बौद्ध धर्म की उत्पत्ति 2500 वर्ष पहले भारत में हुई। तब से आज तक एशियाभर उसके कई संप्रदाय उभरें हैं। आइए देखें बुद्ध को सदियों से विभिन्न संप्रदायों की कला में कैसे दर्शाया गया।
बौद्ध कला का 2000 वर्ष लंबा इतिहास है। बौद्ध विचार के विकास के साथ बौद्ध कला भी बदलती गई। प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध की प्रतिमा दिखाई नहीं गई। वास्तव में, उनकी उपस्थिति उनकी अनुपस्थिति से दिखाई गई। पगड़ी, कोई पेड़ या बुद्ध के पदचिन्ह जैसे प्रतीक देखकर लोग समझते थे कि बुद्ध को दर्शाया जा रहा था। तपस्या करके निर्वाण प्राप्त करने से कोई महान व्यक्ति अपनी शारीरिक पहचान मिटा देता है। इसलिए, बौद्ध धर्म की शुरुआत में यह मान्यता थी कि ऐसे व्यक्ति का कला में निरूपण नहीं किया जाना चाहिए।
बौद्ध धर्म के दूसरे चरण में यह विचार बदल गया। अब बुद्ध को कपड़ें से ढके संन्यासी के रूप में दिखाया जाने लगा। उन्हें आसीन, खड़े या लेटे हुए दिखाया गया। अब उनके केश सर के ऊपर एक चोटी में बंधें हुए दिखाए गए। लेकिन विभिन्न वृत्तातों के अनुसार उन्होंने अपना सर मुंडवाया था।
लोग मुंडवाया हुआ सर अशुभ मानते थे। इसलिए, कारीगर बुद्ध के सर पर चोटी बनाने लगें। दक्षिण-एशियाई कला में उष्णीष नामक इस चोटी को ज्वाला का रूप दिया गया। कुछ लोगों का मानना है कि उष्णीष बुद्ध के उच्च बुद्धि का संकेतक है। इन प्रतिमाओं में बुद्ध के अतिमानवीय होने को लंबे कान, भुजाओं और उंगलियों के माध्यम से दिखाया गया। उनके हाथ भी अभय मुद्रा, भूमिस्पर्श मुद्रा और ज्ञान मुद्रा जैसी कई मुद्राओं में दिखाए गए।
लगभग इसी समय जातक कथाएं चित्रित की जाने लगीं। इन कथाओं में बुद्ध के पूर्व जन्मों को वर्णित किया गया था। अपने पूर्व जन्मों में बुद्ध विभिन्न प्राणी या पौधे रहें थे। इन चित्रों ने यही दिखाया। ये चित्र बुद्ध के अंतिम जीवन के दृश्यों के साथ दिखाए जाने लगें – अपनी माँ के शरीर से जन्म लेते हुए, जन्म के तुरंत बाद क़दम लेते हुए, घोड़े पर सवार होकर महल से बाहर जाते हुए, मृत्यु और क्षय देखते हुए, सुजाता के हाथों खाना खाते हुए, सारनाथ में पहला प्रवचन देते हुए, तथा उनके जीवन की कई घटनाओं के दृश्यों और अंततः उनकी मृत्यु के दृश्यों के साथ।
तीसरे चरण में बुद्ध का आकार अचानक से विशाल बन गया। ये छवियां रेशम मार्ग पर मिलती हैं। अफ़्ग़ानिस्तान के बामियां में बुद्ध की छवियां विश्व प्रसिद्ध हैं। दुर्भाग्यवश, उन्हें 2001 में नष्ट कर दिया गया।
इस चरण में बौद्ध धर्म में कई सर और कई हाथों वाली छवियां भी बनाईं गईं। ये बोधिसत्त्व अर्थात रक्षक हैं। कई प्रकार के बुद्धों का वर्णन किया गया, जैसे कमल के फूल से उभरते हुए बुद्ध, अपने हाथ में कमल का फूल पकड़े पद्मपाणि या वज्र पकड़े वज्रपाणि। वज्रपाणि और पद्मपाणि को द्वारपाल के रूप तथा यक्ष और यक्षियों को उनकी आराधना करते हुए दिखाया गया। वज्रपाणि और पद्मपाणि के दो बहुत प्रसिद्ध चित्र महाराष्ट्र में अजंता की गुफ़ाओं में हैं।
ये मूर्तियां महायान बौद्ध धर्म से हैं। यह संप्रदाय मानता है कि सृष्टि में कई बुद्ध होते हैं और बुद्ध की आराधना कर उनसे मदद मांगना बुद्ध के मार्ग पर चलने से अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह चरण चीन और जापान में बहुत प्रसिद्द हुआ।
बौद्ध कला के चौथे चरण में बुद्ध को हाथ में घंटा और वज्र पकड़े हुए दिखाया गया। इन चित्रों में बुद्ध कभी-कभार बड़े उग्र दिखते हैं। ये तांत्रिक छवियां वज्रयान बौद्ध संप्रदाय से हैं। यह संप्रदाय हिमालय के पहाड़ों में, भूटान, नेपाल, लदाख और तिब्बत में पनपा। तांत्रिक कला में एकाधिक बुद्ध दिखाए जाते हैं और सभी में वर्गीकरण होता है। इससे पता चलता है कैसे राजनीति में बौद्ध धर्म की बात होने लगी और विभिन्न बुद्धों में वर्गीकरण होने लगा। इस प्रकार, बौद्ध धर्म के लंबे इतिहास में कला में भी बड़ा परिवर्तन हुआ।
देवदत्त पटनायक पेशे से एक डॉक्टर, लीडरशिप कंसल्टेंट, मायथोलॉजिस्ट, राइटर और कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने मिथक, धर्म, पौराणिक कथाओं और प्रबंधन के क्षेत्र मे काफी काम किया है।
