों के बावजूद वह आज भी अस्तित्व में है। पांचवीं या दसवीं सदी में रक्तबाहु नामक यवन राजा (या क्या वह भारतीय-यूनानी या हुन राजा था?) ने मंदिर और मूर्तियों को दूषित किया। सोलहवीं सदी में इस्लाम अपनाने के कुछ ही समय बाद काला-पहाड़ नामक सरदार ने भी यही किया।

लेकिन मंदिर और रथ यात्रा जैसे उससे जुड़ें अनुष्ठान आज भी पनप रहें हैं। इतना ही नहीं, वे विश्व विख्यात भी बन गए हैं। और क्यों नहीं? चूँकि मंदिर आते-जाते रहेंगे, शरीर नष्ट होते रहेंगे, जातिवाद चलता रहेगा, धर्म आते-जाते रहेंगे, राजा लड़ते रहेंगे, लेकिन देवत्व हमेशा जीवित रहेगा और रहस्यमय ब्रह्म-पदार्थ की तरह एक से दूसरे रूप में प्रवेश करता रहेगा।

देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।